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SAMAST PUNJABI KHATRI SABHA
08/08/2026
05/08/2026
सिर्फ "किरदार" बदलते हैं ---
01/08/2026
बाबा दयाल सिंह मल्होत्रा (बाबा दयाल दास)
मूल निरंकारी आंदोलन के संस्थापक
बाबा दयाल सिंह मल्होत्रा (बाबा दयाल दास) मूल निरंकारी आंदोलन के संस्थापक थे। उनका जन्म 17 मई 1783 को पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान) में एक मल्होत्रा खत्री परिवार में हुआ था। उन्होंने सिख धर्म में बढ़ती मूर्तिपूजा, कर्मकांड और बाहरी आडंबरों का विरोध करते हुए निराकार (निरंकार) ईश्वर की उपासना तथा गुरु नानक देव जी की मूल शिक्षाओं की ओर लौटने का संदेश दिया।
प्रमुख कार्य
सिख समाज में व्याप्त मूर्तिपूजा और अंधविश्वास का विरोध।
गुरु नानक देव जी की मूल शिक्षाओं एवं सरल जीवन-पद्धति के पालन पर बल।
केवल एक निराकार परमात्मा (निरंकार) की उपासना का प्रचार।
1851 में रावलपिंडी में निरंकारी दरबार की स्थापना, जो उनके सुधार आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना।
निधन
बाबा दयाल सिंह जी का निधन 30 जनवरी 1855 को हुआ। उनके विचारों ने आगे चलकर निरंकारी परंपरा को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया और सिख समाज में धार्मिक सुधार की एक महत्वपूर्ण धारा का निर्माण किया।
आधुनिक 'संत निरंकारी मिशन' की औपचारिक शुरुआत बाद में 1929 में बाबा बूटा सिंह जी द्वारा की गई थी, जिसकी जड़ें बाबा दयाल सिंह जी के इसी सुधारवादी निरंकारी आंदोलन से जुड़ी हैं।*
31/07/2026
रमेश जुनेजा और राजीव जुनेजा: दो भाइयों की कहानी, जिन्होंने भारत को सस्ती दवाइयों का भरोसा दिया
"कभी एक गरीब व्यक्ति को दवा के लिए अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखते देखा… और उसी दिन एक सपना जन्मा। ऐसा सपना जिसने आगे चलकर भारत की सबसे बड़ी फार्मा कंपनियों में से एक को जन्म दिया।"
एक घटना जिसने जिंदगी बदल दी
साल 1974। मेरठ के रहने वाले रमेश जुनेजा ने महज़ ₹300 मासिक वेतन पर एक फार्मा कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) के रूप में अपना करियर शुरू किया। बाद में वे ल्यूपिन जैसी प्रतिष्ठित कंपनी से भी जुड़े।
एक दिन मेरठ के एक मेडिकल स्टोर पर उन्होंने ऐसा दृश्य देखा, जिसे वे कभी भूल नहीं पाए। एक गरीब व्यक्ति के पास अपने परिवार की दवा खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। मजबूरी में वह अपनी पत्नी के चांदी के गहने गिरवी रखकर दवा खरीदने की कोशिश कर रहा था।
यह दृश्य रमेश जुनेजा के मन को भीतर तक झकझोर गया। उसी क्षण उन्होंने निश्चय किया कि एक दिन वे ऐसी दवाइयाँ बनाएँगे जो हर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार की पहुँच में हों।
पहला सपना टूटा, लेकिन हिम्मत नहीं
कुछ वर्षों बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और 1983 में साझेदारी में Bestochem नाम से अपना पहला व्यवसाय शुरू किया। लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो पाया और लगभग एक दशक बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा।
कई लोगों के लिए यह अंत होता, लेकिन रमेश जुनेजा के लिए यह नई शुरुआत थी।
दो भाइयों ने रखा मैनकाइंड की नींव
साल 1995 में रमेश जुनेजा ने अपने छोटे भाई राजीव जुनेजा के साथ मिलकर Mankind Pharma की स्थापना की।
राजीव उस समय कॉलेज छोड़ चुके थे और एक केमिस्ट की दुकान पर दवाइयों का काम सीख रहे थे। दोनों भाइयों ने लगभग ₹50 लाख के शुरुआती निवेश और केवल 20–25 मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के साथ मेरठ से अपनी यात्रा शुरू की।
संसाधन सीमित थे, लेकिन उद्देश्य स्पष्ट था—हर भारतीय तक गुणवत्तापूर्ण और किफायती दवाइयाँ पहुँचाना।
जब सब शहरों में थे, उन्होंने गाँव चुने
उस समय अधिकांश बड़ी फार्मा कंपनियाँ महानगरों के बड़े अस्पतालों और प्रसिद्ध डॉक्टरों पर ध्यान देती थीं।
