Aas Rasheed
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वार्ड नंबर 213 शास्त्री पार्क
आज की वीडियो कुछ बड़ी है लेकिन काम चोर ने क्या हालात कर दिए है कॉलोनी के ये देखना जरूरी है
काम चोर वार्ड छोड़
19/07/2025
Adv Khairun Nisha Qureshi ✨
कहानी का नाम: खामोशियाँ बोल उठीं
(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सामाजिक जागरूकता के उद्देश्य से लिखी गई है।)
लेखक: आस मोहम्मद कुरैशी
मोबाइल: 9899385644
भाग 1: "सांवली सी सवेरा"
नेहा शर्मा…
14 साल की, 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली एक सीधी-सादी लड़की। साँवली रंगत, बड़ी-बड़ी आँखें और चेहरे पर हमेशा हल्की सी मुस्कान।
वो एक मध्यमवर्गीय सनातनी परिवार में पली-बढ़ी। माँ सविता देवी, जिनके लिए बेटी उनका गहना थी… और पिताजी मनोहर लाल शर्मा – सरकारी नौकरी में, जो ज़्यादातर अपने ऑफिस के काम में ही व्यस्त रहते। बड़ा भाई विवेक, जो कॉलेज के नाम पर घर पर ही ज़्यादातर समय बिताता था, मोबाइल में खोया हुआ, माँ की आँखों का तारा।
नेहा को बस एक ही चीज़ सुकून देती थी — स्कूल।
और स्कूल से लौटकर आशु वर्मा से थोड़ी देर की बातचीत, जो उसके घर के पास रहता था। आशु दो साल बड़ा था, लेकिन दोनों की दोस्ती बचपन से थी। जब नेहा छोटी थी, आशु ही उसे साइकल चलाना सिखाया करता था।
उस दिन सुबह की हल्की धूप नेहा की खिड़की पर आकर रुक गई थी। माँ ने पुकारा,
"नेहा, उठ जा बेटा, स्कूल नहीं जाना क्या?"
नेहा ने आँखे खोलीं तो देखा कि उसका भाई विवेक सामने बैठा उसे देख रहा है।
"तू इतनी देर तक सोती क्यों है रे?" विवेक ने कहा, और फिर मुस्कराते हुए उसके माथे पर हल्का सा हाथ रख दिया।
नेहा को कुछ अजीब सा महसूस हुआ। वो बचपन से अपने भैया के बेहद करीब रही थी, लेकिन अब कुछ महीनों से उसे उसके व्यवहार में एक अजीब बदलाव महसूस हो रहा था। उसकी निगाहें, उसकी बातें — सबकुछ थोड़ा बोझिल लगता।
माँ ने आवाज़ लगाई, और नेहा झट से उठ गई।
शाम को...
नेहा जब स्कूल से लौटी तो आशु उसके गेट के बाहर खड़ा था।
"अरे तू आ गई? चल छत पे चलते हैं कुछ बात करनी है," आशु ने कहा।
नेहा ने सिर हिलाया, पर मन में कुछ और ही चल रहा था।
छत पर पहुँचते ही आशु बोला,
"नेहा, तुझसे कुछ बात करनी थी… आज सुबह मैंने तेरे भैया को तेरे कमरे में देखा। कुछ ठीक नहीं लगा मुझे।"
नेहा की आँखों में डर तैरने लगा…
"क्या… देखा?" – उसकी आवाज़ काँप रही थी।
आशु ने उसकी ओर देखा, और बोला,
"जो देखा, वो बता नहीं सकता… लेकिन तुझे सावधान रहना होगा। और कोई भी बात अगर अजीब लगे… तो मुझसे कहना, मैं तेरे साथ हूँ।"
नेहा का गला सूख गया। अब उसे यकीन होने लगा था कि उसका डर बेवजह नहीं था।
कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर थी… जहाँ मासूमियत और खामोशी के बीच कुछ अनकहा पनपने लगा था।
(जारी है… अगला भाग जल्द)
19/03/2025
तलाक – एक औरत की कहानी
भाग 1: हंसी-खुशी की शुरुआत
लेखक: आस मोहम्मद कुरैशी
मोबाइल: 9899385644
शबाना की शादी की खबर पूरे मोहल्ले में आग की तरह फैल गई थी। माँ-बाप ने उसके लिए एक अच्छा लड़का ढूंढा था – फैसल। देखने में अच्छा, नौकरी में सेट, और परिवार भी इज्ज़तदार। घर में तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। माँ, फरीदा बेगम, दिन-रात भाग-दौड़ कर रही थीं। बाप, हाशिम साहब, थोड़ा शांत स्वभाव के थे, लेकिन बेटी की शादी को लेकर उनके दिल में भी हलचल थी।
शबाना की सहेलियाँ – सारा और नायला – उसकी शादी को लेकर सबसे ज़्यादा उत्साहित थीं।
सारा: "तू सच में शादी कर रही है या बस दिखावा कर रही है?"
