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14/09/2026
BRICS Dinner Row: ब्रिक्स डिनर में सिर्फ वेज खाना परोसने पर घमासान, राहुल गांधी के छोले-भटूरे वाले तंज पर किरेन रिजिजू का पलटवार
नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से आयोजित गाला डिनर का मेन्यू अब कूटनीति से ज्यादा सियासत का मुद्दा बन गया है। भारत मंडपम में आयोजित रात्रिभोज में विदेशी नेताओं और प्रतिनिधियों को पूरी तरह शाकाहारी भारतीय व्यंजन परोसे गए। इसके बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा, तो बीजेपी की ओर से केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पलटवार किया।
राहुल गांधी ने छोले-भटूरे की फोटो शेयर कर कसा तंज
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने रविवार को सोशल मीडिया पर छोले-भटूरे की तस्वीर साझा की। उन्होंने लिखा कि “80% भारतीय मांसाहारी हैं” और भारतीय मांसाहारी खाना स्वादिष्ट है। हालांकि, उन्होंने अपनी पोस्ट में BRICS डिनर या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, लेकिन यह पोस्ट गाला डिनर के शाकाहारी मेन्यू को लेकर चल रही बहस के बीच आई।
राहुल गांधी की पोस्ट के बाद कांग्रेस नेताओं ने इसे भारत की खान-पान की विविधता से जोड़ते हुए सरकार पर हमला तेज कर दिया।
पवन खेड़ा बोले- भारत की विविधता क्यों छिपाई?
कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने डिनर के मेन्यू का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए सवाल उठाया कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश की पाक संस्कृति में मांसाहारी व्यंजनों की बड़ी परंपरा होने के बावजूद उन्हें अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के सामने क्यों नहीं रखा गया।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि बीजेपी अपनी पसंद और खान-पान की प्राथमिकताओं को विदेशी मेहमानों तक भी पहुंचा रही है और भारत की culinary diversity के एक हिस्से को नजरअंदाज किया गया।
क्या था BRICS डिनर का मेन्यू?
गाला डिनर में भारत की अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराओं और मिलेट यानी श्री अन्न पर खास जोर दिया गया था। मेन्यू में खांडवी मिले, खुंब गलौटी, पनीर लबाबदार, गुच्छी मार्मिक, कैरट बीन पोरियाल, थक्काली बेल्ले सारू और बाजरा पुलाव जैसे व्यंजन शामिल थे। मिठाई में ओल्ड दिल्ली फ्रूट क्रीम विद जलेबी और शहतूत फिरनी परोसी गई।
आयोजकों की ओर से इसे भारतीय शाकाहारी खान-पान, क्षेत्रीय स्वाद और मिलेट आधारित भोजन को दुनिया के सामने पेश करने के अवसर के तौर पर देखा गया।
किरण रिजिजू ने किया पलटवार
कांग्रेस के हमले पर केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने पलटवार करते हुए विपक्ष पर खाने के मुद्दे पर भी राजनीति करने का आरोप लगाया। बीजेपी का कहना है कि भारत की शाकाहारी भोजन परंपरा भी बेहद समृद्ध और विविध है और BRICS मेहमानों के सामने भारतीय व्यंजनों की इसी परंपरा को प्रस्तुत किया गया।
सत्ता पक्ष की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के डिनर का मेन्यू एक आयोजन संबंधी निर्णय था और इसे राजनीतिक विवाद में बदलना उचित नहीं है।
राहुल गांधी के 80% वाले दावे पर भी सवाल
राहुल गांधी ने 80% भारतीयों के मांसाहारी होने का दावा किया, लेकिन अपनी पोस्ट में इसका कोई स्रोत नहीं दिया। उपलब्ध NFHS-5 (2019-21) के आंकड़ों के मुताबिक 15–49 वर्ष के 83.4% पुरुष और 70.6% महिलाएं कम-से-कम कभी-कभी मछली, चिकन या मांस खाने की बात कह चुके हैं। यह आंकड़ा राहुल गांधी के बताए 80% के बराबर राष्ट्रीय आबादी का सीधा आंकड़ा नहीं है, इसलिए दोनों को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा।
BRICS जैसे बड़े मंच पर खाने का मुद्दा क्यों गरमाया?
भारत दुनिया की सबसे विविध खान-पान परंपराओं वाले देशों में शामिल है। यहां शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के भोजन की मजबूत परंपराएं हैं। ऐसे में BRICS जैसे वैश्विक मंच पर परोसे गए भोजन को लेकर राजनीतिक बहस होना इस बात को दिखाता है कि खाना अब सिर्फ स्वाद या पसंद का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक पहचान का मुद्दा भी बन चुका है।
हालांकि, इस विवाद को BRICS सम्मेलन की व्यापक कूटनीतिक उपलब्धियों पर हावी करना भी उचित नहीं होगा। सम्मेलन में भारत, चीन, रूस समेत विस्तारित BRICS समूह के देशों ने वैश्विक राजनीति, व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा की।
वेज बनाम नॉन-वेज से आगे की असली बहस
BRICS डिनर का विवाद आखिरकार दो सवालों के बीच खड़ा दिखाई देता है—क्या भारत को अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के सामने अपनी पूरी culinary diversity दिखानी चाहिए थी, या फिर आयोजकों को किसी विशेष थीम के तहत चुने गए शाकाहारी भारतीय व्यंजनों को पेश करने का पूरा अधिकार था?
