Krishna.
Worship Govinda, Worship Govinda, O fool Rules of Grammer will not save you.
-----ADI SANKARACHAYA
ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द: विग्रह:, अनादिरादि गोविन्द: सर्व कारण कारणम:
18/09/2026
🌺 अनन्त ब्रह्माण्डों की महारानी श्री राधारानी के प्राकट्य दिवस की शुभकामनाएँ 🌺
एक दिन राजा वृषभानु पवित्र यमुना नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने जल के मध्य एक अद्भुत दिव्य नीला कमल देखा। उसकी दिव्य आभा और सुगंध से पूरा वातावरण अलौकिक एवं आध्यात्मिक हो उठा।
जब वे उस कमल के समीप पहुँचे, तो उन्होंने उसके भीतर एक असाधारण रूप से सुंदर दिव्य बालिका को विराजमान देखा। उनका मुख चन्द्रमा के समान मनोहर था और उनका सम्पूर्ण स्वरूप दिव्य प्रभा से प्रकाशित हो रहा था।
राजा वृषभानु ने उस दिव्य बालिका को अपनी गोद में उठा लिया और उनका हृदय असीम वात्सल्य से भर गया। वह दिव्य बालिका और कोई नहीं, बल्कि श्री राधारानी, श्री वृषभानुनन्दिनी थीं।
श्री राधारानी कोई साधारण जीवात्मा नहीं हैं; वे स्वयं श्रीकृष्ण, परब्रह्म हैं। वही श्रीकृष्ण अपनी परम आह्लादिनी शक्ति—आनंद एवं दिव्य प्रेम प्रदान करने वाली परम शक्ति—के रूप में श्री राधा के रूप में प्रकट हुए।
दूसरे शब्दों में, एक ही परम सत्य ने दिव्य प्रेम-लीला के लिए दो रूपों में प्राकट्य किया—श्रीकृष्ण और श्री राधा।
जिस प्रकार श्रीकृष्ण के दिव्य शरीर और उनके स्वरूप में कोई वास्तविक भेद नहीं है, उसी प्रकार श्री राधा और उनके परम चिन्मय दिव्य स्वरूप में भी कोई वास्तविक भेद नहीं है। दोनों सच्चिदानन्द स्वरूप हैं—नित्य, दिव्य तथा शुद्ध दिव्य प्रेम और आनंद से परिपूर्ण।
इसलिए श्री राधारानी का प्राकट्य साधारण जीवों के समान माता के गर्भ से होने वाला सामान्य जन्म नहीं है। श्रीकृष्ण का दिव्य अवतरण भी सामान्य जन्म नहीं, बल्कि एक दिव्य प्राकट्य (आविर्भाव) है। उसी प्रकार श्री राधारानी का प्राकट्य भी एक दिव्य आविर्भाव है।
मोहिनी अवतार के समय सूर्यदेव ने उस दिव्य सौंदर्यमयी रूप को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। भगवान ने उनकी इच्छा स्वीकार करते हुए उन्हें वरदान दिया कि भविष्य में वही दिव्य शक्ति उनकी पुत्री के रूप में प्रकट होंगी और उनका सौंदर्य मोहिनी से भी अनन्त गुना अधिक होगा।
उस दिव्य वरदान के प्रभाव से सूर्यदेव आगे चलकर राजा वृषभानु के रूप में प्रकट हुए और वही परम दिव्य शक्ति श्री राधारानी के रूप में प्रकट हुईं।
अतः श्री राधा का प्राकट्य केवल जन्म की कथा नहीं है; यह श्रीकृष्ण की परम दिव्य प्रेम-शक्ति का दिव्य प्राकट्य है। यहाँ शक्ति और शक्तिमान में कोई वास्तविक भेद नहीं है।
दिव्य प्रेम-लीला के लिए, एक ही परम सत्य दो रूपों में प्रकट होता है—श्री राधा और श्रीकृष्ण। 🌺
राधे राधे! 🙏🌺
10/09/2026
दिव्य प्रेम की क्रमिक उन्नति ❤️
1. रति (रति) – श्रीकृष्ण के प्रति शुद्ध दिव्य प्रेम का प्रथम अंकुर या जागरण।
2. प्रेम (प्रेम) – निष्काम, निर्मल और पूर्णतः भगवान-केंद्रित प्रेम।