नायला: "अब यह हमें भूल जाएगी, फैसल के प्यार में खो जाएगी।"
शबाना ने हँसते हुए कहा, "पागल हो क्या? तुम लोग मेरी जान हो!"
शादी की रात
निकाह की रस्म पूरे शानो-शौकत से हुई। जब क़ाज़ी साहब ने फैसल से पूछा –
"क़ुबूल है?"
फैसल ने तीन बार पूरे इत्मीनान से कहा, "क़ुबूल है।"
शबाना के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसकी ज़िन्दगी अब बदलने वाली थी।
विदाई का लम्हा
सबसे मुश्किल वक्त वो था जब शबाना अपने मायके को छोड़कर ससुराल जा रही थी। माँ फरीदा बेगम ने उसे गले लगाया और रोते हुए कहा –
"ख़ुश रहना बेटी, और ससुराल में सबका दिल जीतना।"
भाई आसिफ की आँखों में भी आँसू थे।
"अब घर सूना हो जाएगा, अब अम्मी से झगड़ा कौन करेगा?"
शबाना ने मुस्कुराकर कहा, "तू हमेशा मेरा छोटा भाई रहेगा, कभी अकेला मत महसूस करना।"
नई ज़िन्दगी
ससुराल में पहला दिन अच्छा बीता। ननद शबनम और देवर राशिद ने हंसी-मज़ाक में माहौल हल्का रखा। सास, शाहिदा बेगम, थोड़ा सख्त मिज़ाज थीं लेकिन शुरुआत में वो भी ठीक से पेश आईं।
फैसल का व्यवहार भी अच्छा था। वो उसे बाहर घुमाने ले जाता, गिफ्ट्स लाकर देता और उसकी हर बात को ध्यान से सुनता। शबाना को लगा कि उसकी शादी एक खूबसूरत ख्वाब है।
लेकिन उसे ये नहीं पता था कि हर ख्वाब हमेशा पूरा नहीं होता…
(अगले भाग में – जब खुशियों में आई पहली दरार...)
18/03/2025
मोहब्बत और नफरत – आखिरी भाग
✍ लेखक: आस मोहम्मद कुरैशी
📞 मोबाइल नंबर: 9899385644
पिछले भाग में:
अयान और उसके गुर्गों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। एलीना अब आज़ाद थी, लेकिन क्या ज़ेहान और एलीना की मोहब्बत इतनी आसानी से मुकम्मल हो जाएगी?
नई शुरुआत
अयान के गिरफ्तार होने के बाद ज़ेहान और एलीना पुलिस स्टेशन में थे। एलीना अभी भी कांप रही थी, बीते दिनों की यादें उसे परेशान कर रही थीं।
"अब सब खत्म हो गया," ज़ेहान ने उसके हाथ थामते हुए कहा।
"शायद..." एलीना की आवाज़ कमजोर थी, "लेकिन मैं अब भी डरती हूँ, ज़ेहान। क्या सच में ये सब खत्म हो गया?"
ज़ेहान ने गहरी सांस ली और कहा, "एलीना, डर को पीछे छोड़ो। अब तुम्हारी ज़िन्दगी नई होगी, हमारी ज़िन्दगी नई होगी।"
समय बीतता है...
कुछ महीने गुजर गए। एलीना अब पहले जैसी डरी-सहमी नहीं थी। उसने अपनी ज़िन्दगी को नए सिरे से जीना शुरू कर दिया था। ज़ेहान हमेशा उसके साथ था, हर मोड़ पर, हर मुश्किल में।
एक दिन दोनों समंदर किनारे बैठे थे। सूरज डूब रहा था, और लहरें उनकी बातों को सुन रही थीं।
"ज़ेहान," एलीना ने कहा, "क्या तुम्हें लगता है कि हम दोनों को ये मोहब्बत नसीब में लिखी थी?"
ज़ेहान मुस्कराया, "अगर नहीं लिखी होती, तो इतनी मुश्किलों के बाद भी हम साथ कैसे होते?"
एलीना ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा, "तो अब हम क्या करेंगे?"
ज़ेहान ने उसकी उंगलियों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, "अब एक नई कहानी शुरू करेंगे, जिसमें नफरत नहीं, सिर्फ मोहब्बत होगी।"
और फिर…
चंद महीनों बाद, एलीना और ज़ेहान की शादी हो गई। उनका सफर मुश्किलों से भरा था, लेकिन उन्होंने हर तूफान का सामना किया और आखिरकार अपनी मोहब्बत को मुकम्मल कर लिया।
समय बीतता रहा, लेकिन उनकी कहानी हमेशा के लिए यादों में बसी रही—एक ऐसी कहानी, जहाँ मोहब्बत ने नफरत को हरा दिया था।
ख़त्म।
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