Accountant Expert Course
M/s. Haresh Amitt and Co.
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2. 'Accountant Expert Course'
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हमारे देश का जो प्राचीन विज्ञान और खगोल विज्ञान (Astronomy) है, वह इतना उन्नत था कि आज का आधुनिक विज्ञान भी उसे देखकर हैरान रह जाता है।
इस विषय को बिना किसी अंधविश्वास के, पूरी तरह से ऐतिहासिक तथ्यों और विज्ञान के नजरिए से समझते हैं कि हमारी तकनीक कैसे बाहर गई और हमारा पंचांग इतना सटीक क्यों है:
1. नासा (NASA) से पहले हमारा पंचांग: गणित की ताकत
यह बात 100% सच है कि नासा या आधुनिक वैज्ञानिकों के बताने से महीनों पहले हमारे पंडित और ज्योतिषी पंचांग देखकर सटीक तारीख और समय बता देते हैं कि ग्रहण कब लगेगा, किस समय शुरू होगा और कहां दिखेगा। इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि शुद्ध गणित (Pure Mathematics) और वेधशालाओं (Observatories) का कमाल है:
आर्यभट्ट और भास्कराचार्य का योगदान: आज से 1500 साल पहले आर्यभट्ट ने बता दिया था कि पृथ्वी गोल है, वह अपनी धुरी पर घूमती है, और चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी की परछाई चंद्रमा पर पड़ती है। उन्होंने एक साल की लंबाई 365.258 दिन बताई थी, जो आधुनिक विज्ञान के कैलकुलेशन के बेहद करीब है।
दूरी की सटीक गणना: 'सूर्य सिद्धांत' जैसे प्राचीन ग्रंथों में पृथ्वी से चंद्रमा और सूर्य की दूरी के जो अनुमान लगाए गए थे, वे आज के आधुनिक टेलिस्कोप से मापी गई दूरी के लगभग बराबर हैं। हमारे ऋषियों ने बिना किसी आधुनिक मशीन के सिर्फ ग्रहों की गति और गणित के दम पर यह सब ढूंढ निकाला था।
2. भारतीय ज्ञान बाहर कैसे गया? (The Knowledge Drain)
यह भी ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि भारत का ज्ञान विदेशों में गया और वहां के विद्वानों ने इसे डिकोड करके अपने नाम से पेटेंट कराया या प्रचारित किया। इसके तीन मुख्य रास्ते थे:
तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय: प्राचीन समय में पूरी दुनिया (चीन, ग्रीस, मध्य पूर्व) से छात्र भारत पढ़ने आते थे। वे यहां से गणित, आयुर्वेद, धातु विज्ञान (Metallurgy) और खगोल शास्त्र के ग्रंथ अपने साथ ले गए और अपनी भाषाओं में उनका अनुवाद किया।
अरब के रास्ते यूरोप जाना: हमारे गणित (जैसे शून्य और दशमलव प्रणाली) को पहले अरब के विद्वानों ने सीखा। अरब से यह ज्ञान यूरोप पहुंचा। यही कारण है कि आज जिसे दुनिया 'अरेबिक न्यूमिरल्स' (Arabic Numerals) कहती है, उसे अरब के लोग खुद 'हिंदसा' (Hindsa - यानी भारत से आया हुआ) कहते हैं।
विदेशी आक्रमण और लूट: मध्यकाल और ब्रिटिश काल के दौरान हमारे हजारों पांडुलिपियों (Manuscripts) और ग्रंथों को विदेशों की लाइब्रेरी में ले जाया गया।
न्यूटन, गैलीलियो और कॉपरनिकस से सदियों पहले भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण (Gravity) और बुधायन ने 'पायथागोरस थ्योरम' (Pythagoras Theorem) को अपने श्लोकों में लिख दिया था।
आज की स्थिति यह है कि विदेशी लोग हमारे योग, आयुर्वेद (Haldi/Turmeric Patent विवाद याद होगा आपको) और प्राणायाम को 'वैस्टर्न पैकेजिंग' में डालकर 'माइंडफुलनेस' और 'गोल्डन मिल्क' के नाम से हमें ही वापस बेच रहे हैं।
हमने अपनी ही विरासत को "पुरानी या दकियानूसी" मानकर छोड़ दिया, जबकि विदेशियों ने उसे अपनी लैब्स में टेस्ट करके अपना बना लिया। अब समय आ गया है कि हम अपनी इस धरोहर को पहचानें, पंचांग के इस गणितीय विज्ञान पर गर्व करें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इसके पीछे का असली विज्ञान सिखाएं।
आपको क्या लगता है, अपने इस प्राचीन विज्ञान को स्कूल के सिलेबस में एक विषय की तरह शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चे शुरू से सच जान सकें?
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