Balaghat Local
Local Information and Services
25/12/2025
चुनाव शांति के लिए उकवा-भरवेली में 27-29 दिसंबर तक शराब दुकानें बंद
कलेक्टर श्री मृणाल मीना ने उकवा और भरवेली में शराब दुकानें बंद रखने का आदेश दिया है। यह फैसला पंचायत उप-चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष कराने के लिए लिया गया है। 27 दिसंबर दोपहर 3 बजे से 29 दिसंबर को मतदान खत्म होने तक भरवेली-ए, भरवेली-बी और उकवा की शराब दुकानें बंद रहेंगी। इस दौरान शराब की खरीद-बिक्री और लाना-ले जाना पूरी तरह मना है। आप सभी से निवेदन है कि इस आदेश का पालन करें ताकि चुनाव अच्छे से निपटें और कोई परेशानी न हो।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -24/12/2025
24/12/2025
बालाघाट में धान खरीदी जारी: किसानों को 267 करोड़ का भुगतान, गुणवत्ता पर ध्यान दें
बालाघाट जिले में किसानों से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी जा रही है। जिला आपूर्ति अधिकारी श्री आर.के. ठाकुर ने बताया कि अब तक 60,931 किसानों से 28.98 लाख क्विंटल धान खरीदी गई है और 267 करोड़ रुपए का भुगतान किया जा चुका है। गोदाम स्तरीय केंद्रों पर धान बेचने वाले किसानों को 3 दिन के भीतर भुगतान मिल रहा है, जबकि समिति स्तरीय केंद्रों पर थोड़ा इंतजार करना पड़ रहा है। किसानों से अपील है कि वे अपनी धान को साफ और सुखाकर ही लाएं ताकि उन्हें सही दाम मिले। यह जानकारी सभी जरूरतमंद किसानों तक पहुंचाएं।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -23/12/2025
20/12/2025
शहरी भूमिहीनों को पट्टे: 19 दिसंबर को देखें सूची, लापरवाही पर होगी कार्रवाई
बालाघाट के शहरी इलाकों में जिनके पास अपनी जमीन नहीं है, उन्हें घर बनाने के लिए जमीन के पट्टे मिलेंगे। इसकी पहली सर्वे सूची 19 दिसंबर 2025 को जारी होगी। संयुक्त कलेक्टर श्री राहुल नायक ने सभी मुख्य नगरपालिका अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि यह सूची www.mpurban.gov.in, जिला कार्यालय और अपने वार्ड में जरूर दिखाएं। ताकि सभी पात्र भूमिहीन व्यक्तियों को समय पर जानकारी मिल सके। बैठक में, नगरपालिका बालाघाट के श्री गुलाबचंद लटारे की लापरवाही पर कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -19/12/2025
19/12/2025
कलेक्टर का आदेश: रबी फसलों के लिए पानी-बिजली मिलेगी, पराली जलाने पर जुर्माना।
कलेक्टर श्री मृणाल मीना ने कृषि, सिंचाई और बिजली विभाग के अधिकारियों को किसानों के लिए रबी फसलों की सिंचाई और देखभाल पक्की करने का आदेश दिया है। किसानों को धान की जगह कम पानी वाली फसलें लगाने को कहा गया है, जिसके लिए बीज भी मिलेंगे। पराली (फसल के अवशेष) जलाने पर जुर्माना लगेगा। पराली जलाने से मिट्टी खराब होती है और सांस की बीमारियां फैलती हैं। इसे रोकने के लिए किसान रोटावेटर या वेस्ट डीकंपोजर का इस्तेमाल करें। सिंचाई के लिए नहरों में पानी छोड़ा गया है और किसानों को बिजली कनेक्शन भी मिलेंगे। किसान इन सुविधाओं के लिए अपने विभागों से संपर्क कर सकते हैं।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -18/12/2025
18/12/2025
बालाघाट में रोजगार मेले: लड़कियों को मिली अच्छी नौकरी, आप भी उठाएं फायदा
