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एक शिक्षक की डायरी — हर बच्चे की एक कहानी
एपिसोड 17: कक्षा 11वीं का भटकाव और करियर का दबाव
आज मैं पहली बार कक्षा 11वीं 'सी' (विज्ञान वर्ग) में दाखिल हुआ। कक्षा 10वीं पास करके आए इन नए-नए विद्यार्थियों के चेहरे पर बोर्ड परीक्षा ख़त्म होने की राहत तो थी, लेकिन साथ ही भविष्य को लेकर एक गहरा भ्रम भी साफ़ झलक रहा था। कुछ बच्चे जेईई और नीट की भारी-भरकम गाइड्स मेज़ पर सजाकर बैठे थे, जबकि कुछ केवल दूसरों की देखा-देखी इस स्ट्रीम में आ गए थे और असहाय महसूस कर रहे थे।
मेरी नज़र मध्य पंक्ति में बैठे विशाल पर पड़ी। वह फिजिक्स की किताब खोलकर बैठा था, लेकिन उसकी नज़रें लगातार खाली पन्ने पर अटकी हुई थीं। जब मैंने उससे पूछा, "विपाल, क्या सोच रहे हो?" तो उसने एक गहरी साँस ली।
"सर... समझ नहीं आ रहा कि मैं सही जगह हूँ या नहीं," विशाल ने उदास मन से कहा। "पापा चाहते हैं कि मैं इंजीनियर बनूँ, इसलिए मैंने मैथ्स ले लिया। लेकिन मुझे तो ड्राइंग और डिज़ाइनिंग पसंद है। यहाँ कक्षा में सब कोचिंग और रैंक की बातें करते हैं, और मुझे लगता है कि मैं भीड़ में खो गया हूँ।"
विशाल की बात सिर्फ़ उसकी अकेली समस्या नहीं थी। 11वीं कक्षा में आते ही ज़्यादातर विद्यार्थी सामाजिक और पारिवारिक दबाव में ऐसे विषयों का चुनाव कर लेते हैं जो उनके स्वाभाविक हुनर से मेल नहीं खाते। इसके बाद शुरू होता है थका देने वाला मानसिक तनाव।
मैंने पूरी क्लास को संबोधित करते हुए कहा, "बच्चों, 11वीं कक्षा केवल किसी प्रवेश परीक्षा की तैयारी का पड़ाव नहीं है। यह अपने असली हुनर और रुचि को पहचानने का समय है। करियर का सही चुनाव दूसरों की देखा-देखी नहीं, बल्कि अपनी क्षमता और पसंद के संतुलन से होता है।"
मैंने विशाल को अलग से बुलाकर समझाया कि वह अपने गणितीय ज्ञान को डिज़ाइनिंग और आर्किटेक्चर जैसे क्षेत्रों में कैसे मिला सकता है। विशाल के चेहरे का तनाव धीरे-धीरे कम हुआ।
मुझे समझ आया कि इस उम्र में विद्यार्थियों को सिर्फ़ किताबों का ज्ञान देना काफ़ी नहीं है। एक शिक्षक का फ़र्ज़ उन्हें सही करियर मार्गदर्शन देना और उनके अंदर यह विश्वास जगाना भी है कि उनकी अपनी पहचान भीड़ से अलग हो सकती है।
आज की शिक्षक-सीख:
विद्यार्थियों को सामाजिक दबाव में करियर चुनने से बचाएं; उनकी छिपी प्रतिभा और रुचि को पहचानकर उन्हें सही दिशा और Career Guidance देना शिक्षक की बड़ी जिम्मेदारी है।
एक शिक्षक की डायरी — हर बच्चे की एक कहानी
एपिसोड 16: ग्रुप स्टडी और तुलना का ज़हर
10वीं की बोर्ड परीक्षा जैसे-जैसे नज़दीक आ रही थी, कक्षा में एक अनजाना प्रतिस्पर्धा का माहौल बनने लगा था। आज जब मैं कक्षा 10वीं में दाख़िल हुआ, तो देखा कि बच्चे गुटों में बँटे हुए थे। एक तरफ़ मेधावी छात्रों की टोली बैठी थी और दूसरी तरफ़ औसत अंक लाने वाले बच्चों का समूह।
मैंने देखा कि रिया, जो गणित में थोड़ी कच्ची थी, आर्यन और स्नेहा के पास अपना डाउट पूछने गई। लेकिन आर्यन ने बहुत लापरवाही से कहा, "रिया, यह बहुत बेसिक सवाल है। अगर तुम्हें यह भी नहीं आता, तो बोर्ड में तुम्हारा क्या होगा? तुम हमारी तरह तेज़ बच्चों के साथ ग्रुप स्टडी नहीं कर सकती।"