फिलहाल इतना साफ है कि एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मेन्यू घरेलू राजनीति का नया मुद्दा बन चुका है। राहुल गांधी के छोले-भटूरे वाले तंज से लेकर किरेन रिजिजू के पलटवार तक, BRICS की कूटनीतिक मेज अब भारत की सियासी बहस का हिस्सा भी बन गई है।
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14/09/2026
Xi Jinping India Visit: 7 साल बाद भारत आए शी जिनपिंग ने दिया बड़ा संदेश, मोदी से बातचीत के बीच Pahalgam पर चीन का रुख और डिनर से दूरी ने खींचा ध्यान
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का करीब सात साल बाद भारत दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। 12 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे शी करीब 24 घंटे भारत में रहे, 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अहम द्विपक्षीय बातचीत की। इस मुलाकात में दोनों देशों ने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
मोदी-शी की मुलाकात में सीमा विवाद पर साफ संदेश
प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की बातचीत में सबसे अहम मुद्दों में भारत-चीन सीमा विवाद भी रहा। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने की बुनियादी शर्त है। दोनों नेताओं ने सीमा सवाल के निष्पक्ष, उचित और दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता जताई।
मोदी ने साथ ही रिश्तों के लिए तीन ‘म्यूचुअल्स’—आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित—पर जोर दिया। व्यापार असंतुलन, सप्लाई चेन और बाजार तक पहुंच जैसे आर्थिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
शी ने कहा- भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार
चीन की ओर से जारी जानकारी के अनुसार शी जिनपिंग ने कहा कि चीन और भारत को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि साझेदार के रूप में काम करना चाहिए। उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखने की बात कही।
यह बयान ऐसे समय आया है जब 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन रिश्तों में लंबे समय तक तनाव रहा। हाल के वर्षों में दोनों देशों ने सीमा पर तनाव कम करने और संबंधों को धीरे-धीरे स्थिर करने की दिशा में कदम उठाए हैं। Reuters के मुताबिक 2024 में हुए disengagement समझौते के बाद दोनों देशों के बीच रिश्तों में सावधानीपूर्ण स्थिरता देखने को मिली है, हालांकि सीमा विवाद और कई रणनीतिक मतभेद अब भी कायम हैं।
Pahalgam पर BRICS का कड़ा रुख, चीन भी सहमत
नई दिल्ली BRICS घोषणा का एक महत्वपूर्ण पहलू 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा रहा। सभी BRICS सदस्य देशों की सहमति से जारी घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाया गया। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मानी गई, क्योंकि चीन भी इस सामूहिक घोषणा का हिस्सा था।
हालांकि घोषणा में पाकिस्तान का नाम लेकर आरोप नहीं लगाया गया, लेकिन पहलगाम हमले की स्पष्ट निंदा और आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख को भारत के लिए अहम संदेश के तौर पर देखा गया।
मोदी के गाला डिनर में क्यों नहीं पहुंचे शी?
BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत मंडपम में नेताओं और प्रतिनिधियों के लिए भव्य गाला डिनर आयोजित किया था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई नेता इसमें शामिल हुए, लेकिन शी जिनपिंग डिनर में नहीं पहुंचे।
शी की गैरमौजूदगी को लेकर कई तरह की अटकलें सामने आईं, लेकिन उनके डिनर में शामिल नहीं होने की आधिकारिक वजह स्पष्ट नहीं की गई है। कुछ सूत्रों ने बताया कि व्यस्त कार्यक्रम के बाद वह होटल लौटकर आराम करने चले गए थे। इसलिए इसे भारत के प्रति किसी नाराजगी या कूटनीतिक संदेश के तौर पर देखना फिलहाल उचित नहीं होगा।
एक्सपर्ट की सलाह- बातचीत जरूरी, लेकिन सतर्कता भी
विदेश मामलों के जानकार सुरेश गोयल के मुताबिक भारत और चीन के बीच संवाद जारी रहना चाहिए, लेकिन बीजिंग के साथ संबंधों में भारत को अपनी रणनीतिक सतर्कता और सावधानी से कोई समझौता नहीं करना चाहिए।
डिफेंस एक्सपर्ट रजत पंडित की राय भी इसी दिशा में है। उनके मुताबिक शी जिनपिंग का भारत दौरा दोनों देशों के रिश्तों को स्थिर करने की चल रही कोशिशों में एक व्यावहारिक कदम है। लेकिन भारत के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि सीमा विवाद को बाकी द्विपक्षीय संबंधों से अलग करके न देखा जाए।
यानी व्यापार, निवेश, उड़ानें और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की कोशिशें अपनी जगह हैं, लेकिन सीमा पर शांति और मौजूदा समझौतों का पालन भारत-चीन संबंधों की बुनियादी शर्त बना रहना चाहिए।
क्या भारत-चीन रिश्तों में नया अध्याय शुरू हुआ?