3. स्नेह (स्नेह) – प्रेम इतना गहरा हो जाता है कि हृदय निरंतर द्रवित रहने लगता है।
4. मान (मान) – प्रेमपूर्ण रूठना, जो प्रेम की मधुरता, निकटता और रस को और बढ़ाता है।
5. प्रणय (प्रणय) – ऐसा घनिष्ठ प्रेम जिसमें अपने-पराए या संकोच का कोई भाव नहीं रहता।
6. राग (राग) – अत्यन्त गहन अनुराग; श्रीकृष्ण के बिना एक क्षण भी रहना असह्य प्रतीत होता है।
7. अनुराग (अनुराग) – निरंतर बढ़ने वाला, नित्य-नूतन प्रेम; प्रत्येक मिलन में भी श्रीकृष्ण नए-नए प्रतीत होते हैं।
8. भाव (भाव) – प्रेम की अत्यन्त उत्कट एवं दिव्य अवस्था, जिसमें आध्यात्मिक भावों की तीव्र अभिव्यक्ति होती है।
9. महाभाव (महाभाव) – दिव्य प्रेम की सर्वोच्च पराकाष्ठा। इसका पूर्ण और अखण्ड स्वरूप केवल श्रीराधारानी में ही प्रकट है। उनकी प्रमुख सखियाँ भी अपने-अपने आध्यात्मिक स्वरूप के अनुसार इस महाभाव में सहभागिनी हैं।
यह क्रम श्रीरूप गोस्वामी द्वारा प्रतिपादित भक्ति-रस सिद्धान्त पर आधारित है और जगद्गुरु कृपालु जी महाराज भी अपनी रास-तत्त्व की व्याख्याओं में इसी क्रम का वर्णन करते हैं।
08/09/2026
कृपालु जी महाराज द्वारा बताए गए स्नेह के दो प्रकार के वर्गीकरण
हृदय के पिघलने के आधार पर तीन स्तर:
1. कनिष्ठ स्नेह — भगवान श्रीकृष्ण के शारीरिक स्पर्श या निकटता से हृदय पिघलता है।
2. मध्यम स्नेह — केवल श्रीकृष्ण के दर्शन मात्र से हृदय पिघल जाता है।
3. श्रेष्ठ स्नेह — केवल श्रीकृष्ण की वाणी सुनने मात्र से हृदय पिघल जाता है।
स्नेह के स्वभाव/गुण के आधार पर तीन प्रकार:
1: लाक्षावत स्नेह — निम्नतर स्नेह; प्रियतम की ओर से पर्याप्त ध्यान मिलने पर ही अधिक पिघलता है।
2: घृत स्नेह — घी के समान; प्रेमपूर्ण ऊष्मा से पिघलता है, लेकिन प्रियतम की उपेक्षा या दूरी में पुनः कठोर हो सकता है।
3: मधु स्नेह — मधु (शहद) के समान अत्यंत मधुर; प्रियतम के ध्यान की कमी से भी इसकी मधुरता कम नहीं होती और इसे अधिक श्रेष्ठ माना जाता है।
इसलिए ये छह नाम एक ही क्रम में आने वाली छह अवस्थाएँ नहीं हैं। स्नेह को दो अलग-अलग आधारों पर समझाया गया है—(1) हृदय कितनी सहजता से पिघलता है और (2) स्नेह का स्वभाव कैसा है।
06/09/2026
सगुण ब्रह्म के भक्त आवश्यक रूप से मुक्ति के पाँच रूपों—सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य—की भी कामना नहीं करते। सर्वोच्च प्रेम-भक्ति में मुक्ति स्वयं भक्त का लक्ष्य नहीं होती। भक्त केवल भगवान के प्रति शाश्वत प्रेममयी भक्ति और दिव्य प्रेम से प्राप्त निरंतर बढ़ते आनंद की कामना करता है। यह भावना प्रह्लाद और काकभुशुण्डि जैसे भक्तों में दिखाई देती है, जिन्होंने भगवान की भक्ति को मुक्ति से भी श्रेष्ठ माना। यहाँ एक गहरा अंतर है: मुक्ति मुख्यतः भौतिक बंधन और सांसारिक दुःख से मुक्ति है, जबकि प्रेम-भक्ति भगवान के साथ एक सकारात्मक, शाश्वत प्रेमपूर्ण संबंध है। ऐसे भक्त के लिए प्रेमपूर्ण सेवा के बिना मुक्ति भी अधूरी है; उसका सर्वोच्च लक्ष्य शाश्वत दिव्य प्रेम और आनंद है।
I glorify my master Jagadguru kripalu ji maharaj and my spiritual guide Su shree Braja Nikunjeshwari devi ji