रिया का चेहरा उतर गया। वह चुपचाप अपनी जगह पर आकर बैठ गई और उसकी आँखों में आँसू आ गए।
कक्षा में बढ़ता यह विभाजन मुझे बहुत खटका। अक्सर जब परीक्षा का दबाव बढ़ता है, तो बच्चे जाने-अनजाने एक-दूसरे की क्षमताओं की तुलना करने लगते हैं। अच्छे विद्यार्थी खुद को श्रेष्ठ समझने की भूल कर बैठते हैं, जबकि औसत बच्चे खुद को नीचा मानकर पढ़ाई से पीछे हटने लगते हैं।
मैंने ब्लैकबोर्ड पर कोई सवाल लिखने के बजाय एक साधारण सी गतिविधि कराने का फ़ैसला किया। मैंने पूरी क्लास को चार-चार बच्चों के ऐसे समूहों में बाँट दिया, जिनमें हर स्तर का विद्यार्थी शामिल था—एक तेज़, दो औसत और एक कमजोर।
"आज से पढ़ाई अकेले या सिर्फ़ अपने मनपसंद दोस्तों के साथ नहीं होगी," मैंने कड़े लेकिन शांत स्वर में कहा। "हर ग्रुप का लक्ष्य यह होगा कि उनका कोई भी साथी पीछे न छूटे। आर्यन, अगर तुम किसी कठिन सवाल को रिया को आसानी से समझा सकते हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हारा अपना कॉन्सेप्ट और भी मजबूत हो गया है। असली लीडरशिप सिर्फ़ खुद अव्वल आना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है।"
आर्यन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने झिझकते हुए रिया की तरफ़ अपनी नोटबुक बढ़ाई और मुस्कुराकर कहा, "आओ, इसे मिलकर सॉल्व करते हैं।"
मुझे समझ आया कि बच्चों को केवल अच्छे अंक लाना सिखाना काफ़ी नहीं है। उन्हें यह सिखाना भी उतना ही ज़रूरी है कि वे कैसे एक-दूसरे का सहारा बनें और तुलना के इस ज़हर से दूर रहकर एक-दूसरे की ताक़त पहचानें।
आज की शिक्षक-सीख:
प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को केवल अंक लाना ही नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करना और नेतृत्व (Leadership) सिखाएं; कक्षा में तुलना की जगह सहकारिता (Peer Learning) का माहौल बनाएं।
एक शिक्षक की डायरी — हर बच्चे की एक कहानी
एपिसोड 15: किशोरावस्था की दहलीज और गुमसुम गलियारा
अर्द्धवार्षिक परीक्षा के बाद स्कूल में एक नई उमंग होनी चाहिए थी, लेकिन कक्षा 10वीं के पास से गुज़रते हुए मुझे एक अलग ही ख़ामोशी का अहसास हुआ। यह वही कक्षा थी जिसके बच्चे अगले साल बोर्ड परीक्षा देने वाले थे। किशोरावस्था की दहलीज पर खड़े इन बच्चों के चेहरों पर सिर्फ़ पढ़ाई की चिंता नहीं, बल्कि शरीर और मन में हो रहे तेज़ी से बदलावों की उथल-पुथल भी साफ़ दिख रही थी।
आज की मेरी पहली क्लास 10वीं में ही थी। जैसे ही मैं अंदर गया, मेरी नज़र आर्यन पर पड़ी। आर्यन हमेशा से बहुत हंसमुख और खुलकर बात करने वाला लड़का था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह एकदम गुमसुम रहने लगा था। उसकी दाढ़ी-मूँछ की हल्की रेखाएँ उभर आई थीं, आवाज़ भारी हो गई थी और वह अपनी ही बेंच पर खुद को समेटकर बैठता था। जब उसके पास बैठा दोस्त रोहन (9वीं का रोहन नहीं, यह 10वीं का रोहन है) उस पर हँसा, तो आर्यन अचानक उस पर झपट पड़ा।
"बाहर निकलो मेरी बेंच से!" आर्यन चिल्लाया।
पूरी क्लास सन्न रह गई। हमेशा शांत रहने वाला बच्चा अचानक इतना आक्रामक कैसे हो गया?