शी जिनपिंग की करीब 24 घंटे की भारत यात्रा को किसी बड़े समझौते या पूर्ण संबंध सुधार के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर है कि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सीधा संवाद फिर मजबूत हुआ है।
एक तरफ शी ने भारत-चीन को साझेदार के रूप में देखने की बात कही, वहीं पीएम मोदी ने सीमा पर शांति, आपसी सम्मान और संवेदनशीलता को रिश्तों की बुनियाद बताया। ऐसे में संदेश साफ है—भारत और चीन बातचीत जारी रखना चाहते हैं, लेकिन भारत के लिए सीमा सुरक्षा और रणनीतिक हितों पर सतर्कता पहले की तरह ही महत्वपूर्ण रहेगी।
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14/09/2026
BRICS Summit 2026: मोदी-शी जिनपिंग-पुतिन पहुंचे, लेकिन लूला क्यों रहे गायब? ब्राजील के राष्ट्रपति की गैरमौजूदगी ने खड़े किए बड़े कूटनीतिक सवाल
नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में दुनिया की नजरें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जैसे नेताओं पर टिकी थीं। लेकिन इस दौरान एक बड़ी गैरमौजूदगी भी कूटनीतिक चर्चा का विषय बनी रही—ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा सम्मेलन में शामिल नहीं हुए। उनकी जगह ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा ने देश का प्रतिनिधित्व किया।
BRICS के संस्थापक देशों में अकेले लूला क्यों हैं खास?
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने लूला की गैरमौजूदगी को खास तौर पर उल्लेखनीय बताया। उनका तर्क है कि 2009 में BRIC को औपचारिक रूप से शिखर स्तर पर आगे बढ़ाने वाले मूल चार देशों—ब्राजील, रूस, भारत और चीन—के मौजूदा नेताओं में लूला एकमात्र ऐसे नेता हैं जो उस मूल दौर से जुड़ी राजनीतिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यही वजह है कि BRICS जैसे मंच पर उनकी अनुपस्थिति को सिर्फ एक सामान्य प्रोटोकॉल संबंधी फैसला मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर ब्राजील द्वारा BRICS से दूरी बनाने का संकेत भी नहीं माना जा सकता।
लूला की जगह विदेश मंत्री माउरो विएरा पहुंचे
ब्राजील ने नई दिल्ली सम्मेलन में अपनी भागीदारी बनाए रखी। राष्ट्रपति लूला की जगह विदेश मंत्री माउरो विएरा ने ब्राजील का प्रतिनिधित्व किया। पहले से सामने आई ब्राजीलियाई रिपोर्टों के मुताबिक लूला ने सितंबर में होने वाले सम्मेलन के दौरान घरेलू राजनीतिक और चुनावी कार्यक्रमों को प्राथमिकता देने का फैसला किया था।
इसलिए लूला की अनुपस्थिति को लेकर यह कहना सही नहीं होगा कि ब्राजील ने BRICS को महत्व देना बंद कर दिया है। इसके उलट, नई दिल्ली घोषणा में ब्राजील समेत सदस्य देशों ने BRICS सहयोग, बहुपक्षवाद और ग्लोबल साउथ की भूमिका मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
BRICS बदल रहा है, इसलिए लूला की गैरमौजूदगी महत्वपूर्ण
BRICS अब 2009 के मूल चार-पांच देशों वाला समूह नहीं रह गया है। इसका विस्तार हो चुका है और 2026 के सम्मेलन में संगठन के सामने मध्य-पूर्व संघर्ष, वैश्विक व्यापार, आर्थिक प्रतिबंध, भुगतान व्यवस्था और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसे कई जटिल मुद्दे थे।
नई दिल्ली घोषणा में सदस्य देशों ने बहुपक्षवाद, अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने पर जोर दिया। घोषणा में BRICS के विस्तार को संगठन की बढ़ती प्रभावशीलता और आकर्षण का संकेत भी बताया गया है।
क्या ब्राजील BRICS से दूरी बना रहा है?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। लूला की गैरमौजूदगी राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय जरूर बनी, लेकिन ब्राजील ने विदेश मंत्री के जरिए उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया। सम्मेलन के बाद जारी नई दिल्ली घोषणा में ब्राजील सहित सदस्य देशों ने BRICS के दीर्घकालिक संस्थागत विकास और सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।
इस पूरे घटनाक्रम को इसलिए ज्यादा दिलचस्प माना जा रहा है क्योंकि BRICS का आकार बढ़ रहा है, उसके भीतर देशों के रणनीतिक हित अलग-अलग हैं और फिर भी संगठन ग्लोबल साउथ के लिए एक साझा मंच के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में उसके सबसे पुराने सदस्य देशों में से एक के राष्ट्रपति की अनुपस्थिति निश्चित रूप से राजनीतिक विश्लेषण का विषय बनती है।
लूला की गैरमौजूदगी का असली संदेश क्या?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लूला की अनुपस्थिति को BRICS के खिलाफ किसी स्पष्ट राजनीतिक संकेत के तौर पर पेश करने के बजाय ब्राजील की घरेलू प्राथमिकताओं और बदलते वैश्विक समीकरणों के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित होगा। वहीं ब्राजील की मौजूदगी यह संकेत देती है कि देश संगठन से अलग होने की दिशा में नहीं बढ़ रहा है।
नई दिल्ली में हुए सम्मेलन ने एक बार फिर दिखाया कि BRICS अब सिर्फ पांच देशों का आर्थिक समूह नहीं, बल्कि तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज बनने की कोशिश कर रहा एक बड़ा कूटनीतिक मंच है।
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14/09/2026
UK Breakup: क्या टूटने की कगार पर है ब्रिटेन? स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता आज करेंगे बड़ा ऐलान, Cardiff में बनेगी नई रणनीति
यूनाइटेड किंगडम के भविष्य को लेकर सोमवार को कार्डिफ में होने वाली एक अहम बैठक ने ब्रिटिश राजनीति में हलचल तेज कर दी है। स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के स्वतंत्रता समर्थक राजनीतिक दलों के नेता पहली बार एक साझा मंच पर अपने-अपने क्षेत्रों के आत्मनिर्णय और संवैधानिक भविष्य को लेकर संयुक्त रणनीति पर आगे बढ़ेंगे। बैठक में SNP नेता जॉन स्विनी, Plaid Cymru नेता रून एप आयोवर्थ और Sinn Féin की मिशेल ओ'नील शामिल होंगी।
कार्डिफ में क्या होने वाला है?
