SERMA RIMIL

SERMA RIMIL

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Singer- Barku kisku
Banam Raja SANTHALI Song
11/09/2023

10/05/2026

Beautiful Nature

18/02/2026

कोई बता सकता है इस फुल का नाम? follow

17/02/2026

Good night friends

16/02/2026

Hlo friends

13/02/2026

🌺 “साल और फुलो” – एक संथाली प्रेम कहानी 🌺
झारखंड के घने जंगलों और साल के पेड़ों से घिरे एक छोटे से संथाली गाँव होड़ाम में साल मुर्मू रहता था। साल सीधा-सादा, मेहनती और बाँसुरी बजाने में माहिर लड़का था। हर शाम जब वह खेतों से लौटता, उसकी बाँसुरी की धुन पूरे गाँव में गूँज जाती।
उसी गाँव में रहती थी फुलो हेंब्रम — चंचल, मासूम और जंगल के फूलों जैसी खूबसूरत। उसकी हँसी में जैसे महुआ की मिठास थी।
दोनों की पहली मुलाकात सोहराय पर्व के दिन हुई। ढोल-नगाड़ों की थाप पर गाँव झूम रहा था। साल बाँसुरी बजा रहा था, और फुलो नाचते-नाचते उसकी धुन में खो गई।
नज़रें मिलीं… और वहीं से दिलों का बंधन जुड़ गया।
धीरे-धीरे दोनों अक्सर जंगल के झरने के पास मिलने लगे।
साल बाँसुरी बजाता और फुलो पत्तों की ओट में बैठकर सुनती।
वो पल दोनों के लिए दुनिया से दूर, सिर्फ उनका अपना संसार था।
लेकिन प्यार का रास्ता आसान नहीं था।
फुलो के घरवाले उसका रिश्ता किसी अमीर लड़के से तय करना चाहते थे।
जब फुलो ने यह बात साल को बताई, तो उसकी आँखें भर आईं।
साल बोला —
“फुलो, मैं अमीर नहीं हूँ, पर मेरा दिल सच्चा है। मैं तुम्हारे लिए पूरी दुनिया से लड़ जाऊँगा।”
फुलो ने उसके हाथ थाम लिए —
“साल, मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ। चाहे जंगल गवाह बने या सितारे।”
दोनों ने तय किया कि वे अपने प्यार को साबित करेंगे।
साल ने मेहनत से खेती शुरू की, बाँसुरी सिखाने लगा और गाँव के बच्चों का सहारा बना।
गाँव वालों ने उसकी सच्चाई और मेहनत देखी।
एक दिन गाँव की सभा में बुज़ुर्ग बोले —
“जो दिल से प्यार करता है और मेहनत करता है, वही असली धनवान होता है।”
आख़िरकार फुलो के घरवाले भी मान गए।
करम पर्व के दिन, ढोल-नगाड़ों के बीच, साल और फुलो ने एक-दूसरे का हाथ थामा।
जंगल, नदी, पेड़ और पूरा गाँव उनके प्यार का साक्षी बना।
आज भी कहते हैं —
जब उस गाँव में शाम को बाँसुरी की मीठी धुन सुनाई देती है,
तो लोग मुस्कुराकर कहते हैं —
“लगता है साल और फुलो का प्यार आज भी हवा में घुला है…” 💕🌿
अगर चाहो तो मैं इसे

11/02/2026

Good morning friends

10/02/2026

Hlo friends

10/02/2026

कोसी किनारे का प्यार
कोसी नदी के किनारे बसा था छोटा-सा गाँव सोनबरसा। बाढ़ और गरीबी से जूझता, मगर दिलों में अपनापन लिए हुए। उसी गाँव में रहता था मिथिलेश, जो दिन में खेतों में काम करता और रात में ढोलक बजाकर लोकगीत गाता। उसकी आवाज़ में दर्द भी था और उम्मीद भी।
उसी गाँव में एक दिन पटना से आई थी सीता। वह अपने नाना के यहाँ रहने आई थी, बाढ़ पीड़ित बच्चों को पढ़ाने। सादी साड़ी, माथे पर छोटी सी बिंदी और आँखों में अजीब-सी चमक—गाँव के लिए वह किसी कहानी की नायिका से कम नहीं थी।
पहली मुलाकात हुई स्कूल के पास लगे पीपल के पेड़ के नीचे।
मिथिलेश ढोलक बजा रहा था और सीता बच्चों को कविता सिखा रही थी।
ढोलक की ताल और सीता की आवाज़… दोनों जैसे एक-दूसरे से बात कर रही हों।
धीरे-धीरे मुलाकातें बढ़ीं।
कोसी के किनारे बैठकर बातें,
मखाना और चूड़ा खाते हुए हँसी,
और शाम को डूबते सूरज के साथ सपने।
सीता को मिथिला की बोली अच्छी लगने लगी,
और मिथिलेश को सीता की किताबों की दुनिया।
लेकिन प्यार आसान कहाँ होता है?
सीता के घरवाले चाहते थे कि वह शहर लौट जाए,
और मिथिलेश… वह तो गाँव, खेत और कोसी से बँधा था।
एक दिन बाढ़ फिर आई।
गाँव डूबने लगा।
मिथिलेश लोगों को सुरक्षित जगह पहुँचाने में जुटा था। उसी दौरान वह सीता को बचाने नदी में कूद पड़ा।
लोगों ने देखा—यह सिर्फ हिम्मत नहीं, प्यार की ताक़त थी।
बाढ़ के बाद सब बदल गया।
सीता के घरवालों ने समझा कि यह लड़का सिर्फ गरीब नहीं, बल्कि बहादुर और सच्चा है।
शादी सादगी से हुई—
माटी के आँगन में,
ढोलक की थाप पर,
और कोसी की हवा में घुली मोहब्बत के साथ।
आज भी जब कोसी बहती है,
तो गाँव वाले कहते हैं—
“ये नदी सिर्फ पानी नहीं लाती,
कभी-कभी सच्चा प्यार भी बहा लाती है।”

09/02/2026

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09/02/2026

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