——Radhe Radhe
05/09/2026
श्रीभगवान् श्रीकृष्ण अजन्मा, अनादि, अनन्त और सनातन हैं। वे सामान्य जीवों की भाँति कर्मबंधन में पड़कर भौतिक रूप से जन्म नहीं लेते; वे अपनी अहैतुकी करुणा, दिव्य इच्छा और योगमायामयी शक्ति के द्वारा प्रकट होते हैं।
जब परमेश्वर श्रीकृष्ण माता देवकी और पिता वसुदेव के समक्ष प्रकट हुए, तब उन्होंने अपना चतुर्भुज दिव्य स्वरूप प्रदर्शित किया। उनके उस अद्भुत दिव्य रूप को देखकर माता देवकी और पिता वसुदेव ने उनके परमेश्वरत्व को पहचान लिया। माता देवकी की विनम्र प्रार्थना पर, ताकि वे अपने पुत्र के प्रति वात्सल्य भाव सहज रूप से प्रकट कर सकें, श्रीकृष्ण ने अपने चतुर्भुज दिव्य स्वरूप को सामान्य नवजात शिशु के रूप में प्रकट किया।
इसी प्रकार, भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य शक्ति योगमाया, जिन्हें कुछ परंपराओं में देवी विन्ध्यवासिनी के रूप में भी पूजा जाता है, माता यशोदा और नन्दबाबा के समक्ष दिव्य रूप से प्रकट हुईं। कुछ शास्त्रीय परंपराओं में उनका वर्णन अष्टभुजा देवी के रूप में किया गया है, जिन्होंने बाद में कन्या-शिशु का रूप धारण किया।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक भेद को समझना आवश्यक है। सामान्य जीवों के लिए शरीर और आत्मा अलग-अलग होते हैं। शरीर भौतिक, परिवर्तनशील और नश्वर होता है, जबकि आत्मा शाश्वत होती है। जीव अपने कर्मों के अनुसार भौतिक शरीर धारण करता है।
किन्तु परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के विषय में यह भेद लागू नहीं होता। श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप और उनका आत्मस्वरूप अभिन्न हैं। उनका विग्रह सत्–चित्–आनन्दमय है—शाश्वत, पूर्ण चेतन और परम आनन्दस्वरूप। उनका शरीर किसी सामान्य भौतिक शरीर के समान नहीं है।
भगवान् श्रीकृष्ण अपनी अन्तरंग दिव्य शक्ति योगमाया के माध्यम से अपने भक्तों को उनकी भक्ति, प्रेम और भाव के अनुरूप उनके साथ विभिन्न दिव्य संबंधों का अनुभव करने का अवसर प्रदान करते हैं। इसी कारण भगवान् वृन्दावन में भक्तों को कभी पुत्र, कभी सखा और कभी प्रियतम के रूप में अनुभव हो सकते हैं।
अतः श्रीकृष्ण के मानव-सदृश बालरूप, उनकी बाल-लीलाओं तथा उनके अन्य मानवीय प्रतीत होने वाले दिव्य क्रियाकलापों की तुलना सामान्य जीवों के भौतिक जन्म और कर्मों से करना उचित नहीं है।
श्रीकृष्ण का प्राकट्य, उनका दिव्य विग्रह और उनकी समस्त लीलाएँ सनातन, दिव्य और पारलौकिक हैं। वे अजन्मा होते हुए भी भक्तों के प्रेम को स्वीकार करने के लिए कृपापूर्वक प्रकट होते हैं—यही उनकी परम करुणा और दिव्य लीला का अद्भुत रहस्य है।
16/08/2026
To everyone who's not a Hindu or follows Hinduism in any capacity, just because some imagery is not aesthetic according to our modern standards, it doesn't mean they are demons or evil. In Hinduism, the knowledge of good and evil is not binary. Just because Kali looks dark and scary doesn't mean she's a demon.