रिपोर्टों के अनुसार तीनों नेता सोमवार को Cardiff में एक Memorandum of Understanding (MoU) या संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर करने की तैयारी में हैं। इसका मुख्य उद्देश्य Westminster पर दबाव बनाना है कि स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के लोगों को अपने संवैधानिक भविष्य पर फैसला करने का अधिकार दिया जाए और स्वतंत्रता या संवैधानिक बदलाव को लेकर जनमत संग्रह की राह आसान की जाए।
इसलिए इसे सीधे तौर पर “आज UK तीन हिस्सों में बंट जाएगा” कहना सही नहीं होगा। असल में यह बैठक ब्रिटेन के मौजूदा संवैधानिक ढांचे को चुनौती देने वाले एक साझा राजनीतिक अभियान की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।
तीनों क्षेत्रों में पहली बार एक जैसी राजनीतिक तस्वीर
इस घटनाक्रम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि 2026 के चुनावी बदलावों के बाद ब्रिटेन के इन तीनों devolved nations में सत्ता का नेतृत्व अब ऐसी पार्टियों के हाथ में है, जो अपने-अपने क्षेत्रों के लिए किसी न किसी रूप में स्वतंत्रता या संवैधानिक बदलाव का समर्थन करती हैं। मई में वेल्स में Plaid Cymru की ऐतिहासिक सफलता के बाद यह स्थिति और मजबूत हुई।
स्कॉटलैंड में SNP के जॉन स्विनी, वेल्स में Plaid Cymru के रून एप आयोवर्थ और उत्तरी आयरलैंड में Sinn Féin की मिशेल ओ'नील अब साझा रूप से आत्मनिर्णय का मुद्दा उठा रहे हैं। बैठक में Sinn Féin की अध्यक्ष Mary Lou McDonald के भी शामिल होने की उम्मीद है।
क्या ब्रिटेन के टूटने का खतरा सच में बढ़ गया है?
इस बैठक को ब्रिटेन के तत्काल विभाजन के रूप में देखना फिलहाल जल्दबाजी होगी। स्वतंत्रता के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में राजनीतिक समर्थन, कानूनी प्रक्रिया और जनमत—तीनों अलग-अलग हैं। लेकिन यह जरूर है कि पहली बार इन तीनों राजनीतिक ताकतों का समन्वित अभियान Westminster के सामने ब्रिटेन के संवैधानिक भविष्य का सवाल एक साथ उठा रहा है।
स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता पर दोबारा जनमत संग्रह की मांग पहले से जारी है, जबकि उत्तरी आयरलैंड में आयरलैंड के साथ संभावित एकीकरण और वेल्स में अधिक स्वायत्तता/स्वतंत्रता का मुद्दा भी राजनीतिक बहस में है। Cardiff बैठक इन अलग-अलग आंदोलनों को साझा राजनीतिक मंच देने की कोशिश है।
Andy Burnham के बयान से भी बढ़ी हलचल
बैठक से पहले ब्रिटेन की राजनीति में प्रधानमंत्री Andy Burnham की उन टिप्पणियों को भी अहम माना जा रहा है, जिनमें उन्होंने संकेत दिया था कि अगर स्कॉटिश स्वतंत्रता के लिए स्पष्ट जनसमर्थन दिखाई देता है तो नए जनमत संग्रह की संभावना पर विचार किया जा सकता है। स्वतंत्रता समर्थक नेताओं ने इन टिप्पणियों को अपने अभियान के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के रूप में लिया है।
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की हालिया आयरलैंड यात्रा के दौरान उनके द्वारा आयरलैंड के एकीकरण के समर्थन में दिए गए बयान ने भी इस पूरे संवैधानिक विवाद को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है।
ब्रिटेन के लिए क्यों अहम है यह बैठक?