बालाघाट में जिला प्रशासन युवाओं को नौकरी दिलाने के लिए रोजगार मेले लगा रहा है। हाल ही में 15 दिसंबर को कमला नेहरू कन्या महाविद्यालय में ऐसा ही एक मेला लगा। इसमें 300 लड़कियों ने टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में नौकरी के लिए नाम लिखवाए। 200 लड़कियों ने बेंगलुरु जाकर आईफोन बनाने का काम करने की सहमति दी। उन्हें हर महीने करीब 15 हजार रुपये मिलेंगे, साथ में खाना, रहना और पीएफ भी मिलेगा। कंपनी पढ़ाई के लिए डिप्लोमा और बी-टेक भी कराएगी। कलेक्टर श्री मृणाल मीना के मार्गदर्शन में यह पहल की जा रही है। प्राचार्य डॉ. निधि ठाकुर और श्री आशीष मिश्रा ने बताया कि यह लड़कियों के लिए अच्छा मौका है। ऐसे मेले आगे भी लगेंगे, इसलिए जानकारी रखें और दूसरों को भी बताएं।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -17/12/2025
17/12/2025
कलेक्टर का आदेश: पशु उपचार, गर्भाधान और मत्स्य पालन से किसानों-युवाओं को मिलेगा लाभ।
कलेक्टर श्री मृणाल मीना ने पशुपालन, डेयरी और मत्स्य विभाग के अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि पशुओं का पूरा इलाज हो और दवाएं हमेशा उपलब्ध रहें। कोई भी पशु इलाज से छूटे नहीं। किसानों को अपने पशुओं का इलाज अस्पताल में करवाने के लिए भरोसा दिलाएं। ज्यादा से ज्यादा मादा पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान किया जाए। मत्स्य पालन की सभी सरकारी योजनाएं किसानों और युवाओं तक पहुंचाई जाएं ताकि उन्हें रोजगार मिले। मछली के बीज भी किसानों को जल्दी मिलें ताकि वे बड़े पैमाने पर मछली पालन कर सकें। इससे बालाघाट के किसानों और युवाओं को फायदा होगा।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -17/12/2025
16/12/2025
चितालखोली स्कूल के शिक्षक राजकुमार सोनवाने निलंबित, बच्चों को मिलेगी बेहतर शिक्षा
बालाघाट के बिरसा ब्लॉक में शासकीय प्राथमिक शाला चितालखोली के शिक्षक श्री राजकुमार सोनवाने को निलंबित कर दिया गया है। सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग श्रीमती शकुंतला डामोर ने यह कार्रवाई की है। शिक्षक श्री सोनवाने बिना बताए स्कूल से अक्सर गायब रहते थे और स्कूल के जरूरी रजिस्टर भी नहीं रखते थे। जुलाई 2025 में वे पूरे महीने और सितंबर 2025 में सिर्फ तीन दिन स्कूल आए। इस कार्रवाई से बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलेगी और स्कूल में पढ़ाई का माहौल सुधरेगा। गाँव के लोग और बच्चों के माता-पिता ऐसे मामलों की जानकारी अधिकारियों को दे सकते हैं ताकि बच्चों का भविष्य बेहतर हो।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -15/12/2025
15/12/2025
कलेक्टर का निर्देश: किसान आईडी बनवाएं, आपदा मुआवजा पाएं; ऐसे करें आवेदन
कलेक्टर श्री मृणाल मीना ने सभी राजस्व अधिकारियों को किसानों और आम लोगों के काम समय पर निपटाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि सभी किसानों की फार्मर आईडी बने और आधार नंबर खसरे से जुड़े, ताकि खाद मिल सके। वन पट्टाधारक किसानों की भी फार्मर आईडी जल्द बने। प्राकृतिक आपदा से नुकसान होने पर 5 लाख तक का मुआवजा मिल सकता है। इसके लिए पटवारी/कोटवार से संपर्क करें या rcms.mp.gov.in पर ऑनलाइन आवेदन करें। अगर दिक्कत हो तो सीएम हेल्पलाइन (181) पर शिकायत करें। कलेक्टर ने यह भी कहा कि सीएम हेल्पलाइन के मामलों को भी जल्दी निपटाया जाए।
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जनसम्पर्क विभाग बालाघाट | Youtube @ ABHISHEK TIWARI "UTSAHI" | AI आधारित कृपया जाँचें | प्रकाशन तिथि -15/12/2025
बालाघाट जिला अस्पताल में डिलीवरी के नाम पर पैसे का आरोप: एक डॉक्टर का मामला या पूरी व्यवस्था की असल तस्वीर?