The point is that Kali represents something "Dark side of anything". It can mean the dark side of Masculine, or feminine. Kali represents Nature in its most brutal form, which doesn't warrant a good-looking picture.
Considering pictures are being used as symbols here. In Hinduism, death is not something bad. Death is also bound by the Dharma-Karma cycle and it is just doing its job which is necessary to bring balance to the world.
Karma literally means your job (Divine Job). A warrior's
karma is to go to battle. A sage = shaman = old wise
man's job is to teach and find new ways to expand its knowledge. The job of Kali is to destroy. It's her job in the Universe (Corporate Cosmos, lol. jk) which she is bound to do. She's not doing it out of intention. Scary face /= Scary Philosophy or person
16/07/2026
Types of philosophy by main original Jagadgurus there are some Gadddhari Jagadgurus they are made by tradition not original. Please read below-:
1- Adi Shankaracharya Advaita (Non-dualism)
2-Ramanujacharya Vishishtadvaita (Qualified Non-dualism)
3- Nimbarkacharya Dvaitadvaita (Dualistic Non-dualism)
4- Madhvacharya Dvaita (Dualism)
5- Kripalu Ji Maharaj philosophy as Samanvaya-vāda (समन्वयवाद),
Check below
These are all philosophy of All 5 original Jagadgurus
Jagadguru Kripalu Ji Maharaj described his philosophy as Samanvaya-vāda (समन्वयवाद), meaning the philosophy of harmonious synthesis.
According to his teachings:
* All authentic Vedic scriptures (the Vedas, Upanishads, Bhagavad Gita, Bhagavata Purana, etc.) are true and do not ultimately contradict one another.
* The philosophical systems of Adi Shankaracharya, Ramanujacharya, Madhvacharya, and Nimbarkacharya each express valid aspects of spiritual truth from different perspectives rather than being completely contradictory.
* The highest spiritual goal is pure divine love (prema-bhakti) for Radha and Krishna.
* Spiritual progress requires both God’s grace and the guidance of a true Guru.
* Jñāna (knowledge), karma (selfless action), and bhakti (devotion) all have their place, but selfless devotion infused with divine love is presented as the supreme path to God-realization.
The word “Samanvaya” (समन्वय) means coordination, harmony, or reconciliation. In this context, it refers to reconciling the teachings of different scriptures and philosophical traditions into one coherent understanding instead of treating them as mutually exclusive.
This approach is one of the distinctive features of Kripalu Ji Maharaj’s teachings, as he emphasized that apparent contradictions among the scriptures arise from differences in context, the spiritual level of the audience, or the aspect of truth being explained, rather than from genuine inconsistency.