मैंने दोनों को अलग किया और आर्यन को गुस्से में डांटने के बजाय शांत रहने को कहा। क्लास ख़त्म होने के बाद मैंने आर्यन को ग्राउंड की तरफ टहलने के लिए साथ लिया।
"आर्यन, क्या बात है? तुम पिछले कुछ दिनों से काफी खिंचे-खिंचे और चिड़चिड़े लग रहे हो?" मैंने दोस्ताना अंदाज़ में पूछा।
आर्यन ने नज़रें झुका लीं और हिचकिचाते हुए बोला, "सर... मुझे समझ नहीं आ रहा मेरे साथ क्या हो रहा है। मेरी आवाज़ बदल रही है, चेहरे पर मुँहासे आ रहे हैं, और छोटी-छोटी बात पर गुस्सा आ जाता है। कभी-कभी लगता है कोई मुझे समझता ही नहीं।"
उसकी बात सुनकर मुझे अहसास हुआ कि किशोरावस्था का यह दौर बच्चों के लिए कितना भ्रमित करने वाला होता है। शारीरिक और हार्मोनल बदलावों के कारण उनके भीतर पहचान और स्वाभिमान की एक जंग चल रही होती है, जिसे अक्सर बड़े 'बदतमीज़ी' या 'जिद्दीपन' समझ लेते हैं।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराकर कहा, "आर्यन, यह सब बहुत सामान्य है। तुम बड़े हो रहे हो और तुम्हारा शरीर व दिमाग़ नए बदलावों से ढल रहा है। इसमें डरने या शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं है।"
आर्यन के चेहरे से तनाव की एक बड़ी परत हट गई। उस दिन मुझे समझ आया कि इस उम्र के बच्चों को सख्त अनुशासन से ज़्यादा एक ऐसे इंसान की ज़रूरत होती है जो उनकी शारीरिक और भावनात्मक उथल-पुथल को बिना जज किए समझ सके।
आज की शिक्षक-सीख:
किशोरावस्था में विद्यार्थियों के बदलते शारीरिक और भावनात्मक व्यवहार को 'अनुशासनहीनता' न समझें; उन्हें डांटने के बजाय सहानुभूति और संवाद से यह अहसास दिलाएं कि यह बदलाव जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।
एक शिक्षक की डायरी — हर बच्चे की एक कहानी
एपिसोड 14: दो हफ़्तों का निचोड़ और एक नया संकल्प
अर्द्धवार्षिक परीक्षा समाप्त हो चुकी थी और आज का दिन पूरे दो हफ़्तों की इस यात्रा को पीछे मुड़कर देखने का था। जब मैं कक्षा के दरवाज़े पर खड़ा हुआ, तो मुझे अपनी इस कक्षा में एक गहरा और खूबसूरत बदलाव नज़र आया।
कक्षा में अब वह पहले जैसा बिखराव और डर नहीं था। रोहन, जो कभी कागज़ के हवाई जहाज़ उड़ाकर ध्यान भटकाता था और देर रात तक मोबाइल स्क्रीन से चिपका रहता था, आज पूरे आत्म-नियंत्रण के साथ अपनी बेंच पर बैठकर परीक्षा के उत्तरों का विश्लेषण कर रहा था। राहुल, जो कभी सवाल के नाम से सहम जाता था, अपनी नीले रंग की डायरी में हर दिन की छोटी-छोटी तरक्की देखकर मुस्कुरा रहा था। विकास के चेहरे पर भी घर के तनाव की जगह एक ठहराव आ चुका था, क्योंकि उसे पता था कि स्कूल उसके लिए एक सुरक्षित आश्रय है। और स्नेहा? उसने 'हमेशा अव्वल आने' के भारी मानसिक दबाव से खुद को मुक्त कर लिया था और अब खुलकर पढ़ाई का आनंद ले रही थी।
मैंने ब्लैकबोर्ड पर लिखा—"सीखना एक यात्रा है, कोई मंज़िल नहीं।"