अगर स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के स्वतंत्रता समर्थक दल लंबे समय तक एक साझा राजनीतिक मोर्चा बनाए रखते हैं, तो Westminster पर संवैधानिक सुधार को लेकर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि UK का विभाजन तय हो गया है।
फिलहाल Cardiff में होने वाली बैठक को ब्रिटेन के भविष्य पर एक संयुक्त राजनीतिक दबाव की शुरुआत के तौर पर देखना ज्यादा सटीक होगा। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या Westminster इन मांगों को स्वीकार करता है, बातचीत शुरू करता है या फिर संवैधानिक टकराव और गहरा होता है।
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14/09/2026
80 हजार प्लास्टिक बोतलों से बना घर, न ईंट न पत्थर! बांग्लादेश के कपल का अनोखा प्रयोग, प्रदूषण से निपटने का दिखाया रास्ता
प्लास्टिक कचरा आज दुनिया के सामने बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। दक्षिण एशिया के भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में प्लास्टिक प्रदूषण लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। इसी बीच बांग्लादेश से सामने आई एक अनोखी पहल ने लोगों का ध्यान खींचा था, जहां एक दंपती ने बेकार प्लास्टिक की बोतलों को ही घर की दीवारों के निर्माण में इस्तेमाल कर दिया।
बोतलों से बना अनोखा 'बॉटल हाउस'
यह अनोखा घर बांग्लादेश के लालमनिरहाट जिले के कालिगंज उपजिले के नওदाबाश गांव में बनाया गया था। रशेदुल आलम और उनकी पत्नी असमा खातून, दोनों पर्यावरण विज्ञान से जुड़े रहे हैं। उन्होंने सामान्य ईंटों के बजाय प्लास्टिक की खाली बोतलों को निर्माण सामग्री के तौर पर इस्तेमाल करने का फैसला किया।
रिपोर्ट के मुताबिक, घर की दीवारों में इस्तेमाल की गई प्लास्टिक की बोतलों को पहले रेत से भरा गया। इसके बाद इन्हें एक-दूसरे के ऊपर रखकर सीमेंट और रेत के मिश्रण से जोड़ा गया। बोतलों के गोल और चौकोर निचले हिस्से दीवार की बाहरी सतह पर अलग-अलग पैटर्न बनाते हैं, जबकि बोतलों के ढक्कन अंदर की ओर दिखाई देते हैं।
80 हजार बोतलों का हुआ इस्तेमाल
प्रथम आलो की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 1,700 वर्ग फुट के इस घर के निर्माण में लगभग 80 हजार प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल किया गया था। इनमें एक लीटर, आधा लीटर और 250 मिलीलीटर की बोतलें शामिल थीं। घर में चार बेडरूम, रसोई, डाइनिंग रूम, दो बाथरूम और बरामदा रखने की योजना थी।
इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य केवल एक अनोखा घर बनाना नहीं था। दंपती ने ऐसी सामग्री को दोबारा इस्तेमाल करने की कोशिश की, जो सामान्य तौर पर कूड़े में फेंक दी जाती है। इससे प्लास्टिक कचरे को उपयोगी निर्माण सामग्री में बदलने का एक प्रयोग सामने आया।
ईंट की जगह प्लास्टिक की बोतलें क्यों?
दंपती के मुताबिक, उन्होंने इंटरनेट पर दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्लास्टिक बोतलों से बनने वाले 'इको हाउस' के बारे में जानकारी हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने अपने इलाके में उपलब्ध बेकार बोतलों को इकट्ठा करना शुरू किया। रिपोर्ट के अनुसार, बोतलें स्थानीय स्तर पर और पुराने प्लास्टिक जमा करने वालों से खरीदी गई थीं।
इस प्रयोग की खासियत यह थी कि कचरे को निर्माण सामग्री में बदलने की कोशिश की गई। यही वजह थी कि स्थानीय लोगों के बीच भी यह घर आकर्षण का केंद्र बन गया था।
क्या प्लास्टिक का घर भविष्य का समाधान है?
प्लास्टिक बोतलों से घर बनाना निश्चित रूप से दिलचस्प और पर्यावरण के लिहाज से उपयोगी प्रयोग हो सकता है, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर पारंपरिक निर्माण का विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी। किसी भी ऐसे निर्माण मॉडल की सफलता के लिए संरचनात्मक मजबूती, आग से सुरक्षा, लंबे समय की टिकाऊ क्षमता, गर्मी, नमी और स्थानीय भवन नियमों की वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी।
बांग्लादेश के इस घर पर विशेषज्ञों ने भी इसे एक अभिनव प्रयोग माना था। बांग्लादेश यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (BUET) के वास्तुकला विशेषज्ञ के मुताबिक, देश में इस तरह का घर उस समय अपनी तरह का पहला उदाहरण माना जा रहा था।
कचरे से घर बनाने की सोच
आज जब प्लास्टिक कचरे के निपटान को लेकर दुनिया भर में बहस चल रही है, ऐसे प्रयोग यह सवाल जरूर उठाते हैं कि जिस चीज को हम कचरा समझकर फेंक देते हैं, क्या उसे दोबारा उपयोगी संसाधन बनाया जा सकता है?