बालाघाट जिला अस्पताल में डिलीवरी के बदले ₹5,000 मांगने के आरोप में डॉ. गीता बारमाटे के निलंबन का मामला अब सिर्फ एक डॉक्टर तक सीमित नहीं रह गया है। हाल की अन्य घटनाओं और मीडिया रिपोर्टों को साथ रखकर देखें, तो यह साफ होता है कि यह मामला जिला अस्पताल की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एक गर्भवती महिला से डिलीवरी कराने के लिए ₹5,000 की मांग की गई। परिजनों का आरोप है कि पैसा न देने पर इलाज में देरी हुई और नवजात की मौत हो गई। मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने डॉ. गीता बारमाटे को निलंबित कर दिया और कलेक्टर की ओर से हाईकोर्ट में कैविएट भी दायर की गई, ताकि निलंबन पर तुरंत रोक न लग सके। यह कार्रवाई यह दिखाती है कि प्रशासन मामले को हल्के में नहीं ले रहा, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिर्फ निलंबन से भविष्य में ऐसी घटनाएँ रुक जाएँगी?
इसी पृष्ठभूमि में जिला अस्पताल से जुड़ा एक और हालिया मामला सामने आया, जिसकी खबर स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित हुई। इस मामले में परिजनों का आरोप था कि डिलीवरी के दौरान मौजूद महिला डॉक्टर ने यह कहते हुए इलाज से मना कर दिया कि उनकी ड्यूटी खत्म हो चुकी है। दूसरे डॉक्टर के आने में देरी हुई और महिला ने मृत शिशु (स्टिल बर्थ) को जन्म दिया। हालांकि संबंधित डॉक्टर ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि महिला को जब अस्पताल लाया गया तब तक गर्भ में बच्चे की धड़कन बंद हो चुकी थी और वह सुबह 10 बजे तक ड्यूटी पर थीं।
यह एक वाक्य — “ड्यूटी खत्म हो चुकी है” — अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या इसका मतलब यह है कि उस समय अस्पताल में केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध था? अगर ऐसा है, तो क्या इतने बड़े जिला अस्पताल में, जहाँ रोज कई डिलीवरी के मामले आते हैं, एक समय में सिर्फ एक डॉक्टर होना पर्याप्त माना जा सकता है? और अगर पर्याप्त डॉक्टर हैं, तो अतिरिक्त डॉक्टर उपलब्ध क्यों नहीं थे? यह घटना सिर्फ किसी एक डॉक्टर की लापरवाही का आरोप नहीं है, बल्कि यह अस्पताल की ड्यूटी प्लानिंग और बैक-अप व्यवस्था की असल स्थिति की ओर इशारा करती है।
इस पूरी तस्वीर को और स्पष्ट करती है Free Press Journal की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2024 से शुरुआती 2025 के बीच बालाघाट जिले में करीब 2,000 से अधिक गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल की बजाय निजी अस्पतालों में डिलीवरी के लिए जाना पड़ा। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई मामलों में वार्डबॉय या जरूरी सहयोग उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को बाहर ले जाना पड़ा। यह आंकड़ा यह बताता है कि समस्या किसी एक दिन या एक मरीज की नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था की कमजोरी है।
