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पत्रकार की पिटाई खबर है, लेकिन भ्रष्टाचार उसकी जड़ है
दिल्ली में 4PM News Network की पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान के साथ मारपीट का मामला राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। ऐसा होना भी चाहिए। यदि कोई पत्रकार सवाल पूछने की वजह से प्रताड़ित किया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस सिद्धांत पर हमला है जो सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार देता है। पत्रकारिता का मूल काम ही सवाल पूछना है। इसलिए किसी पत्रकार के साथ हिंसा या दुर्व्यवहार की निंदा जितनी की जाए, कम है।
लेकिन इस घटना के शोर के बीच एक और सवाल है, जो शायद अधिक असहज है और इसलिए कम पूछा जाता है।
आखिर हम केवल तब क्यों जागते हैं जब कोई पत्रकार पिटता है, कोई वीडियो वायरल होता है, कोई बड़ी त्रासदी सामने आती है या किसी नागरिक के साथ खुला अन्याय हो जाता है? उससे पहले उन परिस्थितियों पर बहस क्यों नहीं होती जो ऐसी घटनाओं को संभव बनाती हैं?
आज देश में शायद ही कोई ऐसा नागरिक होगा जिसे यह न पता हो कि भ्रष्टाचार क्या है, कैसे होता है और किन स्तरों पर होता है। रिश्वत लेकर फाइल आगे बढ़ाना, पैसे लेकर लाइसेंस जारी करना, अवैध निर्माण को संरक्षण देना, नियमों को धन के बदले मोड़ देना, प्रभावशाली लोगों के लिए कानून को कमजोर और आम आदमी के लिए कठोर बना देना—यह सब किसी रहस्य का हिस्सा नहीं है। यह सब खुली आंखों के सामने होता है। फिर भी समाज का बड़ा हिस्सा इसे व्यवस्था का सामान्य हिस्सा मानकर स्वीकार कर चुका है।
यही स्वीकार्यता सबसे खतरनाक है।
भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं है। यह सत्ता के समानांतर एक ऐसी अदृश्य व्यवस्था है जो नियमों से अधिक प्रभावशाली हो जाती है। एक रिश्वत केवल किसी एक अधिकारी की जेब नहीं भरती; वह अक्सर संरक्षण, राजनीतिक संपर्क, प्रशासनिक नेटवर्क और जवाबदेही से बच निकलने की संस्कृति को भी मजबूत करती है। धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी मजबूत हो जाती है कि कानून का भय कम और सत्ता का अहंकार अधिक दिखाई देने लगता है।
यही कारण है कि जब किसी नागरिक, व्यापारी, किसान, मजदूर या पत्रकार के साथ अन्याय होता है, तो हमें केवल अंतिम घटना दिखाई देती है। हम पेड़ देखते हैं, जंगल नहीं।
हम उस पुलिसकर्मी, अधिकारी या कर्मचारी को देखते हैं जिसने कथित रूप से गलत व्यवहार किया, लेकिन उस तंत्र को नहीं देखते जिसने वर्षों तक जवाबदेही से मुक्त होकर उसे यह विश्वास दिलाया कि वह बच जाएगा। हम उस दिन पर चर्चा करते हैं जब अत्याचार हुआ, लेकिन उन हजारों दिनों पर नहीं जब छोटी-छोटी अनियमितताओं को सामान्य मानकर छोड़ दिया गया।
दरअसल किसी भी लोकतंत्र में दमन अचानक पैदा नहीं होता। वह धीरे-धीरे विकसित होता है। उसकी शुरुआत किसी पत्रकार की पिटाई से नहीं होती। उसकी शुरुआत तब होती है जब रिश्वत को “चलता है” कहा जाता है। जब फर्जीवाड़े को “सब करते हैं” कहकर टाल दिया जाता है। जब नियमों की हत्या को “व्यवस्था ऐसे ही चलती है” कहकर उचित ठहराया जाता है। जब जनता शिकायत करना छोड़ देती है और केवल सहना सीख जाती है।