बांग्लादेश का यह 'बॉटल हाउस' इसी सोच का एक अनोखा उदाहरण है। हालांकि इसे प्रदूषण की समस्या का पूर्ण समाधान कहना सही नहीं होगा, लेकिन रीसाइक्लिंग और पुन: उपयोग की दिशा में ऐसी पहल लोगों को नए विकल्पों के बारे में सोचने के लिए जरूर प्रेरित करती है।
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14/09/2026
पाकिस्तान से निकाले जाएंगे अफगान मेडिकल छात्र? लड़कियों का करियर दांव पर, कोर्ट ने लगाई रोक
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब उन अफगान छात्रों पर पड़ता दिख रहा है, जो पाकिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। पाकिस्तान मेडिकल एंड डेंटल काउंसिल (PMDC) ने अफगान मेडिकल और डेंटल छात्रों को वापस अफगानिस्तान भेजने का निर्देश दिया था। इस फैसले से सैकड़ों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया, जबकि महिला छात्रों के सामने मुश्किलें और भी गंभीर हैं। हालांकि, लाहौर हाई कोर्ट ने 11 सितंबर को इस आदेश के अमल पर अस्थायी रोक लगा दी।
नाइट ड्यूटी के दौरान फोन पर आया मैसेज
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, लाहौर में मेडिकल की छात्रा अलीशबा 8 सितंबर की रात मैटरनिटी वार्ड में नाइट शिफ्ट पर थीं। इसी दौरान उनके फोन पर लगातार मैसेज आने लगे। उन्हें बताया गया कि करीब 20 अफगान छात्रों को कॉलेज से निकाला जा रहा है। शुरुआत में अलीशबा को इस बात पर भरोसा नहीं हुआ। लेकिन कुछ ही घंटों बाद उनके कॉलेज की कथित निष्कासन सूची सोशल मीडिया पर फैल गई और उसमें उनका नाम भी शामिल था।
अल जजीरा के अनुसार, सूची में शामिल छात्रों को पाकिस्तान छोड़ने की तैयारी के लिए तीन दिन से भी कम समय दिया गया था। अलीशबा के कॉलेज में अफगान छात्रों को कक्षाओं में आने से भी रोका गया और उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं किए जाने की बात कही गई।
महिला छात्रों के सामने सबसे बड़ा संकट
इस फैसले का असर अफगान महिला मेडिकल छात्रों पर खास तौर पर पड़ सकता है। अल जजीरा ने बताया कि अफगानिस्तान में महिलाओं के विश्वविद्यालयों और मेडिकल शिक्षा तक पहुंच पर गंभीर प्रतिबंध हैं। ऐसे में पाकिस्तान से वापस भेजे जाने का मतलब कई छात्राओं के लिए मेडिकल की पढ़ाई और डॉक्टर बनने के सपने का खत्म होना हो सकता है।
अलीशबा ने बताया कि उनकी मां ने उन्हें मेडिकल डिग्री पूरी करते और महिला मरीजों का इलाज करते देखने का सपना देखा था। अब अचानक पढ़ाई रुकने की आशंका ने उनके भविष्य को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है। उन्होंने खुद को दोनों देशों के राजनीतिक विवाद के बीच फंसा हुआ बताया।
पाकिस्तान में कितने अफगान मेडिकल छात्र?
PMDC के अनुसार पाकिस्तान के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में 200 से ज्यादा अफगान छात्र पढ़ रहे हैं और सितंबर में जारी निर्देश का असर इनमें से अधिकांश पर पड़ा। नई दाखिले, ट्रांसफर और माइग्रेशन पर भी रोक लगाने का निर्देश दिया गया था।
मानवाधिकार संगठनों ने भी इस फैसले पर चिंता जताई। ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि अफगान महिला छात्रों को वापस भेजने से उनकी शिक्षा और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
लाहौर हाई कोर्ट ने लगाई अस्थायी रोक
मामला अदालत पहुंचने के बाद अफगान मेडिकल छात्रों को फिलहाल बड़ी राहत मिली है। लाहौर हाई कोर्ट ने PMDC के उन निर्देशों के अमल पर रोक लगा दी, जिनके तहत अफगान मेडिकल छात्रों को वापस अफगानिस्तान भेजने को कहा गया था। अदालत ने छात्रों को अपनी पढ़ाई जारी रखने और परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति देने का निर्देश दिया है।
अदालत में PMDC की ओर से छात्रों के दस्तावेज और वीजा संबंधी मुद्दे भी उठाए गए। वहीं छात्रों की ओर से आदेश को चुनौती देते हुए कहा गया कि उन्हें इस तरह पढ़ाई से बाहर करना कानूनी तौर पर उचित नहीं है। मामले पर आगे की सुनवाई 18 सितंबर को होनी है।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव के बीच शिक्षा बनी शिकार
अफगान छात्रों का मामला ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच रिश्तों में तनाव बढ़ा हुआ है। लेकिन इस विवाद का सीधा असर उन छात्रों पर पड़ रहा है, जो कई वर्षों से पाकिस्तान में अपनी मेडिकल शिक्षा पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल हाई कोर्ट की अंतरिम राहत से छात्रों को कुछ समय जरूर मिला है, लेकिन उनका भविष्य अभी भी अदालत के अगले फैसले पर निर्भर करता है।
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14/09/2026
BRICS Summit 2026: 7 साल बाद भारत आए शी जिनपिंग की विदाई, फैमिली फोटो के बाद चीन रवाना; मोदी से मुलाकात में दिया बड़ा संदेश
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद रविवार को नई दिल्ली से चीन रवाना हो गए। करीब सात साल बाद भारत आए शी जिनपिंग ने ब्रिक्स सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन सुना और अन्य नेताओं के साथ फैमिली फोटो सेशन में हिस्सा लिया। इसके बाद वह निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत दिल्ली से रवाना हुए।
सात साल बाद भारत आए थे शी जिनपिंग
शी जिनपिंग का यह भारत का करीब सात साल बाद पहला दौरा था। इससे पहले वह 2019 में भारत आए थे। इस बार उनका दौरा खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि ब्रिक्स सम्मेलन के अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की। दोनों नेताओं के बीच भारत-चीन संबंधों, सीमा विवाद, व्यापार और आपसी सहयोग समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
मोदी से मुलाकात में बोले- भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार
मोदी-शी बैठक में चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि भारत और चीन को एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार के रूप में देखना चाहिए। चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक शी ने दोनों देशों के रिश्तों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा कि दोनों देशों के मतभेद विवाद में नहीं बदलने चाहिए। भारत की ओर से आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित को रिश्तों का आधार बनाए रखने पर जोर दिया गया।
सीमा पर शांति को लेकर क्या हुआ?
