Kaustubh Raj
Writer|Poet|Lyricist
एक कहानी है। एक छोटे से गाँव के विद्यालय में शिक्षक राम की कथा पढ़ा रहे थे। लगभग सभी बच्चे ऊंघ रहे थे। रामायण पाठ के दौरान ऐसा होना कोई असामान्य बात नहीं थी; ऐसे समय में तो बड़े भी झपकी ले लेते हैं। यह कहानी इतनी बार सुनाई और दोहराई जा चुकी है कि इसका महत्व क्षीण हो गया है; इसमें नवीनता नहीं रही।
शिक्षक यंत्रवत रूप से पाठ कर रहा था, सामने रखी खुली किताब की ओर देखे बिना ही। बाहर से देखने पर भी कोई समझ सकता था कि वह ऊंघ रहा था। उसे सब कुछ रटा हुआ था और वह तोते की तरह घटनाओं को दोहरा रहा था। उसे इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं था कि वह क्या कह रहा है। जो व्यक्ति किसी बात को रट लेता है, उसे अपने कहे का अर्थ कभी पता नहीं होता।
अचानक कक्षा में हलचल मच गई: निरीक्षक अंदर आ गया था। विद्यार्थी चौकन्ने हो गए और शिक्षक भी सतर्क हो गए। शिक्षक ने पाठ जारी रखा।
निरीक्षक ने कहा, “मुझे यह देखकर खुशी हुई कि आप रामायण पढ़ा रहे हैं। मैं बच्चों से राम के बारे में कुछ पूछूंगा।” यह मानते हुए कि बच्चे टूटी हुई चीजों या युद्धों की कहानियाँ आसानी से याद रख लेते हैं, उन्होंने एक सरल प्रश्न पूछा: “बताओ बच्चों, शंकराचार्य का धनुष किसने तोड़ा था?”
एक लड़के ने हाथ उठाया, खड़ा हुआ और बोला, “माफ़ कीजिए, महोदय। मैंने इसे नहीं तोड़ा। मैं पंद्रह दिन बाहर गया हुआ था। और मुझे यह भी नहीं पता कि इसे किसने तोड़ा है। मैं अभी इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ, क्योंकि इस स्कूल में जब भी कुछ होता है, सबसे पहले मुझे ही दोषी ठहराया जाता है।”
यह घटना निरीक्षक के लिए किसी अप्रत्याशित झटके से कम नहीं थी। वह शिक्षक की ओर मुड़ा, जो छड़ी उठाने ही वाला था, और उसने शिक्षक को कहते सुना, “यह बदमाश ही असली अपराधी है। यह सबसे बुरा है।” निरीक्षक लड़के पर चिल्लाया, “अगर तुमने यह नहीं किया तो उठकर यह क्यों कहा कि तुमने नहीं किया?” उसने निरीक्षक से कहा, “इस लड़के की मीठी बातों में मत फँसो!” निरीक्षक ने कुछ न कहना ही बेहतर समझा, इसलिए वह बस मुड़ा और कक्षा से बाहर चला गया। लेकिन वह बहुत क्रोधित था, और सीधे प्रधानाध्यापक के कार्यालय में जाकर पूरी घटना का ब्योरा दिया। उसने प्रधानाध्यापक से पूछा कि वे इस मामले में क्या करने वाले हैं।
प्रधानाध्यापक ने निरीक्षक से मामले को आगे न बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने समझाया कि इन दिनों छात्रों से कुछ भी कहना जोखिम भरा है। उन्होंने कहा, “चाहे इसे किसी ने भी तोड़ा हो, इस मामले को यहीं छोड़ दें। पिछले दो महीनों से विद्यालय में शांति बनी हुई है। इससे पहले छात्रों ने बहुत सारा फर्नीचर तोड़ दिया था और जला दिया था। चुप रहना ही बेहतर है। इन दिनों उनसे कुछ भी कहना गंभीर मुसीबत को न्योता देना होगा। किसी भी समय हड़ताल, धरना या आमरण अनशन हो सकता है!”
निरीक्षक स्तब्ध रह गया; वह पूरी तरह से हैरान था। वह विद्यालय समिति के अध्यक्ष के पास गया और उसे सारी घटना बताई—कि कक्षा में रामायण पढ़ाई जा रही थी, एक लड़के ने कहा था कि उसने शंकराचार्य का धनुष नहीं तोड़ा है, शिक्षक ने कहा था कि लड़का ही दोषी होगा, प्रधानाध्यापक ने विनती की थी कि चाहे जो भी दोषी हो, इस मामले को यहीं खत्म कर दिया जाए, क्योंकि इस पर आगे बढ़ना बुद्धिमानी नहीं है, हड़ताल का लगातार डर बना हुआ था, इत्यादि। निरीक्षक ने अध्यक्ष से उनकी राय पूछी।
अध्यक्ष ने कहा कि उन्हें लगता है कि प्रधानाध्यापक की नीति बुद्धिमानी भरी थी। उन्होंने आगे कहा, “दोषी के बारे में चिंता न करें। धनुष चाहे जिसने भी तोड़ा हो, समिति उसे ठीक करवा देगी। कारण जानने की बजाय उसे ठीक करवाना बेहतर है।”
उस स्थिति से पूरी तरह से निराश निरीक्षक ने मुझे अपना अनुभव बताया। मैंने उससे कहा कि उसकी कहानी में कुछ भी नया नहीं है। जिन चीजों के बारे में हमें बिल्कुल भी जानकारी नहीं होती, उनके बारे में डींग मारना मानवीय कमजोरी है।
किसी को भी रामायण में शंकराचार्य के धनुष टूटने की घटना याद नहीं थी। क्या उनके लिए यह पूछना बेहतर नहीं होता, “कौन से शंकराचार्य?” लेकिन कोई भी अपनी अज्ञानता स्वीकार करने को तैयार नहीं था। कोई भी इतना साहसी नहीं होता। यही मानव इतिहास की सबसे बड़ी खामी रही है। यह कमजोरी आत्मघाती साबित हुई है। हम ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हमें सब कुछ पता हो और परिणामस्वरूप हमारा जीवन उलझ जाता है। हमारी सभी समस्याओं के उत्तर उसी लड़के, शिक्षक, प्रधानाध्यापक और अध्यक्ष द्वारा दिए गए उत्तरों के समान होते हैं। प्रश्न को समझे बिना उत्तर देने का प्रयास करना मनुष्य को मूर्ख बनाता है। यह सरासर आत्म-धोखा है।
इसके अलावा, उदासीनता का रवैया भी है। उदासीन व्यक्ति पूछेगा, "क्या सच में कोई बवाल मच जाएगा अगर हमें यह नहीं पता चला कि शंकराचार्य का धनुष किसने तोड़ा?"
इस बेतुकी कहानी की समस्याओं के विपरीत, जीवन में कहीं अधिक गहन रहस्य हैं, और उनके उचित समाधान पर ही निर्भर करता है कि जीवन सार्थक हो सकता है या नहीं, सामंजस्यपूर्ण हो सकता है या नहीं, प्रगति के लिए हमारी वर्तमान दिशा सही है या नहीं, इत्यादि। हम सोचते हैं कि हमें उत्तर पता हैं, लेकिन परिणाम दिखाते हैं कि जीवन के प्रति हमारी धारणा वास्तव में कितनी गलत है। हममें से प्रत्येक का जीवन यह दर्शाता है कि हम जीवन के बारे में कुछ भी नहीं जानते। अन्यथा, इतनी निराशा, इतना दुख, इतनी चिंता क्यों है?
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मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा, मेरे आगे
- Mirza Ghalib
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