Azhar Sabri

Azhar Sabri

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Educating minds by profession, but my heart lives between the lines. Proud author of 3 books. Living life one chapter at a time.

05/10/2026

दिन है तो कभी रात है दोनों के दरमियाँ।
बदले हुए ज़ज्बात हैं दोनों के दरमियाँ।

ना जाने कैसी बात है दोनों के दरमियाँ,
ना कोई मुलाक़ात है दोनों के दरमियाँ।

मिलना लिखा नहीं था मुक़द्दर की रेत पर,
बे-नाम सी जो बात है दोनों के दरमियाँ।

नज़दीकियाँ थीं जैसे कोई साया साथ हो,
अब फ़ासलों की रात है दोनों के दरमियाँ।

चेहरे पे मुस्कुराहटें, आँखों में है नमी,
कुछ इस तरह हालात हैं दोनों के दरमियाँ।

~ Azhar Sabri ~

29/09/2026

मिरे सुकून का हासिल तिरी मोहब्बत है।
मिरे वजूद की दुनिया भी तेरी चाहत है।

न तख़्त चाहिए मुझको, न ही कोई दौलत,
मिरे लिए तो तिरी याद ही हुकूमत है।

ज़माना लाख बदल ले जो अपने रंग मगर,
मिरे उसूल में अब भी वही सदाक़त है।

न कोई दस्त-ए-तलब है, न कोई ख़्वाहिश-ए-ज़र,
मिरी फ़क़ीरी ही मेरे लिए तो नेमत है।

चराग़ बुझ गए लेकिन धुआँ गवाही है,
अभी तो दिल में किसी आग की हिफ़ाज़त है।

न आसमान की चाहत, न कहकशाँ की तलब,
ज़मीं पे तेरा बिछड़ना ही एक क़यामत है।

न सर झुका है किसी के भी सामने, ‘अज़हर’,
मिरी फ़क़ीरी ही मेरी असल हुकूमत है।

~ Azhar Sabri ~

15/09/2026

तेरी वफ़ा की बातों में बाक़ी असर नहीं।
तेरे लिए कटे जो, वो मेरा सर नहीं!

पत्थर पे दिल को अपने सँभाले हुए हूँ मैं,
दुनिया के हर सितम का मुझे अब असर नहीं!

दुनिया के तख़्त-ताज की ख़्वाहिश नहीं मुझे,
अपने लहू से बढ़ कर कोई हुनर नहीं!

मैं अपनी ही अना का मुहाफ़िज़ हूँ ऐ जहाँ,
झुक जाऊँ हर किसी पे, मैं वो संग-ए-दर नहीं!

दुनिया को जीतने का हुनर था बहुत मगर,
अपनों के वार सह सके, इतना जिगर नहीं!

तलवार खींच ली है तो अंजाम देखना,
ये जंग है अना की, यहाँ कोई डर नहीं!

साहिल पे बैठकर जो दिलासा हज़ार दे,
तूफ़ाँ में साथ दे सके, वो हमसफ़र नहीं!

मैंने तो सच के वास्ते सब कुछ लुटा दिया,
झूठी किसी भी जीत की मुझको ख़बर नहीं!

दुनिया के डर से रास्ता अपना बदल लूँ मैं,
'अज़हर', मिरे मिज़ाज में ऐसा हुनर नहीं!

