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उम्मत-ए -मुस्लिमा के लिए
Assalamualaikum, Ummat-e-Muslima
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*आने वाले माह से जनगणना शुरु हो रही है जिसमें 34 सवालों के जवाब मांगे जायेंगे..उसमें सबसे मुख्य सवाल है...जाति कौन सी है और धर्म क्या है..?सभी मुसलमानों को जाति ..मुस्लिम ही लिखाना है और धर्म इस्लाम ही लिखाना है..।किसी को भी बहना,रंगरेज,शेख,सैय्यद ,बगैरह बगैरह नहीं लिखाना है..वरना सही जनगणना नहीं हो पायेगी..इस बात का ध्यान सभी को रखना है..इसलिए हर जुमे की तकरीर में लोगों को जागरूक करना सुनिश्चित करें।*
अच्छी बात बोलने वाला सच्चा हो ये जरूरी नहीं !
एक सच एक ईश्वर
Surat No. 56 Ayat NO. 60
हाशिया-25
यानी तुम्हारी पैदाइश की तरह तुम्हारी मौत भी हमारे बस में है। हम ये तय करते हैं कि किसको माँ के पेट ही में मर जाना है, और किसे पैदा होते ही मर जाना है, और किसे किस उम्र तक पहुँचकर मरना है। जिसकी मौत का जो वक़्त हमने तय कर दिया है उससे पहले दुनिया की कोई ताक़त उसे मार नहीं सकती, और उसके बाद एक पल के लिये भी ज़िन्दा नहीं रख सकती। मरनेवाले बड़े-बड़े अस्पतालों में बड़े से बड़े डॉक्टर्स की आँखों के सामने मरते हैं, बल्कि डॉक्टर्स ख़ुद भी अपने वक़्त पर मर जाते हैं। कभी कोई न मौत के वक़्त को जान सका है, न आती हुई मौत को रोक सका है, न ये मालूम कर सका है कि किसकी मौत किस ज़रिए से, कहाँ और किस तरह होनेवाली है।
जिन्दगी with इस्लाम
भीख देने से गरीबी ख़त्म नहीं होती!
“दो नौ उम्र को लिया गया एक तजुर्बे के तौर पर,
एक को पुराने कपड़े पहनाकर भीख मांगने के लिए भेजा गया
और दूसरों को अलग-अलग चीज़ें बेचने के लिये भेजा गया,
भिखारी बच्चा शाम को आठ सौ रुपये लाया और बाल मज़दूर ने डेढ़ सौ रुपये कमाए!
इस सामाजिक प्रयोग का परिणाम स्पष्ट है। दरअसल, एक राष्ट्र के रूप में हम भीख मांगने को प्रोत्साहित करते हैं और कड़ी मेहनत को हतोत्साहित करें।
होटल के वेटरों, सब्जी बेचने वालों और छोटे स्तर के श्रमिकों के साथ-साथ, प्रत्येक पाई मायने रखती है।
और भिखारियों को 10, 20, 150 रूपये देकर समझते हैं कि जन्नत के हक़दार बन गए।
होना यह चाहिए कि जो भीख मांगते हैं उन्हें खाना खिलाया जाए और मज़दूरों को उनके हक़ से ज़्यादा दें।
अगर आप किसी भिखारी को एक लाख रुपये नक़द दे दें तो वह उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाएगा और अगले दिन फिर से भीख मांगना शुरू कर देगा।
इसके विपरीत अगर आप किसी मज़दूर या सफ़ेद पोश (जो मांगता नहीं है) की मदद करते हैं तो वह अपनी जायज़ ज़रूरत को पूरा करेगा और अपना काम बेहतर तरीक़े से करेगा।
इस देश में लाखों विद्यार्थी, रोगी, श्रमिक और महिलाएं एक-एक पैसे के लिए मोहताज हैं।
अगर आप किसी सही हक़दार इंसान की मदद करें तो एक रुपया भी आपके नेकियों के पलड़े के लिए काफी हो सकता है।
याद रखिए! भीख देने से ग़रीबी ख़त्म नहीं होती, बल्कि बढ़ती है।
भीख दो, प्लानिंग और सावधानी के साथ,
इस तरह दुनिया भी बदल सकती है और आख़िरत भी।
बाक़ी मर्ज़ी आपकी..