इन चौदह दिनों में मैंने एक शिक्षक के रूप में यह भी सीखा कि हम हमेशा सही नहीं होते। जब मैं थकावट में रोहन पर चिल्लाया था और फिर अपनी गलती मानकर उससे माफ़ी माँगी थी, तो उस एक पल ने मेरे और बच्चों के
बीच विश्वास की एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी जिसे कोई डर नहीं तोड़ सकता था।
स्टाफ रूम में बैठकर जब मैंने चाय का कप उठाया, तो मुझे अहसास हुआ कि एक अच्छी कक्षा वह नहीं है जहाँ कोई बच्चा रोहन की तरह शरारत न करे या राहुल की तरह कमजोर न हो। असली कक्षा तो वह है जहाँ हर बच्चे की समस्या को समझा जाए, उसकी गति का सम्मान किया जाए और उसे अपमानित किए बिना आगे बढ़ाया जाए।
सफ़र अभी बहुत लंबा था—सामने बोर्ड परीक्षाएँ थीं, किशोरावस्था के बदलते व्यवहार थे और करियर की उलझनें थीं। लेकिन मुझे यकीन था कि जब तक हमारे बीच विश्वास, सम्मान और सहानुभूति का यह अटूट पुल बना रहेगा, हम हर चुनौती को पार कर लेंगे।
आज की शिक्षक-सीख:
शिक्षण केवल पाठ्यक्रम खत्म करने का नाम नहीं है; जब आप विद्यार्थियों की भावनाओं, उनकी सीमाओं और उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को समझते हैं, तो कक्षा खुद-ब-खुद एक सकारात्मक परिवार में बदल जाती है।
एक शिक्षक की डायरी — हर बच्चे की एक कहानी
एपिसोड 13: परीक्षा से परे की परीक्षा
अर्द्धवार्षिक परीक्षा के परिणाम आने वाले थे। पूरी कक्षा में एक अजीब सा डर और तनाव फैला हुआ था। सुबह जब मैं क्लास में दाखिल हुआ, तो बच्चे किताबों में मुँह छिपाए अंतिम मिनटों के रिवीजन में लगे थे। सबसे ज़्यादा घबराहट पहली बेंच पर बैठी स्नेहा के चेहरे पर थी, जो हर बार शत-प्रतिशत अंक लाती थी। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं और वह लगातार अपने नोट्स पलट रही थी।
"क्या हुआ स्नेहा? सब ठीक है ना?" मैंने पास जाकर पूछा।
स्नेहा ने डरती हुई आँखों से मेरी तरफ देखा और कहा, "सर... अगर इस बार मेरा एक भी नंबर कट गया तो मम्मी-पापा बहुत दुखी होंगे। मुझे बहुत डर लग रहा है कि कहीं मैं कोई गलती न कर दूँ।"
स्नेहा की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। अक्सर हम केवल कमजोर बच्चों की ही चिंता करते हैं, लेकिन जो बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे होते हैं, वे 'हमेशा अव्वल आने' के एक अदृश्य और भारी मानसिक दबाव से गुजर रहे होते हैं। असफलता का डर उन्हें अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रहा होता है।
मैंने पूरी क्लास से किताबें बंद करने को कहा। सब हैरान रह गए।
"बच्चों," मैंने ब्लैकबोर्ड पर एक बड़ा सा बिंदु (Dot) बनाया और कहा, "परीक्षा यह तय नहीं करती कि आप जीवन में कितने सफल इंसान बनेंगे। यह सिर्फ आपकी मेहनत का एक छोटा सा आंकलन है। स्नेहा, रोहन, राहुल... आप सब सिर्फ अंकों का एक रिपोर्ट कार्ड नहीं हैं। अगर आज कोई सवाल गलत भी हो जाए, तो उससे आपकी काबिलियत खत्म नहीं हो जाएगी।"
