History Hour
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02/10/2026
1876 में ली गयी गांधी जी के बचपने की तस्वीर तब उनकी उम्र महज 7 साल थी
हज़रत निजामुद्दीन औलिया रह. की एक छोटी सी दास्तान डॉ इसरार अहमद साहब की ज़ुबानी.....
आमेर क़िले की सबसे ख़ूबसूरत और पहचान बनने वाली जगहों में से एक है गणेश पोल। पहली नज़र में यह सिर्फ़ एक शानदार प्रवेश द्वार दिखाई देता है, लेकिन इसकी कहानी इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प है।
जिस आमेर को आज लाखों लोग देखने आते हैं, वही कभी बादशाह अकबर का ससुराल भी था। 1562 ई. में आमेर के शासक राजा भारमल की पुत्री का विवाह अकबर से हुआ और यहीं से मुग़ल और कछवाहा राजवंश के बीच एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू हुआ। यही रिश्ता आगे चलकर कई दशकों तक दोनों सल्तनतों के बीच मज़बूत साझेदारी की बुनियाद बना।
करीब साठ वर्ष बाद, 1621 ई. के आसपास, मिर्ज़ा राजा जय सिंह प्रथम ने इस भव्य गणेश पोल का निर्माण करवाया। यह सिर्फ़ एक दरवाज़ा नहीं था, बल्कि शाही महलों की दहलीज़ थी। इसके आगे आम लोगों का प्रवेश नहीं था। यहीं से राजा, शाही परिवार और चुनिंदा मेहमान निजी महलों की ओर जाया करते थे। ऊपर बने सुहाग मंदिर की जालियों के पीछे से राजघराने की महिलाएँ नीचे होने वाले दरबार और समारोह देखा करती थीं, जबकि उन्हें कोई देख नहीं सकता था।
अगर कभी आमेर क़िले जाएँ, तो इस दरवाज़े को सिर्फ़ इसकी रंगीन नक्काशी और ख़ूबसूरती के लिए मत देखिए। कुछ पल ठहरकर यह भी सोचिए कि इसी रास्ते से कभी राजाओं की सवारियाँ गुज़री होंगी, मुग़ल दूत आए होंगे और इतिहास के कई अहम फ़ैसलों की आहटें इसी चौखट से होकर गुज़री होंगी।
जंग ए आजादी का वो मतवाला जिसने गुलाम भारत में खुद को दफन करने से ही इनकार कर दिया था
महात्मा गांधी का वो ख़्वाब जो कभी पूरा न हो सका।
जयपुर के आमेर क़िले में मौजूद इस शीश महल की तामीर 17वीं सदी में राजा जय सिंह ने करवाई थी। कहते हैं कि इसे इस तरह तैयार किया गया था कि कम रोशनी में भी पूरा कमरा जगमगा उठे। उस दौर में जब यहाँ दीये जलाए जाते थे तो इसमें जड़े हजारों शीशे उस रौशनी को कई गुना बढ़ा देते थे, यूं लगता होगा जैसे एक चिराग से हज़ारों चिराग जल उठे हों।
दरअसल, इसका मक़सद सिर्फ़ शान-ओ-शौकत दिखाना नहीं था, बल्कि रानी और शाही ख़ानदान के लिए एक ऐसा ख़ास कमरा बनाना था जहाँ सर्दियों में भी गर्माहट महसूस हो और रातों में रोशनी का एक ख़ूबसूरत माहौल बना रहे।
आज जब हम इसे देखते हैं, तो बस इसकी चमक नज़र आती है लेकिन असल में ये उस दौर के हुनर, सलीक़े और ख़्वाबों की एक झलक है, जो अब भी इन दीवारों में ज़िंदा है।
02/10/2026
बैतुल मुक़द्दस की फतह के बाद सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी अपने लश्कर के साथ शहर में दाखिल होते हुए
02/10/2026
4 जुलाई 1187 को हत्तीन की जंग में क्रूसेडर्स को बुरी तरह से हराने के बाद सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी ने छोटे-छोटे इलाकों को फ़तेह करते हुए यरुशलम की ओर आगे बढ़ते हुए 20 सितम्बर को यरुशलम शहर को घेर लिया। उस समय शहर सुल्तान के जीते हुए इलाकों से भागे हुए रिफ्यूजीस से भरा हुआ था और शहर में 14 से भी कम सलेबी नाइट्स और कुछ सिपाही ही मौजूद थे।