Ilyaas Makhdoom सर से उठाकर
#सोंचिएगा
तीन चार दिन पहले कुछ लोगों के साथ बैठा था... कुछ गैर मुस्लिम भी थे...
इधर उधर की बातें हो रही थीं.... बातों ही बातों में उन लोगों ने अतीक अहमद मुख्तार अंसारी शहाबुद्दीन का जिक्र शुरू कर दिया और उनके बारे में बताने लगे कि वो लोग इतने ताकतवर थे.... इतना पावर था.... उनके नाम से शासन प्रशासन कांपता था...
असल में वे लोग अतीक अहमद मुख्तार अंसारी शहाबुद्दीन की बड़ाई नहीं कर रहे थे बल्कि वो वहां बैठे लोगों को ये बताना चाहते थे कि जब इतने पावरफुल मुसलमानों को इतना आसानी से निपटा दिया गया तो आप जैसे आम मुसलमानों की क्या औकात?
फिर दूसरे दिन वहीं था और बाबा सिद्दीकी की खबर आ गई और वे लोग बार बार बाबा सिद्दीकी के पावर की चर्चा करने लगे और फिर उनका इशारा वही था कि जब बाबा सिद्दीकी जैसे पावरफुल इंसान को इतना आसानी से निपटाया जा सकता है तो आम मुसलमान की क्या औकात?
ये जान लीजिए कि दुनिया में लारेंस विश्नोई गैंग का कोई अस्तित्व नहीं है... ये सारा खेल संघ और उससे जुड़े संगठनों का है.... और ये अपने उसी एजेंडे पर काम कर रहे हैं कि येन केन प्रकारेण मुसलमानों को डराओ।
मैं पहले भी कह चुका हूं और आज फिर कह रहा हूं कि संघ बहुत अच्छे से जानता है कि भारत में लगभग बीस से तीस करोड़ मुसलमान हैं और न तो इन्हें मारा जा सकता है और न कहीं भगाया जा सकता है मगर इन्हें डराया जा सकता है और बहुत पुरानी कहावत है कि जो डर गया समझो मर गया।
मुसलमानों को डराने के लिए मुस्लिम लीडरशिप को खत्म कर दिया गया है। अब आम मुसलमानों के दिमाग में ये घुसेड़ा जा रहा है कि जब अतीक अहमद मुख्तार अंसारी शहाबुद्दीन और बाबा सिद्दीकी जैसे लोग खुद को नहीं बचा पाए तो तुम किस खेत की मूली हो।
जब ये बात मुसलमानों के दिमाग में घुस जाएगी तो मुसलमान प्रतिशोध करना बंद कर देंगे। फिर जो मर्जी आए वो कानून आएंगे... और मुसलमानों की एक बड़ी तादाद डर से नाम मात्र के मुसलमान ( वैसे अभी भी सत्तर प्रतिशत मुसलमान नाम के ही मुसलमान हैं।) रह जाएंगे बाकी या तो घर वापसी करके मुरतद हो जाएंगे या फिर उन्हें खुश करने के लिए कांवड़ यात्रा निकालेंगे।
इन सबसे बचने का तरीका यही है कि कुछ भी हो जाए हमें अपने बीच से लीडर बनाते रहना चाहिए क्योंकि अगर अच्छा लीडर मिल गया तो अपने आप आत्मविश्वास पैदा हो जाएगा और डर का माहौल खत्म होगा।
बिन सियासी ताकत और लीडरशिप के तुम्हारा पैसा तुम्हारी तालीम तुम्हारे मदरसे तुम्हारी मस्जिदें तुम्हारी गाडियां तुम्हारे बंगले किसी काम के नहीं रहेंगे।
और हां इस गलतफहमी में मत रहना की तुम पर जब विपत्ति आएगी तो अरबी फारसी तुर्की तुम्हारे लिए आवाज उठाएंगे।
Mr.Mahtab.Alam
9653325351
जब भी लिखें ऐसा लिखें की जिसका फ़ायदा उम्मत को हो भले ही उसे एक बंदा पढ़े!!
लिखें और साथ ही अमल भी करें और इस्लाही लिखें
ऐसा लिखें की लोग कुरआन की तरफ़ रुजु करें!!
ऐसा लिखें की सीरत ए सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम से लोग जुड़ सकें!!
ऐसा लिखें की फ़िरकेवाद और बिरादरीवाद न पनपे आपकी पोस्ट से!!