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक बड़ा कारण साफ दिखता है — डॉक्टरों और सुविधाओं की सीमित उपलब्धता। इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए एक रात में डिलीवरी या ऑपरेशन के लिए 10 महिलाएं हैं, लेकिन ड्यूटी पर एक ही डॉक्टर, सीमित नर्सिंग स्टाफ और एक ही ऑपरेशन थिएटर है। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले किसे लिया जाए और किसे प्राथमिकता मिले। इस स्थिति में डॉक्टरों और नर्सों पर न सिर्फ काम का भारी दबाव होता है, बल्कि अक्सर फोन कॉल का दबाव भी होता है — कभी किसी बड़े व्यक्ति या नेता का, कभी किसी प्रभावशाली रिश्तेदार का। ऐसे माहौल में अगर कोई परिवार यह सोचता है कि ₹5–10 हजार देने से उनका केस पहले लिया जाएगा और बच्चे की जान सुरक्षित रहेगी, तो यह व्यवहार अस्वाभाविक नहीं लगता। यह रिश्वत को सही ठहराना नहीं है, बल्कि सिस्टम की सच्चाई को समझने का प्रयास है।
सरकार खुद इस कमी को मानती है, इसी वजह से मध्य प्रदेश में “You Quote – We Pay” जैसी योजना लाई गई। इस योजना के तहत जिन जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिल रहे, वहाँ डॉक्टर अपनी शर्तों पर काम करने को तैयार होते हैं और सरकार उन्हें उस हिसाब से भुगतान करती है। उदाहरण के तौर पर, भोपाल जिले के बेरसिया क्षेत्र में इस योजना के तहत एनेस्थेटिस्ट की नियुक्ति की गई, ताकि ऑपरेशन और डिलीवरी जैसी सेवाएँ डॉक्टरों की कमी के कारण रुकें नहीं। इस तरह की योजनाएं विशेषज्ञों को दूरदराज़ जिलों में लाने का प्रयास हैं, ताकि डिलीवरी और अन्य इमरजेंसी सेवाएँ 24×7 उपलब्ध रह सकें।
सवाल यह है कि बालाघाट जैसे आदिवासी और दूरस्थ जिले में इस योजना का पूरा इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? अगर पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होते, तो क्या “ड्यूटी खत्म हो गई” जैसी स्थिति बनती? क्या तब परिवारों को पैसे देकर प्राथमिकता खरीदने की जरूरत पड़ती? क्या पर्याप्त बैक-अप डॉक्टर और स्टाफ होने पर इन tragic घटनाओं को रोका जा सकता था?
डॉ. गीता बारमाटे का निलंबन निश्चित रूप से एक कड़ा संदेश देता है और कुछ हद तक डर भी पैदा करता है, लेकिन क्या यही समाधान है? अगर डॉक्टरों की संख्या वही रहे, सुविधाएँ वही रहें और दबाव वही बना रहे, तो सिर्फ डक्टर निलंबन से व्यवस्था नहीं बदलेगी। सवाल यह भी है कि बालाघाट के जनप्रतिनिधि इस दिशा में क्या कर रहे हैं — क्या जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने या स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ाने के लिए ठोस प्रयास हो रहे हैं? क्या राज्य और केंद्र स्तर पर ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जिससे भविष्य में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी दूर हो सके?
यह मामला सिर्फ एक डॉक्टर या एक परिवार का नहीं है। यह बालाघाट की उस असलियत को सामने लाता है, जहाँ संसाधन कम हैं, जिम्मेदारी ज़्यादा है और आम आदमी अपने बच्चे की जान के लिए किसी भी हद तक जाने को मजबूर हो जाता है। अगर इस पूरे सिस्टम को ठीक नहीं किया गया, तो आज का यह मामला कल फिर किसी नए नाम और नए परिवार के साथ सामने आ सकता है।
सूत्र / Sources:
Padmesh News (बालाघाट)
मध्य प्रदेश हलचल न्यूज़
टीवी/डिजिटल वीडियो रिपोर्ट्स (बालाघाट)
Free Press Journal
जिला प्रशासन, बालाघाट
Jansampark, मध्य प्रदेश शासन
13/12/2025
लांजी से हैदराबाद जाने वाली निजी बसों में ओवरलोडिंग पर प्रशासन की हालिया कार्रवाई सही है। जांच के दौरान चार बसों पर कुल ₹21,400 का जुर्माना लगाया गया और परिवहन विभाग ने कहा कि यात्री सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत सिर्फ़ जुर्माने से थोड़ी अलग दिखाई देती है।
क्यों बस ही बनती है मज़दूरों की पहली पसंद?