लेकिन जुनेजा भाइयों ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने उत्तर प्रदेश, हरियाणा और देश के छोटे कस्बों, गाँवों तथा टियर-2 और टियर-3 शहरों के डॉक्टरों तक अपनी पहुँच बनाई।
उन्होंने अपनी दवाइयों की कीमतें बड़ी कंपनियों की तुलना में 30–40 प्रतिशत तक कम रखीं, ताकि आम आदमी भी बिना आर्थिक बोझ के इलाज करा सके।
यही रणनीति आगे चलकर मैनकाइंड की सबसे बड़ी ताकत बनी।
हर घर तक पहुँचे उनके ब्रांड
मैनकाइंड ने केवल प्रिस्क्रिप्शन दवाइयाँ ही नहीं बनाईं, बल्कि ऐसे स्वास्थ्य उत्पाद भी विकसित किए जो लगभग हर भारतीय परिवार तक पहुँचे।
Prega News ने घरेलू प्रेगनेंसी टेस्ट को आसान बनाया।
Manforce देश के सबसे लोकप्रिय कंडोम ब्रांडों में शामिल हुआ।
Gas-O-Fast और Unwanted 72 जैसे उत्पाद भी पूरे भारत में व्यापक रूप से उपयोग किए जाने लगे।
इन ब्रांडों ने कंपनी को केवल फार्मा उद्योग ही नहीं, बल्कि उपभोक्ता स्वास्थ्य बाजार में भी मजबूत पहचान दिलाई।
मेरठ से वैश्विक मंच तक
जिस कंपनी की शुरुआत मेरठ के एक छोटे से कार्यालय से हुई थी, वह आज भारत की अग्रणी फार्मा कंपनियों में शामिल है।
कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध है और उसका बाजार पूंजीकरण समय-समय पर बदलते हुए लगभग ₹1 लाख करोड़ के स्तर तक पहुँच चुका है। मैनकाइंड आज 30 से अधिक देशों में अपनी जेनेरिक दवाइयाँ निर्यात करती है।
हाल के वर्षों में कंपनी ने भारत सीरम्स एंड वैक्सीन्स (BSV) का लगभग ₹13,630 करोड़ में अधिग्रहण कर अपने कारोबार को और मजबूत किया।
29/07/2026
संजय मल्होत्रा
एक छोटे शहर के मेधावी छात्र से भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर बनने तक का प्रेरक सफर
भारत में लाखों युवा बड़े सपने देखते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही अपनी मेहनत, प्रतिभा और ईमानदारी के दम पर इतिहास रच पाते हैं। संजय मल्होत्रा उन चुनिंदा व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने राजस्थान के छोटे से शहर बीकानेर से निकलकर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के गवर्नर बनने तक का प्रेरणादायक सफर तय किया।
बीकानेर की गलियों से उड़ान
राजस्थान के बीकानेर में जन्मे संजय मल्होत्रा बचपन से ही शांत स्वभाव, अनुशासित और पढ़ाई में बेहद मेधावी थे। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय, बीकानेर से पूरी की। वे हर कक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते थे और अपने शिक्षकों व सहपाठियों के बीच एक होनहार छात्र के रूप में पहचाने जाते थे। आज भी उनके पुराने मित्र उनकी सादगी और तेज बुद्धि की मिसाल देते हैं।
IIT से UPSC तक का शानदार सफर
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर से कंप्यूटर साइंस में बी.टेक. की डिग्री प्राप्त की। इंजीनियरिंग के बाद उन्होंने एक सुरक्षित करियर चुनने के बजाय देश सेवा का रास्ता चुना और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की तैयारी शुरू कर दी।
साल 1989 में उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में सिविल सेवा परीक्षा में पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त कर इतिहास रच दिया। इसके बाद वे राजस्थान कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी बने।
सीखने की ललक कभी नहीं रुकी
प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और अमेरिका की प्रतिष्ठित प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर डिग्री प्राप्त की। उनका मानना था कि सीखना कभी नहीं रुकना चाहिए और बेहतर ज्ञान ही बेहतर निर्णयों की नींव बनता है।
परिवार हमेशा रहा सबसे बड़ी ताकत
कठिन प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बावजूद संजय मल्होत्रा ने अपने परिवार को हमेशा प्राथमिकता दी। उनकी पत्नी डॉ. शमीला मल्होत्रा हर कदम पर उनकी मजबूत साथी रहीं।