ऐसा लिखें की उम्मत इत्तेहाद का तसव्वुर उसमें झलके!!
ऐसा लिखें की कल आपके बाद जब उसे पढ़ा जाए तो उम्मत आपको एक बेहतरीन लीडर कबूल करे!!
फ़िज़ूल टॉपिक्स पर लिखना छोड़ दें बेहयाही और कॉमेडी के लिए रील्स का नशा काफ़ी है इस उम्मत को!!
अल्लाह आप तमाम की नियत कबूल करे!!
इस्लाम ही इन्सानियत का हल है, कुरआन मे इंसानियत के लिए 99 हुक्म (Commandments)
1 बदज़ुबानी से बचो ( 3: Aayat159)
2- गुस्से को पी जाओ (3:134)
3- दूसरों के साथ भलाई करो (4:36)
4- घमंड से बचो (7:13)
5- दूसरों की गलतियाँ माफ करो (7:199)
6- लोगों से नरमी से बात करो (20:44)
7- अपनी आवाज़ नीची रखों (31:19)
8- दूसरों का मज़ाक कभी न उड़ाओ (49:11)
9- वालदैन (माँ-बाप) की इज़्ज़त और उनकी फरमानबरदारी करो (17:23)
10- वालदैन (माँ-बाप) की बेअदबी से बचो और उनके सामने उफ़ तक न कहो (17:23)
11- इजाज़त के बिना किसी के कमरे मे (निजी कक्ष) में दाख़िल न हो (24:58)
12- आपस में क़र्ज़ के मामलात लिख लिया करो (2:282)
13- किसी की अंधी तक़लीद मत करो (2:170)
14- अगर कोई तंगी मे है तो उसे कर्ज़ उतारने में राहत दो (2:280)
15- ब्याज कभी मत खाओ (2:275)
16- रिश्वत कभी मत खाओ (2:188)
17- वादों को हमेशा पूरा करो (2:177)
18- आपस में भरोसा क़ायम रखें (2:283)
19- सच और झूठ को आपस में कभी न मिलाओ (2:42)
20- लोगों के बीच इंसाफ से फैसला करो (4:58)
21- इंसाफ पर मज़बूती से जम जाओ (4:135)
22- मरने के बाद हर शख्स की दोलत उसके क़रीबी रिश्तेदारों में बाँट दो (4:7)
23- औरतों का भी विरासत में हक है (4:7)
24- यतीमों का माल नाहक मत खाओ (4:10)
25- यतीमों का हमेशा ख़याल रखो (2:220)
26- एक दूसरे का माल नाजायज़ तरीक़े से कभी मत खाओ (4:29
27-किसी के झगड़े के मामले में लोगों के बीच सुलह कराओ (49:9
28- बदगुमानी से बचो (49:12)
29- गवाही को मत छुपाओ (2:283)
30- एक दूसरे के भेद न टटोला करो और किसी की चुगली मत करो (49:12)
31- अपने माल में से ख़ैरात करो (57:7)
32- मिसकीन गरीबों को खिलाने की तरग़ीब दो (107:3)
33- ज़रूरतमंद को तलाश कर उनकी मदद करो (2:273)
34- कंजूसी और फिज़ूल ख़र्ची से बचा करो (17:29)
35. अपनी ख़ैरात लोगों को दिखा कर और एहसान जताकर बर्बाद मत करो (2:264)
36- मेहमानों की इज़्ज़त करो (51:26)
37- भलाई पर ख़ुद अमल करने के बाद दूसरों को बढ़ावा दो (2:44
38- ज़मीन पर फसाद मत करो (2:60)
39- लोगों को मस्जिदों में अल्लाह के ज़िक्र से मत रोको (2:114)
40- सिर्फ उन से लड़ो जो तुम से लड़ें (2:190)
41- जंग के आदाब का ख़याल रखना (2:191)
42- जंग के दौरान पीठ मत फेरना (8:15)
43- दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं (2:256)
44- सभी पैग़म्बरों पर इमान लाओ (2:285)
45- हालत माहवारी में औरतों के साथ संभोग न करो (2:222)
46- माँ बच्चों को दो साल तक दूध पिलाएँ (2:233)
47- ख़बरदार, ज़िना (Adultery) के पास किसी सूरत में नहीं जाना (17:32)
48- हुक्मरानो को ख़ूबी देखकर चुना करो (2:247)
49- किसी पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ मत डालो (2:286)
50- आपस में फूट कभी मत डालो (3:103)