एक ईमानदार अधिकारी और एक भ्रष्ट अधिकारी के बीच सबसे बड़ा अंतर केवल नैतिकता का नहीं, बल्कि निर्भरता का होता है। ईमानदार अधिकारी को अपने पद को बचाने के लिए किसी भ्रष्ट नेटवर्क की जरूरत नहीं होती। उसे किसी अवैध कमाई की रक्षा नहीं करनी होती। उसे किसी संरक्षणदाता को खुश नहीं रखना होता। लेकिन जब भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है, तब पद, पोस्टिंग, प्रभाव और संरक्षण एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। ऐसे माहौल में अधिकार सेवा का माध्यम नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन सकता है।
यही वजह है कि भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक अपराध समझना भूल होगी। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के चरित्र को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है। यह नागरिक और राज्य के बीच भरोसे को कमजोर करता है। यह कानून को समानता से लागू होने से रोकता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात, यह उन लोगों को साहस देता है जो मान बैठते हैं कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी।
आज यदि पत्रकारों के साथ मारपीट का मामला देशभर में चर्चा का विषय है, तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन यदि यह चर्चा केवल घटना तक सीमित रह जाए और उस व्यवस्था पर सवाल न उठाए जो जवाबदेही से बच निकलने की संस्कृति पैदा करती है, तो हम फिर वही गलती दोहराएंगे जो वर्षों से करते आए हैं।
समस्या केवल यह नहीं कि कोई पत्रकार पिटा। समस्या यह भी है कि हम उस मिट्टी को पहचानने से इंकार करते हैं जिसमें ऐसे घटनाक्रम पनपते हैं।
समाज अक्सर भ्रष्टाचार को एक मामूली बुराई मानता है और दमन को बड़ी बुराई। जबकि वास्तविकता यह है कि दमन अक्सर भ्रष्टाचार की ही परिपक्व अवस्था होता है। जब नियम बिकने लगते हैं, तब अधिकार कमजोर पड़ने लगते हैं। जब जवाबदेही समाप्त होती है, तब मनमानी शुरू होती है। और जब मनमानी सामान्य हो जाती है, तब अत्याचार केवल समय का प्रश्न रह जाता है।
इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा, नागरिक अधिकारों की रक्षा और लोकतंत्र की मजबूती की लड़ाई केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं है। यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ाई है। क्योंकि जो व्यवस्था रोजमर्रा की बेईमानी को सहन करती है, वही एक दिन बड़े अन्याय को भी जन्म देती है।
सवाल केवल यह नहीं है कि शाहीन खान और नफीसा खान के साथ क्या हुआ।
सवाल यह भी है कि हम उस व्यवस्था के बारे में कब बात करेंगे जो ऐसे आरोपों को संभव बनाती है।
और शायद उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अभी भी भ्रष्टाचार को एक मामूली समस्या मानते रहेंगे, या उसे लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने वाली सबसे बड़ी बीमारी के रूप में पहचानेंगे?
क्योंकि इतिहास बताता है—लोकतंत्र की हत्या हमेशा किसी बड़े धमाके से नहीं होती, कई बार वह छोटे-छोटे समझौतों, सामान्यीकृत भ्रष्टाचार और समाज की लंबी खामोशी से होती है। शेष फिर।
C M Jain | सी एम जैन
हमने ईमानदारी को सामान्य कर्तव्य मानना ही छोड़ दिया!
किसी लोकतंत्र की असली हालत जाननी हो तो संसद, सचिवालय या संविधान की किताब देखने की आवश्यकता नहीं है। किसी सरकारी कार्यालय के बाहर खड़े नागरिकों को देख लीजिए। वहाँ अक्सर एक विचित्र दृश्य दिखाई देता है—जिस व्यवस्था का मालिक नागरिक होना चाहिए, वही नागरिक किसी अधिकारी की एक झलक, एक हस्ताक्षर या एक स्वीकृति के लिए घंटों प्रतीक्षा कर रहा होता है। वह अपनी समस्या बताता है, निवेदन करता है, कभी सिफारिश खोजता है, कभी परिचय। और धीरे-धीरे यह सब इतना सामान्य लगने लगता है कि हम सबसे बड़ा प्रश्न पूछना ही छोड़ देते हैं—लोकतंत्र में आखिर मालिक कौन है?