मैंने स्नेहा की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "गलतियाँ करने से मत डरो, क्योंकि वही सिखाती हैं। आज का पेपर सिर्फ एक खेल की तरह खेलो, बिना किसी बोझ के।"
स्नेहा के कंधों का तनाव अचानक ढीला पड़ गया। उसने एक लंबी साँस ली और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान लौट आई। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि एक शिक्षक का काम सिर्फ कमजोर बच्चों को ढालना ही नहीं, बल्कि प्रतिभाशाली बच्चों को 'परफेक्शन' के जानलेवा दबाव से बचाना भी है।
आज की शिक्षक-सीख:
प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को केवल अंक और सफलता पाने के दबाव में न ढकेलें; उन्हें यह भी सिखाएं कि असफलता से डरना नहीं है और जीवन में अंकों से बढ़कर उनका मानसिक स्वास्थ्य और प्रयास महत्वपूर्ण हैं।
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एक शिक्षक की डायरी — हर बच्चे की एक कहानी
एपिसोड 12: एक शिक्षक की अपनी थकावट और सीमाएँ
सितंबर का महीना ढल रहा था। अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं का बोझ, कॉपियों का अंबार और रोज़ की भागदौड़ ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था। आज सुबह जब मैं जगा, तो भारी सिर दर्द और थकावट से शरीर टूट रहा था। लेकिन ड्यूटी तो ड्यूटी थी। भारी कदमों से मैं स्कूल पहुँचा और कक्षा' में दाखिल हुआ।
बोर्ड पर चॉक चलाते समय मेरा हाथ काँप गया और चॉक टूटकर नीचे गिर गई। थकावट के कारण मेरा पारा चढ़ गया। जब रोहन ने अनजाने में अपनी मेज़ पर पेन से टक-टक की आवाज़ की, तो मैं अचानक उस पर चिल्ला पड़ा, "रोहन! क्या तुम्हें एक मिनट भी शांत बैठना नहीं आता? पूरी क्लास का ध्यान भटका कर रखा है!"
कमरे में सन्नाटा छा गया। रोहन सहम कर बैठ गया। उसकी आँखों में इस बार कोई शरारत नहीं, बल्कि बेगुनाही का दर्द था। उसने तो बस गलती से पेन गिरा दिया था।
मुझे तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। मेरी थकावट और व्यक्तिगत तनाव का गुस्सा एक मासूम बच्चे पर निकल गया था। हम शिक्षक अक्सर यह भूल जाते हैं कि हम भी इंसान हैं, हमारी भी सीमाएँ हैं। लेकिन अपनी थकावट का हर्जाना बच्चों से वसूलना सरासर गलत था।
मैंने एक लंबी साँस ली, चॉक का टुकड़ा उठाया और रोहन की तरफ देखा।
"रोहन, आई एम सॉरी," मैंने पूरी क्लास के सामने कहा। "आज मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है और मैं थक गया था। मुझ पर चिल्लाना नहीं चाहिए था। तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।"
पूरी कक्षा हैरान रह गई। एक शिक्षक को अपनी गलती मानते देखना उनके लिए नया अनुभव था। रोहन के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान तैर गई। उसने उठकर मुस्कुराते हुए कहा, "कोई बात नहीं सर, आप पानी पी लीजिए। आज हम सब बहुत शांति से पढ़ेंगे।"
उस दिन मुझे समझ आया कि शिक्षक को हमेशा 'सर्वज्ञ' या 'अचूक' दिखने की ज़रूरत नहीं है। अपनी मानवीय सीमाओं को स्वीकार करना और अपनी गलती पर माफ़ी