प्रिंसटन में अध्ययन के दौरान भी वे सप्ताहांत अपने परिवार के साथ बिताते, बच्चों के साथ समय गुजारते और जीवन के छोटे-छोटे सुखद पलों का आनंद लेते थे। उनके करीबी बताते हैं कि इतने ऊँचे पदों पर पहुँचने के बाद भी वे आज भी उतने ही सरल, विनम्र और जमीन से जुड़े हुए हैं।
33 वर्षों की सेवा और सबसे बड़ी जिम्मेदारी
तीन दशकों से अधिक समय तक बिजली, वित्त, कराधान और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी विभागों में उत्कृष्ट सेवाएँ देने के बाद दिसंबर 2024 में उन्हें भारतीय रिज़र्व बैंक का 26वाँ गवर्नर नियुक्त किया गया।
यह खबर जैसे ही उनके पुश्तैनी घर बीकानेर पहुँची, पूरे परिवार, मित्रों और शहर में खुशी की लहर दौड़ गई। जिस बेटे ने कभी बीकानेर के एक साधारण स्कूल से पढ़ाई शुरू की थी, वही आज भारत की मौद्रिक नीति और वित्तीय व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहा था।
युवाओं के लिए प्रेरणा
संजय मल्होत्रा की कहानी हमें यह सिखाती है कि सफलता का रास्ता किसी बड़े शहर या विशेष सुविधाओं से नहीं, बल्कि मेहनत, अनुशासन, निरंतर सीखने की इच्छा और ईमानदारी से बनता है।
बीकानेर के एक साधारण घर से निकलकर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर बनने तक का उनका सफर इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और प्रयास निरंतर हों, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं होती।
28/07/2026
अनाहत सिंह वढेरा: भारत की पहली जूनियर स्क्वैश वर्ल्ड चैंपियन बनने की ऐतिहासिक कहानी
"18 वर्ष की एक भारतीय बेटी ने वह कर दिखाया, जिसका इंतज़ार भारतीय स्क्वैश पिछले कई दशकों से कर रहा था।"
13 मार्च 2008 को नई दिल्ली में जन्मी अनाहत सिंह वढेरा आज भारत की सबसे प्रतिभाशाली युवा स्क्वैश खिलाड़ियों में गिनी जाती हैं। मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने शानदार खेल, अनुशासन और अथक मेहनत के दम पर विश्व स्क्वैश में भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा दिया।
खेलों का माहौल, परिवार से मिली प्रेरणा
अनाहत के पिता गुरशरण सिंह पेशे से वकील हैं, जबकि उनकी माता तनी वढेरा एक इंटीरियर डिज़ाइनर हैं। दोनों माता-पिता राष्ट्रीय स्तर के फील्ड हॉकी खिलाड़ी रह चुके हैं। खेलों का यही वातावरण बचपन से अनाहत को मिला, जिसने उन्हें उत्कृष्ट खिलाड़ी बनने की प्रेरणा दी।
*विश्व रैंकिंग में लगातार ऊँची उड़ान*
अनाहत ने कम उम्र में ही अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बना ली। फरवरी 2026 में वे विश्व रैंकिंग में 18वें स्थान तक पहुँचीं और जुलाई 2026 में भी विश्व की 20वीं रैंकिंग वाली खिलाड़ी रहीं। यह उपलब्धि उनकी निरंतर मेहनत और उत्कृष्ट प्रदर्शन का प्रमाण है।
2026: जब भारत ने रचा नया इतिहास
27 जुलाई 2026 भारतीय खेल इतिहास का एक स्वर्णिम दिन बन गया। जूनियर स्क्वॉश वर्ल्ड चैंपियनशिप के गर्ल्स सिंगल्स फाइनल में अनाहत सिंह ने मिस्र की दूसरी वरीयता प्राप्त खिलाड़ी रुक्या सलेम को 11-3, 11-7 और 11-9 से सीधे तीन गेमों में हराकर खिताब अपने नाम कर लिया।
इसके साथ ही अनाहत सिंह जूनियर स्क्वॉश वर्ल्ड चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। यह केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारतीय स्क्वॉश के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत थी।
*टूटा मिस्र का 15 वर्षों का वर्चस्व*
यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक रही क्योंकि वर्ष 2011 से लगातार जूनियर गर्ल्स स्क्वॉश वर्ल्ड चैंपियनशिप का खिताब मिस्र की खिलाड़ियों के नाम रहा था। लगभग 15 वर्षों के इस दबदबे को अनाहत सिंह ने समाप्त कर दिया।
भारत के लिए इससे पहले सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वर्ष 2005 में हुआ था, जब जोशना चिनप्पा फाइनल तक पहुँची थीं, लेकिन खिताब नहीं जीत सकी थीं। दो दशक बाद अनाहत ने वह सपना पूरा कर दिखाया जिसका इंतज़ार पूरा देश कर रहा था।
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संक्षिप्त परिचय
नाम: अनाहत सिंह वढेरा