हमारी सबसे बड़ी समस्या शायद केवल भ्रष्टाचार नहीं है। उससे भी बड़ी समस्या वह मानसिक परिवर्तन है जो वर्षों में चुपचाप हमारे भीतर बैठ गया। हमने उन लोगों को, जो जनता के संसाधनों से चलने वाली व्यवस्था के कर्मचारी हैं, “सर”, “साहब”, “हुजूर” और व्यवहार में कई बार “मालिक” का दर्जा देना शुरू कर दिया। भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती; वह सत्ता-संबंधों को भी आकार देती है। संबोधन बदलते हैं, तो सोच बदलती है। सोच बदलती है, तो समाज बदलता है। और जब समाज यह भूलने लगे कि सत्ता का स्रोत कहाँ है, तब लोकतंत्र की सबसे गहरी दरार दिखाई देने लगती है।
यहाँ स्पष्ट कर देना चाहिए कि सम्मान और अधीनता एक ही चीज नहीं हैं। किसी अधिकारी, कर्मचारी या सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति का सम्मान करना सभ्यता है। लेकिन अपने अधिकारों को भूल जाना, अपने प्रश्नों को दबा देना और स्वयं को उससे नीचे समझना लोकतांत्रिक चेतना का क्षरण है। सरकारी कर्मचारी छोटा हो या बड़ा, ईमानदार हो या भ्रष्ट, उसका वेतन जनता के धन से आता है। उसका पद सार्वजनिक है, निजी नहीं। उसका अधिकार नागरिकों पर शासन करने के लिए नहीं, नागरिकों की सेवा के लिए है। लोकतंत्र की मूल अवधारणा यही है, लेकिन व्यवहार में हम कई बार इसके ठीक उलट खड़े दिखाई देते हैं।
यहीं एक और गहरा विरोधाभास सामने आता है। जब कोई सरकारी अधिकारी बिना रिश्वत लिए, समय पर और नियमों के अनुसार अपना काम कर देता है, तो हम उसे “ईमानदार अधिकारी” कहकर सम्मानित करते हैं। फूल पहनाते हैं, मंचों पर बुलाते हैं, प्रशंसा करते हैं। सम्मान में कोई बुराई नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि जिस काम के लिए किसी व्यक्ति को वेतन दिया जा रहा है, वह असाधारण उपलब्धि कब बन गया? “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” जैसी कहावतें हम सुस्त व्यवस्था पर तो लागू करते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह पूछते हैं कि ईमानदारी को पुरस्कार की श्रेणी में क्यों पहुँचा दिया गया।
यह प्रश्न किसी ईमानदार अधिकारी के खिलाफ नहीं है। बल्कि यह उस सामाजिक स्थिति पर प्रश्न है जहाँ भ्रष्टाचार इतना सामान्य हो गया है कि ईमानदारी असामान्य लगने लगी है। यदि कोई शिक्षक पढ़ाता है, डॉक्टर इलाज करता है या न्यायाधीश कानून के अनुसार निर्णय देता है, तो हम उसे उसके कर्तव्य का निर्वहन मानते हैं। फिर सरकारी कर्मचारी द्वारा अपना दायित्व निभाना किसी चमत्कार की तरह क्यों प्रस्तुत होने लगता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने व्यवस्था से अपेक्षाएँ इतनी कम कर दी हैं कि जो सामान्य होना चाहिए, वही असाधारण दिखाई देने लगा है?