लांजी और आसपास के गांवों से हैदराबाद जाने वाले ज़्यादातर यात्री मज़दूर हैं, जिनके लिए समय सबसे अहम होता है। आमतौर पर बसें शाम 5–7 बजे लांजी से निकलती हैं और अगली सुबह 5–7 बजे हैदराबाद पहुँचा देती हैं, जिससे मज़दूर उसी दिन काम पर रिपोर्ट कर पाता है और एक दिन की मज़दूरी बच जाती है। यही समय-लाभ बस को सबसे व्यावहारिक विकल्प बना देता है।
ट्रेन और तत्काल टिकट: विकल्प क्यों मुश्किल हैं?
ट्रेन लांजी से नहीं बल्कि गोंदिया से मिलती है, जहाँ तक पहुँचने में अलग समय और खर्च लगता है। कई ट्रेनें रोज़ाना नहीं चलतीं और जो चलती भी हैं, वे अक्सर सुबह निकलकर हैदराबाद शाम को पहुँचती हैं, जिससे काम जॉइन करने में देरी होती है।
तत्काल टिकट काग़ज़ पर आसान लगता है, लेकिन मोबाइल, तेज़ इंटरनेट, IRCTC अकाउंट और OTP जैसी शर्तें ज़्यादातर मज़दूरों के लिए कठिन होती हैं। मजबूरी में एजेंट का सहारा लेना पड़ता है, जो अतिरिक्त पैसे लेता है और फिर भी टिकट की गारंटी नहीं देता। इसके मुकाबले बस टिकट नकद में, आख़िरी समय पर और बिना तकनीकी झंझट के मिल जाता है।
भीड़ पहले से तय है, फिर तैयारी क्यों नहीं?
बसों में बढ़ने वाली भीड़ कोई अचानक घटना नहीं है। हर साल कुछ तय समय पर यात्रियों की संख्या बढ़ती है—
दीवाली के बाद 3–7 दिन, महीने के अंत और शुरुआत (25 से 5 तारीख), खेती के ऑफ-सीज़न में नवंबर–जनवरी और मार्च–मई, और कई बार नए ठेकों के शुरू होने के समय। ये सभी समय पहले से अनुमानित होते हैं, फिर भी इन दिनों में अतिरिक्त बसों की व्यवस्था अक्सर नहीं दिखती।
चालान बनाम मुनाफ़ा: असली वजह
अनुमान के मुताबिक, एक स्लीपर बस में लगभग 30 सीटें होती हैं और औसत किराया करीब ₹2,250 रहता है। अगर 70% सीटें भी भरें, तो कुल कलेक्शन लगभग ₹45–50 हज़ार हो जाता है। ईंधन, टोल, ड्राइवर-कंडक्टर का वेतन और रखरखाव निकालने के बाद भी ₹7–8 हज़ार का रोज़ाना मुनाफ़ा संभव है। ऐसे में अगर ₹5–6 हज़ार का चालान कभी-कभी लगे और जाँच रोज़ न हो, तो कई ऑपरेटर इसे सज़ा नहीं बल्कि सामान्य खर्च मान लेते हैं।
यह मामला सिर्फ़ नियम उल्लंघन का नहीं, बल्कि रोज़गार, मजबूरी और परिवहन व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। जब तक सुरक्षित और आसान विकल्प नहीं बनाए जाते और पीक समय को ध्यान में रखकर व्यवस्था नहीं होती, तब तक लोग मजबूरी में भीड़ भरी बसों में सफर करते रहेंगे।
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