माँगना बच्चों के सामने हमारे सम्मान को कम नहीं करता, बल्कि उनके दिल में हमारे प्रति सच्चा आदर और विनम्रता की भावना जगाता है।
आज की शिक्षक-सीख:
शिक्षक भी इंसान होते हैं; यदि तनाव या थकावट में आपसे कोई गलती हो जाए, तो विद्यार्थियों से अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच न करें, यह बच्चों को विनम्रता और ईमानदारी का सबसे बड़ा सबक देता है।
एक शिक्षक की डायरी — हर बच्चे की एक कहानी
एपिसोड 11: जब दरवाज़े बंद मिले
पीटीएम का आधा दिन बीत चुका था। ज़्यादातर माता-पिता आकर जा चुके थे, लेकिन मेरी नज़रें लगातार कक्षा के दरवाज़े पर टिकी थीं। मैं विकास के पिता का इंतज़ार कर रहा था। विकास वही बच्चा था जो कुछ दिनों पहले घर के तनाव और झगड़ों के कारण कक्षा में अपनी कॉपी फाड़कर रो पड़ा था।
सबके जाने के बाद भी जब कोई नहीं आया, तो मैंने रजिस्टर से विकास का लैंडलाइन और मोबाइल नंबर निकाला। तीन-चार बार फोन घंटी बजने के बाद विकास के पिता ने झल्लाहट में फोन उठाया।
"जी बोलिए, कौन?" दूसरी तरफ से एक भारी और बेपरवाह आवाज़ आई।
"नमस्ते श्रीमान, मैं विकास का वर्ग शिक्षक बोल रहा हूँ। आज स्कूल में पेरेंट-टीचर मीटिंग थी, आप आए नहीं?" मैंने बहुत ही विनम्रता से पूछा।
"अरे सर, हमारे पास इन फालतू कामों के लिए वक्त नहीं है," वे रुखेपन से बोले। "रोटी कमाने से फुर्सत मिले तब तो स्कूल आएँ। आप लोग भारी फीस लेते हैं, पढ़ाना आपका काम है। हमें बार-बार फोन मत किया कीजिए। वह पढ़ता है या नहीं, यह देखना आपकी जिम्मेदारी है।"
फोन कट गया। कमरे में एक गहरा सन्नाटा छा गया।
एक पल के लिए मुझे गुस्सा आया, फिर बेहद निराशा हुई। जब माता-पिता ही बच्चे की जिम्मेदारी से हाथ खींच लें या शिक्षक की बात समझने से इनकार कर दें, तो एक शिक्षक का असहाय महसूस करना स्वाभाविक है। मैं चाहता तो इस बात को वहीं छोड़कर अपना काम खत्म मान सकता था, लेकिन मुझे विकास का वह रोता हुआ चेहरा याद आ गया।
अगले दिन जब विकास स्कूल आया, तो वह डरा हुआ था कि उसके पिता के न आने पर मैं उसे डांटूँगा।
मैंने उसे पास बुलाया, उसके सर पर हाथ रखा और कहा, "विकास, कोई बात नहीं अगर तुम्हारे पापा नहीं आ पाए। लेकिन याद रखना, तुम्हारी पढ़ाई तुम्हारी अपनी यात्रा है। मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूँ।"
विकास की आँखों में उम्मीद की एक नई चमक आ गई। मुझे समझ आ गया कि जब परिवार का सहयोग न मिले, तब शिक्षक को बच्चे के लिए और भी बड़ा सहारा बनना पड़ता है। अगर परिस्थितियाँ कठिन हों, तो शिक्षक को पीछे हटने के बजाय बच्चे का हाथ और कसकर पकड़ लेना चाहिए।
आज की शिक्षक-सीख:
जब अभिभावक सहयोग न करें या आपकी बात न समझें, तब हताश होने के बजाय विद्यार्थी के अकेलेपन को समझें; ऐसे समय में शिक्षक का संबल ही बच्चे का सबसे बड़ा आधार बनता है।
07/09/2026
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