विडंबना यहीं समाप्त नहीं होती। अनेक सामाजिक कार्यक्रमों में किसी सरकारी अधिकारी को “विशेष अतिथि” बनाकर बुलाया जाता है। उसके मंच पर आने को प्रतिष्ठा माना जाता है। उसके आगमन पर गर्व व्यक्त किया जाता है। प्रश्न यह नहीं कि किसी अधिकारी को आमंत्रित करना गलत है। प्रश्न यह है कि उस गर्व का आधार क्या है? क्या हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि एक सार्वजनिक कर्मचारी हमारे कार्यक्रम में आया, या इस बात पर कि लोकतंत्र ने ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें कोई भी सार्वजनिक अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह है? यदि लोकतंत्र की चेतना मजबूत होती, तो सम्मान व्यक्ति के कार्य का होता, पद की शक्ति का नहीं।
यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। संविधान जनता को सर्वोच्च मानता है, लेकिन व्यवहार में कई बार कुर्सी सर्वोच्च दिखाई देती है। नागरिक को अपनी समस्या सिद्ध करनी पड़ती है, अपने अधिकार का औचित्य बताना पड़ता है, और कई बार उस सेवा के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है जिसके लिए पूरी व्यवस्था बनाई गई थी। यदि मालिक को बार-बार अपनी ही हैसियत साबित करनी पड़े, तो प्रश्न केवल प्रशासन का नहीं, लोकतांत्रिक संस्कृति का हो जाता है।
इस पूरी स्थिति का सबसे खतरनाक प्रभाव अगली पीढ़ी पर पड़ता है। बच्चे लोकतंत्र को किताबों से कम और समाज को देखकर अधिक सीखते हैं। वे देखते हैं कि सरकारी कार्यालय में नागरिक घंटों खड़ा है और अधिकारी की एक नज़र के लिए प्रतीक्षा कर रहा है। वे देखते हैं कि किसी काम के लिए सिफारिश ढूँढ़ी जा रही है। वे देखते हैं कि पद के सामने व्यक्ति झुकता है, लेकिन सिद्धांत के सामने कम खड़ा होता है। धीरे-धीरे उनके मन में एक खतरनाक निष्कर्ष बनता है—सरकारी कुर्सी जनता से बड़ी है।
यदि यही मानसिकता आगे बढ़ती रही, तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट भ्रष्टाचार नहीं होगा, बल्कि नागरिक चेतना का क्षरण होगा। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसके कानूनों में नहीं, बल्कि उन नागरिकों में होती है जो अपने अधिकार और अपनी भूमिका समझते हैं। जिस दिन नागरिक स्वयं को प्रजा समझने लगे, उसी दिन लोकतंत्र का ढाँचा भले खड़ा रहे, उसकी आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
इसलिए परिवर्तन की शुरुआत सरकारी दफ्तरों से पहले हमारे भीतर होनी चाहिए। हमें यह याद रखना होगा कि सम्मान और प्रश्न एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हम किसी अधिकारी का सम्मान कर सकते हैं और उससे जवाबदेही भी मांग सकते हैं। हम किसी अच्छे कर्मचारी की सराहना कर सकते हैं और फिर भी यह मान सकते हैं कि ईमानदारी कोई अतिरिक्त उपकार नहीं, बल्कि उसका मूल कर्तव्य है। हमें “साहब” कहने से पहले यह याद रखना होगा कि सामने बैठा व्यक्ति सार्वजनिक पद पर है, लोकतंत्र का स्वामी नहीं।
कहावत है, “जैसी करनी वैसी भरनी।” लोकतंत्र में इसका अर्थ केवल शासन पर लागू नहीं होता, समाज पर भी लागू होता है। यदि हम अपने बच्चों को यह दिखाएंगे कि नागरिक का स्थान हमेशा कुर्सी से नीचे है, तो वे भी यही सीखेंगे। लेकिन यदि हम उन्हें यह सिखाएंगे कि सार्वजनिक पद सम्माननीय है, पर जनता से बड़ा नहीं, तो शायद वे लोकतंत्र को केवल मतदान की व्यवस्था नहीं, नागरिक गरिमा की व्यवस्था समझेंगे।
आखिरकार, यह बहस अधिकारियों की नहीं, नागरिकों की है। प्रश्न यह नहीं कि कुर्सी पर कौन बैठा है। प्रश्न यह है कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति स्वयं को क्या समझता है। क्योंकि जिस दिन समाज इस प्रश्न का गलत उत्तर देने लगे, उसी दिन लोकतंत्र कागज़ पर तो जीवित रह सकता है, लेकिन नागरिकों के मन में नहीं। और यदि हमने आज यह स्पष्ट नहीं किया कि मालिक कौन है, तो कल हमारी अगली पीढ़ी भी उसी प्रश्न का गलत उत्तर देगी—और शायद उसे यह एहसास भी नहीं होगा कि गलती कहाँ हुई।