51- दुनिया की तखलीक चमत्कार पर गहरी चिन्ता करो (3:191)
52- मर्दों और औरतों को आमाल का सिला बराबर मिलेगा (3:195
53- ख़ून के रिश्तों में शादी मत करो (4:23)
54- मर्द परिवार का हुक़्मरान है (4:34)
55- हसद और कंजूसी मत करो (4:37)
56- हसद मत करो (4:54)
57- एक दूसरे का क़त्ल मत करो (4:92)
58- अमानत में ख़यानत करने वालों के हिमायती मत बनो (4:105)
59- गुनाह और ज़ुल्म व ज़यादती में मदद मत करो (5:2)
60- नेकी और भलाई में सहयोग करो (5:2)
61- अक्सरियत (बहुमत) मे होना सच्चाई का सबूत नहीं (6:116)
62- इंसाफ पर क़ायम रहो (5:8)
63- जुर्म की सज़ा मिसाली तौर में दो (5:38)
64- गुनाह और बुराई आमालियों के ख़िलाफ भरपूर जद्दो जहद करो (5:63)
65- मुर्दा जानवर, खून, सूअर का मांस निषेध हैं (5:3)
66- शराब और नशीली दवाओं से ख़बरदार (5:90)
67- जुआ कभी मत खेलो (5:90)
68- दूसरों के देवताओं को कभी बुरा मत कहो (6:108)
69- लोगों को धोखा देने के लिये नाप तौल में कमी मत करो(6:152
70- ख़ूब खाओ पियो लेकिन हद पार न करो (7:31)
71- मस्जिदों में इबादत के वक्त अच्छे कपड़े पहनें (7:31)
72- जो तुमसे मदद और हिफाज़त और पनाह के तलबगार हो, उसकी मदद और हिफ़ाज़त करो (9:6)
73- पाक़ी चुना करो (9:108)
74- अल्लाह की रहमत से कभी निराश मत होना (12:87)
75- अज्ञानता और जिहालत के कारण किए गए बुरे काम और गुनाह अल्लाह माफ कर देगा (16:119)
76- लोगों को अल्लाह की तरफ़ हिक़मत और नसीहत के साथ बुलाओ (16:125)
77- कोई किसी दूसरे के गुनाहों का बोझ नहीं उठाएगा (17:15)
78- मिसकीनी और ग़रीबी के डर से बच्चों की हत्या कभी मत करो (17:31)
79- जिस बात का इल्म न हो उसके पीछे मत पड़ो। (17:36)
80- निराधार और अनजाने कामों से परहेज़ करो (23:3)
81- दूसरों के घरों में बिला इजाज़त मत दाखिल हो (24:27)
82- जो अल्लाह में यक़ीन रखते हैं, अल्लाह उनकी हिफाज़त करेगा (24:55)
83- ज़मीन पर आराम और सुकून से चलो (25:63)
84- अपनी दुनियावी ज़िन्दगी को अनदेखा मत करो (28:77)
85- अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो (28:88)
86- समलैंगिकता से हमेशा बचा करो (29:29)
87- अच्छे कामों की नसीहत और बुरे कामों की मुमानत करो (31:17)
88- ज़मीन पर शेखी और अहंकार से इतरा कर मत चलो (31:18)
89- औरतें अपने बनाओ श्रृंगार पर तकब्बुर (घमंड) न करें (33:33)
90- अल्लाह सभी गुनाहों को माफ कर देगा सिवाय शिर्क के (39:53)
91- अल्लाह की रहमत से मायूस मत हो (39:53)
92- बुराई को, भलाई से दफा करो (41:34)
93- सलाह लेकर अपने काम अंजाम दो (42:38)
94- तुमसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वो है जिसने सच्चाई और भलाई इख़्तियार की हो (49:13)
95- दीन मे रहबानियत मौजूद नहीं (57:27)
96- अल्लाह के यहाँ इल्म वालों के दरजात बुलंद हैं (58:11)
97- ग़ैर मुसलमानों के साथ उचित व्यवहार और दयालुता और अच्छा व्यवहार करो (60:8)
98- अपने आप को नफ़्स की हर्ष पाक रखो (64:16)
99- अल्लाह से माफी माँगो, वो माफ करने और रहम करनेवाला है (73:20)
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