भारत और चीन के रिश्तों में सबसे संवेदनशील मुद्दा सीमा विवाद रहा है। बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा से जुड़े सवाल का न्यायसंगत, उचित और दोनों देशों को स्वीकार्य समाधान तलाशने की प्रतिबद्धता जताई। साथ ही सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर भी जोर दिया गया। भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति और सौहार्दपूर्ण माहौल द्विपक्षीय रिश्तों की आगे की प्रगति के लिए जरूरी आधार है।
फैमिली फोटो के बाद सीधे एयरपोर्ट रवाना हुए शी
ब्रिक्स सम्मेलन के अंतिम चरण में शी जिनपिंग ने आउटरीच बैठक में हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री मोदी समेत अन्य नेताओं के साथ फैमिली फोटो खिंचवाई। इसके बाद उनका दिल्ली दौरा समाप्त हो गया और वह एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए। उनका करीब 24 घंटे का भारत दौरा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत के लिहाज से बेहद अहम रहा।
भारत-चीन रिश्तों में नए दौर के संकेत?
मोदी और शी की बातचीत से भारत-चीन संबंधों में संवाद और संपर्क बढ़ाने के संकेत जरूर मिले हैं। दोनों देशों ने व्यापार, लोगों के बीच संपर्क, सीधी उड़ानों और आर्थिक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर भी चर्चा की। हालांकि सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे अभी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। इसलिए इसे तत्काल बड़े बदलाव के बजाय रिश्तों को स्थिर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
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14/09/2026
भारत-बांग्लादेश सीमा पर BSF की फायरिंग में बांग्लादेशी तस्कर की मौत, अस्पताल में इलाज के दौरान तोड़ा दम
भारत-बांग्लादेश सीमा पर पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले में BSF की फायरिंग में घायल हुए एक बांग्लादेशी नागरिक की इलाज के दौरान मौत हो गई। मृतक की पहचान 38 वर्षीय असदुल हक के रूप में हुई है। बांग्लादेशी अधिकारियों के मुताबिक घटना ठाकुरगांव जिले के पीरगंज उपजिले से लगी सीमा के पास हुई।
सीमा पार करने के दौरान हुई फायरिंग
रिपोर्टों के अनुसार, यह घटना शनिवार तड़के भारत की सीमा के अंदर हुई। चोक्शीबानंद/चक्षशिवानंद BSF कैंप से जुड़े जवानों ने सीमा के पास मौजूद एक समूह पर गोलीबारी की। बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के अनुसार, यह समूह कथित तौर पर तस्करी की गतिविधियों में शामिल था। घटना सीमा स्तंभ संख्या 333 के पास बताई गई है।
गोली लगने से घायल हुआ असदुल हक
फायरिंग में असदुल हक गंभीर रूप से घायल हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक BSF जवानों ने उसे भारत के उत्तर दिनाजपुर जिले के रायगंज इलाके में अस्पताल पहुंचाया, जहां उसका इलाज चल रहा था। हालांकि, बाद में उसकी हालत बिगड़ गई और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
इस घटना में दो अन्य लोगों के भी घायल होने की खबर है। स्थानीय रिपोर्टों में उनकी पहचान मोस्ताकिम और श्री उदा रॉय के तौर पर की गई है। दोनों की हालत गंभीर बताई गई है।
BGB ने बताया 'पहचाना हुआ तस्कर'
बांग्लादेश के BGB 42 बटालियन की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक असदुल हक कथित तौर पर एक पहचाना हुआ ड्रग तस्कर था और मानव तस्करी से भी जुड़ा हुआ था। BGB के अनुसार उसके खिलाफ पीरगंज थाने में कई मामले दर्ज थे। हालांकि, घटना की पूरी परिस्थितियों और फायरिंग के कारणों को लेकर दोनों देशों के सीमा सुरक्षा बलों के बीच बातचीत जारी है।
फ्लैग मीटिंग में होगी चर्चा
BGB के अधिकारियों ने कहा है कि घटना को लेकर BSF से फ्लैग मीटिंग के जरिए जानकारी साझा की जाएगी। शुरुआती जानकारी के मुताबिक घटना भारतीय सीमा के अंदर हुई थी। BGB अधिकारियों ने यह भी कहा कि उन्हें असदुल की मौत की आधिकारिक सूचना BSF की ओर से मिलने का इंतजार था।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर तस्करी और अवैध घुसपैठ को लेकर BSF और BGB के बीच समय-समय पर तनाव की स्थिति सामने आती रही है। इस मामले में भी आगे की जानकारी दोनों पक्षों की आधिकारिक बातचीत के बाद और स्पष्ट हो सकती है।
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14/09/2026
Putin का भारत को बड़ा डिफेंस ऑफर: Su-57 से S-400 तक तो चर्चा में था, अब Voronezh-M रडार और न्यूक्लियर सबमरीन की एंट्री
नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग एक बार फिर चर्चा के केंद्र में रहा। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान मॉस्को की ओर से Su-57 स्टील्थ फाइटर, Su-30MKI के बड़े अपग्रेड, अतिरिक्त S-400 एयर डिफेंस सिस्टम और Pantsir-S1M समेत कई रक्षा प्रस्ताव सामने आए। अब रिपोर्टों में दो और बेहद रणनीतिक क्षेत्रों—लंबी दूरी के रडार और रणनीतिक परमाणु पनडुब्बियों—से जुड़े प्रस्तावों का भी जिक्र है।
Su-57 से 'Super Sukhoi' तक रूस का बड़ा प्लान