~ Azhar Sabri ~

11/09/2026

नींद आँखों से जाती रही रात भर।
चाँद बनकर वो आती रही रात भर।

कोई आहट न आई दरीचे तलक,
दिल को दुनिया रुलाती रही रात भर।

सूनी गलियों में फिरता रहा चाँद भी,
चाँदनी दिल जलाती रही रात भर।

बात दिल की ज़ुबाँ तक जो आई नहीं,
बेबसी सर झुकाती रही रात भर।

ख़ामुशी चीखती थी हर एक सम्त से,
बे-रुखी गुनगुनाती रही रात भर।

वक़्त के साथ चलना था लाज़िम मगर,
उम्र पीछे बुलाती रही रात भर।

ज़िंदगी की हक़ीक़त से टकरा के भी,
बे-कसी मुस्कुराती रही रात भर।

इक पुराने फ़साने की खुशबू लिए,
याद दिल को सताती रही रात भर।

सच की दीवार कमज़ोर होती नहीं,
झूठ दुनिया सजाती रही रात भर।

टूट कर भी बिखरने न दी आन को,
शम्अ' ख़ुद को जलाती रही रात भर।

~ Azhar Sabri ~

10/09/2026

गर हो हमसे वफ़ा तो वफ़ा कीजिए।
राह-ए-उल्फ़त में ख़ुद को फ़ना कीजिए।

ग़ैर की बात पर ग़ौर मत कीजिए,
दिल की आवाज़ पर दिल दिया कीजिए।

वक़्त के हर सितम को हँसी में छुपा,
मुस्कुराकर भी अपना गिला कीजिए।

रास्ते ख़ुद ही आसान होते नहीं,
पत्थरों से भी अपना पता कीजिए।

ज़हर भी मुस्कुरा कर अगर चे वो दे,
प्यार से मुस्कुरा कर पिया कीजिए।

ज़ख़्म गहरे हों, दुनिया से कहिए नहीं,
दर्द को दिल में रखकर दुआ कीजिए।

जब अँधेरा बहुत हो निगाहों में भी,
एक चराग़-ए-वफ़ा सा जला कीजिए।

जब ज़माना कभी आज़माने लगे,
अपने ईमान का फिर दिफ़ा कीजिए।

दिल में नफ़रत अगर घर बनाने लगे,
प्यार का दीप बनकर जला कीजिए।

~ Azhar Sabri ~

09/09/2026

सामने तू अगर हो तो मैं क्या करूँ।
दिल अगर बेख़बर हो तो मैं क्या करूँ।

ज़ख़्म सीने में तर हो तो मैं क्या करूँ,
दर्द हद से अगर हो तो मैं क्या करूँ।

आरज़ू दर-ब-दर हो तो मैं क्या करूँ,
फ़ासला मुख़्तसर हो तो मैं क्या करूँ।

मुझको उसको भुलाना भी आसान था,
दिल अगर उसका घर हो तो मैं क्या करूँ।

लोग कहते हैं दिल से निकालूँ तुझे,
तू रगों में बसर हो तो मैं क्या करूँ।

वक़्त कहता है सब कुछ भुला दे मगर,
याद तेरी अमर हो तो मैं क्या करूँ।

जिसको खोने का डर था वही मिल गया,
अब ख़ुशी में भी डर हो तो मैं क्या करूँ।

प्यास बुझती नहीं इक समंदर से भी,
जाम तेरी नज़र हो तो मैं क्या करूँ।

मुस्कुराने की कोशिश तो की थी मगर,
आँख ही नम अगर हो तो मैं क्या करूँ।

ख़ुद को समझाने बैठा था तन्हाई में,
साँस में तू अगर हो तो मैं क्या करूँ।

~ Azhar Sabri ~

08/09/2026

हम ने क्या-क्या तेरी उल्फ़त में गँवाया है न पूछ।
वक़्त ने किस तरह यादों को बुझाया है न पूछ।

दर्द को हमने दुआ समझा तो दिल हल्का हुआ,
किस तरह इक ज़ख़्म ने हमको बचाया है न पूछ।

अब तो हर इक ख़्वाब की ताबीर धुँधली है बहुत,
वक़्त के दरिया में क्या-क्या डूब आया है न पूछ।

एक मुद्दत से कोई ख़त भी नहीं आया मगर,
दिल ने हर आहट को उसका ख़त बताया है न पूछ।

वक़्त की गर्दिश में कितने आईने टूटे मगर,
कौन-सा चेहरा था जो दिल से न मिट पाया न पूछ।

आईना अब पूछता है, मैं वही हूँ या नहीं,
वक़्त ने मुझको कहाँ से क्या बनाया है न पूछ।

~ Azhar Sabri ~

07/09/2026

कभी वीरान दिल में भी बहारों की ख़बर आए।
वो बनकर याद मेरे दिल के आँगन में उतर आए।

कभी वो ख़्वाब बनकर यूँ मिरे दिल में समा जाए,
कभी ऐसा भी हो, वो सामने मेरे नज़र आए।

न मंज़िल की मुझे चाहत, न राहों से गिला कोई,
अगर वो हमसफ़र बनकर मेरे संग-ए-सफ़र आए।

अँधेरी रात में जब भी मिरी उम्मीद बुझ जाए,
वो बनकर चाँद मेरी ज़िंदगी में फिर नज़र आए।

न दौलत की तमन्ना है, न दुनिया की कोई चाहत,
मिरे हिस्से में बस उसका कोई लम्हा अगर आए।

न जाने कौन-सी खुशबू है उसकी याद में ऐसी,
हवा छूकर उसे गुज़रे तो मौसम भी सँवर आए।

जो बरसों से दबा रखा है मैंने राज़ सीने में,
वो उसकी इक नज़र से ख़ुद-ब-ख़ुद लब पर उभर आए।

मिरे दिल ने अभी तक हार मानी ही नहीं उससे,
कभी तो मेरी चाहत का उसे भी कुछ असर आए।

~ Azhar Sabri ~

05/09/2026

ये कैसा हुस्न है, जलवा मिरे दिल के क़रीब आए।
झुका हो सर इबादत में, निगाहों में हबीब आए।

गए मस्जिद से उठकर शेख़ जी, बोले ज़रा हँसकर,
हमें क्या ख़ौफ़-ए-महशर हो, अगर हूरें नसीब आएँ।

मोहब्बत में कभी ऐसा भी होता है, कहो यारो,
क़दम बहके हुए हों और वो बनकर तबीब आए।

न जाने कौन-सा रिश्ता है मेरी रूह का उससे,
वो जितना दूर जाए, उतना ही दिल के क़रीब आए।

न माँगी उम्र भर मैंने कोई दौलत, कोई शोहरत,
दुआ में बस ये माँगा, वो मिरा बनकर नसीब आए।

~ Azhar Sabri ~

03/09/2026

ज़िंदगी बोझ सही, फिर भी उठाया जाए।
ज़ख़्म जो दिल में छुपा है वो दिखाया जाए।

सिर्फ़ कहने से नहीं बात बनेगी अपनी,
जो भी रिश्ता है उसे दिल से निभाया जाए।

अपने अपनों से अगर फ़ासले बढ़ते जाएँ,
कोई दीवार तो ऐसी हो गिराया जाए।

बात जब हक़ की हो झुकना नहीं आता हमको,
सर कटे अपना मगर सर न झुकाया जाए।

हर तरफ़ शोर है नफ़रत का सियासत के लिए,
एक आवाज़ मुहब्बत की उठाया जाए।

आईना तोड़ने से चेहरा नहीं बदलेगा,
सामना हो तो हक़ीक़त को बताया जाए।

बे-सबब भीड़ में चलने से भला क्या हासिल,
अपनी मंज़िल का कोई रुख़ तो बनाया जाए।

हर तरफ़ दर्द का तूफ़ान है, 'अज़हर' फिर भी,
दिल के सहरा में कोई दीप जलाया जाए।

~ Azhar Sabri ~

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