जन्म: 13 मार्च 2008, नई दिल्ली
पिता: गुरशरण सिंह (वकील)
माता: तनी वढेरा (इंटीरियर डिज़ाइनर)
विशेष उपलब्धि: भारत की पहली जूनियर स्क्वॉश वर्ल्ड चैंपियन (2026)
25/07/2026
संगीतकार मदन मोहन कोहली : फ़िल्मी ग़ज़लों के अप्रतिम शिल्पकार
भारतीय फ़िल्म संगीत के इतिहास में मदन मोहन का नाम उन संगीतकारों में लिया जाता है जिन्होंने शास्त्रीय संगीत की गहराई, ग़ज़ल की नज़ाकत और मधुर धुनों को एक अनूठे रूप में प्रस्तुत किया। उनका पूरा नाम मदन मोहन कोहली था। उनका जन्म 25 जून 1924 को बगदाद (तत्कालीन ब्रिटिश शासनाधीन इराक) में हुआ, जहाँ उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल कार्यरत थे। बाद में परिवार भारत लौट आया और मुंबई में बस गया। चुन्नीलाल फ़िल्म उद्योग से जुड़े और बॉम्बे टॉकीज़ तथा फ़िल्मिस्तान स्टूडियो जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
मदन मोहन ने कुछ समय भारतीय सेना में सेवा की, लेकिन उनका मन संगीत में रमता था। सेना छोड़ने के बाद वे आकाशवाणी, लखनऊ से जुड़े। लखनऊ में उन्हें बेगम अख्तर, उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ, उस्ताद अली अकबर ख़ाँ, रोशनआरा बेगम और अन्य शास्त्रीय संगीतकारों को निकट से सुनने और समझने का अवसर मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनके संगीत की पहचान बना।
उन्होंने 1950 में फ़िल्म आँखें से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने लगभग 100 फ़िल्मों में संगीत दिया। यद्यपि उनकी अनेक फ़िल्में व्यावसायिक रूप से बहुत सफल नहीं रहीं, लेकिन उनका संगीत आज भी भारतीय फ़िल्म संगीत की अमूल्य धरोहर माना जाता है।
मदन मोहन को विशेष रूप से फ़िल्मी ग़ज़लों का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार माना जाता है। उनकी धुनों में रागदारी का प्रभाव, सूक्ष्म भावनाएँ और सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली ऑर्केस्ट्रेशन दिखाई देता है। इसी कारण उन्हें अक्सर "ग़ज़लों का शहज़ादा" कहा जाता है।
उनकी सबसे प्रसिद्ध साझेदारी गायिका Lata Mangeshkar के साथ रही। लता मंगेशकर ने स्वयं कई अवसरों पर कहा कि मदन मोहन की धुनें गाना चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ अत्यंत संतोष देने वाला अनुभव था। दोनों ने मिलकर हिन्दी सिनेमा को अनेक कालजयी गीत दिए।
उनके प्रमुख गीतों में "लग जा गले", "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" (वो कौन थी), "आपकी नज़रों ने समझा" (अनपढ़), "तू जहाँ जहाँ चलेगा" और "झुमका गिरा रे" (मेरा साया), "कर चले हम फ़िदा" तथा "होके मजबूर मुझे" (हक़ीक़त), "मैं री मैं कैसे कहूँ" (दस्तक) और "दिल ढूँढता है" (मौसम) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन गीतों में उनकी संगीत-रचना की विविधता और संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है।
उन्हें 1971 में फ़िल्म दस्तक के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। हालांकि अपने जीवनकाल में उन्हें वह व्यावसायिक सफलता और सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे।
14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन के लगभग तीन दशक बाद उनके पुत्र संजीव कोहली ने उनकी अप्रयुक्त धुनों को संरक्षित कर फ़िल्म वीर-ज़ारा (2004) में उपयोग कराया। इन धुनों पर आधारित गीतों ने नई पीढ़ी को भी मदन मोहन के संगीत से परिचित कराया और यह सिद्ध किया कि श्रेष्ठ संगीत समय की सीमाओं से परे होता है।
आज मदन मोहन भारतीय फ़िल्म संगीत के उन अमर संगीतकारों में गिने जाते हैं जिनकी रचनाएँ संगीत विद्यार्थियों, ग़ज़ल प्रेमियों और शास्त्रीय संगीत के अध्येताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी धुनें इस बात का प्रमाण हैं कि सच्चा संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदनाओं और सांगीतिक उत्कृष्टता की स्थायी अभिव्यक्ति भी है।
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