09/07/2026
ईश्वर की कृपा प्राप्त करने की शर्त
“उस परमेश्वर की शरण में जाओ, जो ब्रह्मा तथा अन्य सभी देवताओं के भी सृष्टिकर्ता हैं और जिनकी कृपा से जीवात्मा तथा बुद्धि प्रकाशित होती है।” (वेद)
केवल भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति) के द्वारा ही हम उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। यद्यपि हमारे पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि हैं, फिर भी शास्त्र कहते हैं—
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। (पञ्चदशी)
“मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण केवल मन ही है।”
इसलिए हमें केवल अपने मन का ही भगवान के प्रति समर्पण करना है। जब मन समर्पित हो जाता है, तब अन्य सब कुछ स्वतः ही समर्पित हो जाता है। मन का समर्पण ही भगवान के प्रति वास्तविक समर्पण है, चाहे बाहरी कर्म जैसे भी हों।
किन्तु सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हमारा मन अनादि काल से इस भौतिक संसार से आसक्त रहा है और यह आसक्ति अत्यन्त दृढ़ हो चुकी है। यदि मन न तो संसार से जुड़ा होता और न ही भगवान से, तो समर्पण करना बहुत सरल होता। इसलिए हमें पहले संसार के वास्तविक स्वरूप को समझना होगा, ताकि उससे वैराग्य उत्पन्न हो सके। तभी भगवान के प्रति सच्चा समर्पण संभव होगा।
English translation
Condition To Attain God’s Grace
“Surrender to the Supreme Lord, Who is the Creator of even Brahma and other celestial gods, and by Whose grace, the soul and intellect are illumined.” (Vedas)
Only by fully surrendering to God can we receive God’s grace. Though we possess a body, senses, a mind, and intellect the scriptures say,
mana eva manushyāṇāṁ kāraṇam bandhamokṣhayoḥ (Panchadashi)
“The mind alone is the cause of bo***ge and liberation.”
So, it is the mind only that we must surrender to God. By surrendering it, all else will automatically be surrendered. Surrender of the mind alone is true surrender to God, no matter what the physical actions may be.
However, the major difficulty is that the mind has been attached to the material world since time immemorial, and this attachment has become very firm. Had the mind been neither attached to the world nor to God, then surrender would have been very easy. Therefore, we need to understand the true nature of the world, so that we can become detached from it. It is only then that surrender to God will be possible.
भगवतः कृपाप्राप्तेः शर्तः
“यः ब्रह्मणोऽपि तथा अन्येषां देवानां स्रष्टा अस्ति, यस्य कृपया जीवात्मा बुद्धिश्च प्रकाशिते भवतः, तस्मै परमेश्वराय पूर्णतया शरणं गच्छेत्।” (वेदाः)
केवलं परमेश्वरस्य पूर्णशरणागत्या एव भगवतः कृपा प्राप्यते। यद्यपि अस्माकं शरीरम्, इन्द्रियाणि, मनः तथा बुद्धिः सन्ति, तथापि शास्त्रेषु उक्तम्—
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। (पञ्चदशी)
अतः केवलं मनसः समर्पणमेव परमेश्वराय कर्तव्यम्। मनसि समर्पिते सर्वमन्यदपि स्वतः समर्पितं भवति। मनसः समर्पणमेव भगवति यथार्थः शरणागतिर्भवति, बाह्यकर्माणि यथाकथञ्चिदपि सन्तु।
किन्तु मुख्या कठिनता एषा यत् मनः अनादिकालतः भौतिकसंसारे आसक्तम् अस्ति, एषा च आसक्तिः अतीव दृढा अभवत्। यदि मनः न संसारे आसक्तं स्यात्, न च भगवति, तर्हि समर्पणं अतीव सुकरं स्यात्। अतः प्रथमं संसारस्य यथार्थस्वरूपं ज्ञातव्यं, येन तस्मात् वैराग्यं जायेत। तदा एव भगवति यथार्थसमर्पणं सम्भवति।
30/06/2026
God realization is not the consequence of any practice. It is a divine Gift which is recive through his grace when his devotee's heart and mind conceivean unbreakable oneness with his divine beloved Radha Krishna when ever the desire of love dissolves in the loving feeling of his absolute nearness.
~5th Jagadguru Kripalu ji maharaj Radhe Radhe
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