ThePrint की रिपोर्ट के मुताबिक रूस भारत को Su-57 की सीधे खरीद के साथ-साथ भारत में इसके संयुक्त उत्पादन का विकल्प भी दे रहा है। प्रस्ताव में दो स्क्वाड्रन विमान सीधे लेने और इसके बाद भारत में तीन से पांच स्क्वाड्रन के संयुक्त उत्पादन की बात सामने आई है। रूस ने Su-57 के इंजन से जुड़ी तकनीक साझा करने की संभावना भी जताई है।
इसके साथ करीब 260 Su-30MKI लड़ाकू विमानों को अत्याधुनिक 'Super Sukhoi' कॉन्फिगरेशन में अपग्रेड करने की योजना भी चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक इस परियोजना की अनुमानित लागत 11 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती है। अपग्रेड में AESA रडार, आधुनिक एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और नए इंजन जैसी क्षमताएं शामिल हो सकती हैं।
S-400 के साथ Pantsir-S1M से मजबूत होगा एयर डिफेंस
रूस ने भारत के लिए अतिरिक्त S-400 एयर डिफेंस सिस्टम और Pantsir-S1M जैसे शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम का प्रस्ताव भी रखा है। Pantsir-S1M को महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, एयरबेस, कमांड पोस्ट और अन्य हाई-वैल्यू इंस्टॉलेशन की पॉइंट डिफेंस के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें मिसाइलों के साथ 30 मिमी तोपें भी होती हैं और यह विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल तथा कुछ प्रिसिजन-गाइडेड हथियारों जैसे खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है।
इस तरह देखा जाए तो रूस का प्रस्ताव केवल एक लड़ाकू विमान की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि फाइटर जेट + लंबी दूरी की एयर डिफेंस + शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस + रडार + अंडरवॉटर स्ट्रैटेजिक क्षमता का व्यापक पैकेज दिखाई देता है।
अब सामने आया Voronezh-M रडार का नाम
सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व लंबी दूरी के रडार प्रस्ताव का है। ThePrint के मुताबिक रूस ने भारत के सामने रडार और रणनीतिक पनडुब्बियों को लेकर प्रस्ताव रखे हैं, हालांकि उस समय रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं था कि किस खास रडार मॉडल और किस प्लेटफॉर्म की बात हो रही है। बाद की रिपोर्टों में इस रडार को Voronezh-M से जोड़ा गया है।
Voronezh परिवार रूस की लंबी दूरी की मिसाइल-अर्ली-वॉर्निंग रडार प्रणालियों में शामिल है। इसका मुख्य उद्देश्य लंबी दूरी से संभावित बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपण और अन्य हवाई/अंतरिक्ष खतरों की शुरुआती चेतावनी देना है। विभिन्न Voronezh संस्करण अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बैंड और निगरानी भूमिकाओं के लिए विकसित किए गए हैं।
रिपोर्टों में Voronezh-M की लगभग 6,000 किलोमीटर या उससे अधिक की निगरानी क्षमता का उल्लेख किया गया है। ऐसी प्रणाली भारत के लिए रणनीतिक अर्ली-वॉर्निंग नेटवर्क को मजबूत कर सकती है, खासकर लंबी दूरी के मिसाइल खतरों की निगरानी के संदर्भ में।
अकुला-क्लास न्यूक्लियर सबमरीन पर भी बातचीत
रूस और भारत के बीच परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का सहयोग नया नहीं है। भारत पहले रूस से Akula-class nuclear-powered attack submarine लीज पर ले चुका है, जिसे भारतीय नौसेना में INS Chakra के रूप में शामिल किया गया था। अब रूसी प्रस्तावों में रणनीतिक पनडुब्बी क्षेत्र को भी शामिल किए जाने की खबर सामने आई है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। ThePrint ने रणनीतिक सबमरीन से जुड़े प्रस्ताव की पुष्टि की है, लेकिन रिपोर्ट में प्लेटफॉर्म का नाम और प्रस्ताव की पूरी प्रकृति स्पष्ट नहीं की गई थी। इसलिए इसे अभी रूस की ओर से रणनीतिक पनडुब्बी सहयोग का प्रस्ताव कहना अधिक सटीक है, न कि इसे पक्का Akula-class सौदा मान लेना।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा पैकेज?
अगर इन सभी प्रस्तावों को एक साथ देखा जाए तो रूस भारत के सामने अपनी रक्षा साझेदारी को पारंपरिक हथियार खरीद से आगे ले जाने की कोशिश करता दिखता है। Su-57 के जरिए पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू क्षमता, Super Sukhoi के जरिए मौजूदा फ्लीट का आधुनिकीकरण, S-400 और Pantsir के जरिए बहुस्तरीय एयर डिफेंस तथा लंबी दूरी के रडार और रणनीतिक पनडुब्बियों के जरिए रणनीतिक निगरानी और समुद्री क्षमता मजबूत करने की दिशा में सहयोग का प्रस्ताव है।
भारत-रूस रक्षा संबंधों में यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब नई दिल्ली अपनी सैन्य क्षमताओं को तेजी से आधुनिक बनाने के साथ-साथ स्वदेशी उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण पर भी जोर दे रही है। रूस की ओर से भारत में संयुक्त उत्पादन और तकनीक साझा करने की पेशकश इसी बड़े बदलाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है।
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