क्योंकि यरुशलम के ज्यादातर सिपाही हत्तीन की जंग में मारे जा चुके थे। और यरुशलम का बादशाह गी ऑफ़ लूजिगनन सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी का कैदी बन गया था। अब शहर का कमांडर बेलियन ही अपने बचे हुए सिपाहियों की फौज को लीड कर रहा था।
बेलियन ने सलाहुद्दीन अय्यूबी की फौज को 2 अक्टूबर तक शहर से बाहर रोके रखा। 2 अक्टूबर को बेलियन ने भी सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी के सामने हथियार डाल दिए। और यूँ सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी ने यरुशलम शहर को फतह कर लिया। इसके बाद पोप ने तीसरी सलीबी जंग का नारा दे कर ईसाइयों को एकजुट किया। लेकिन फिर भी सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी से वो दोबारा शहर को हासिल नहीं कर सके।
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02/10/2026
27 जनवरी 1948 की सुबह कत्ल किये जाने के ठीक 3 दिन पहले गांधी जी दिल्ली के महरौली में हज़रत बख्तियार काकी रहमतुल्लाह एलैह के दरगाह पहुंचे थे। ये दरगाह कुतुबमीनार के क़रीब है आख़री मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर ने बख्तियार काकी रहमतुल्लाह एलैह के बगल में दफन होने की वसीयत की थी जो उनको नसीब नही हुई इस दरगाह को 1948 दंगे में दंगाइयों ने काफी नुकसान पहुँचाया था।
दंगे की वजह से मुसलमान यहां से पलायन कर रहे थे। गांधी जी दंगो को शांत कराने और मुसलमानों को भरोसा दिलाने गए थे कि आप कही मत जाएं सबकुछ पहले की तरह हो जाएगा दरगाह की दोबारा मरम्मत कराई जाएगी जिसको लेकर गांधी जी भूख हड़ताल पर भी बैठे। लेकिन बावजूद मुसलमान पलायन कर चुके थे मुस्लिम बहुल आबादी वाले मेहरौली में अब मुसलमान कम, ऐतिहासिक मक़बरे और मस्ज़िदे ज़्यादा है। दर्ज़नों मस्ज़िदें वीरान पड़ी है।
02/10/2026
हिन्दोस्तान का इतिहास 2 अक्टूबर की तारीख़ को कभी नहीं भुला सकता, क्यूंकि आज के दिन 2 अज़ीम शख्शियतें इस दुनिया में आयी थीं। जिन्होंने न सिर्फ इस मुल्क बल्कि पूरी इंसानियत को एक नयी दिशा दी उनका नाम है महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री। गांधी जी ने दुनिया को सिखाया कि अहिंसा भी सबसे बड़ी ताक़त हो सकती है। उन्होंने सत्याग्रह से साम्राज्यों को हिला दिया और इंसानियत को रास्ता दिखाया।
शास्त्री जी ने हमें याद दिलाया कि देश की असली शक्ति जवान और किसान हैं। उनकी सादगी का आलम यह था कि रेल मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपनी माँ को कभी यह नहीं बताया कि वह मंत्री हैं। हमेशा कहते ‘मैं रेलवे में नौकरी करता हूँ।’ एक बार उनकी माँ कार्यक्रम में पहुँच गईं और सब हैरान रह गए जब पता चला कि वही ‘रेलवे कर्मचारी’ दरअसल देश के मंत्री हैं।
जब पत्रकारों ने पूछा तो शास्त्री जी ने कहा ‘अगर माँ को पता चल जाता तो वह सिफ़ारिशें करने लगतीं, और उनके दिल में अहंकार आ जाता।’
गांधी जी का सत्य और शास्त्री जी की ईमानदारी, यही हमारी असली पूँजी है। आज का दिन हमें यही याद दिलाता है कि ताक़त पद या दौलत में नहीं, बल्कि इंसानियत और सादगी में है।
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