( आपका स्नेह, विश्वास, सहयोग और रचनात्मक आलोचना हमारे लिए अमूल्य है। अपनी प्रतिक्रिया अवश्य साझा करें, क्योंकि संवाद ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। )
C M Jain | सी एम जैन
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पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता की कीमत समझने वाले समाज की कमी है। हम पत्रकार से स्वतंत्र रहने, सत्ता से सवाल पूछने और सच बोलने की उम्मीद करते हैं; लेकिन जब उसकी स्वतंत्रता की कीमत चुकाने की बारी आती है, तो सरकार, विपक्ष और समाज—तीनों पीछे हट जाते हैं।
सरकार को अपनी बात जनता तक पहुँचाने के लिए पैसा देना पड़े, यह समझ में आता है। लेकिन जनता की ओर से सरकार से सवाल पूछने वाले पत्रकार को स्वतंत्र रहने के लिए पैसा कौन देगा—यह सवाल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने कहीं बड़ा है।
बिहार सरकार ने सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों पर वीडियो बनाने वाले एम्पैनल्ड सोशल मीडिया क्रिएटर्स के लिए व्यूज के आधार पर भुगतान की व्यवस्था को मंजूरी दी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार पात्र वीडियो को हर एक लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये तक और एक वीडियो पर अधिकतम एक लाख रुपये तक का भुगतान मिल सकता है; व्यूज की गणना और सत्यापन की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। सरकार का तर्क सीधा है—डिजिटल माध्यमों की पहुंच का इस्तेमाल करके सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जाए।
इसमें पहली नजर में गलत क्या है? सरकार जनता को अपनी योजनाओं की जानकारी देना चाहती है, डिजिटल क्रिएटर उसे लोगों तक पहुंचाएगा और उसके काम के बदले भुगतान मिलेगा। बाजार की भाषा में यह बिल्कुल सामान्य व्यवस्था है। लेकिन लोकतंत्र बाजार से थोड़ा अलग होता है। यहां सवाल केवल यह नहीं होता कि किसे कितना पैसा मिला; सवाल यह भी होता है कि पैसा मिलने से उसकी आवाज किस दिशा में मुड़ सकती है।
एक लाख रुपये का असली मूल्य उसके नोटों में नहीं, उसके प्रभाव में है।
किसी पत्रकार से यह कहने की जरूरत नहीं कि सरकार की आलोचना मत करो। उसे बस इतना कह दीजिए कि सरकार की योजनाओं पर ऐसा वीडियो बनाओ जिससे व्यूज आएं और हर एक लाख व्यूज पर दस हजार रुपये मिलेंगे। फिर देखिए, सेंसर की जरूरत कितनी बचती है। आदमी के भीतर बैठा छोटा-सा आर्थिक गणित कई बार बाहर बैठे बड़े सेंसर से ज्यादा प्रभावी होता है।
जहां सवाल पूछने से कुछ नहीं मिलता और सरकार की उपलब्धि बताने से पैसा मिलता है, वहां धीरे-धीरे सवाल कम नहीं होते; सवाल पूछने की कीमत बढ़ जाती है।
यही इस व्यवस्था का सबसे गंभीर पक्ष है।
सरकार यह नहीं कह रही कि केवल प्रशंसा करो। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि इस योजना से हर क्रिएटर बिक जाएगा। ऐसा निष्कर्ष तथ्य से आगे निकल जाना होगा। कोई पत्रकार सरकारी योजना की जानकारी लेते हुए उसकी कमियां भी बता सकता है। कोई क्रिएटर पैसा लेकर भी स्वतंत्र रह सकता है। भुगतान अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है।
लेकिन लोकतंत्र केवल वास्तविक सेंसरशिप से नहीं बचता। वह हितों के टकराव से भी बचाया जाता है। आज सरकारी योजना का प्रचार करने पर पैसा है। कल सरकार की किसी नीति की आलोचना करने पर क्या होगा? क्या उस आलोचना के लिए भी उतना ही संस्थागत समर्थन होगा? क्या कोई पत्रकार सरकार की योजना की जांच करके बताए कि पैसा कहां खर्च हुआ, लाभार्थी तक पहुंचा या नहीं, भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, आंकड़े सही हैं या नहीं—तो उसे भी वही आर्थिक सुरक्षा मिलेगी?
या फिर व्यवस्था का संदेश इतना भर होगा—सरकार के बारे में बोलिए, सरकार की तरफ से बोलिए; बस सरकार के खिलाफ बोलते समय अपनी जेब देख लीजिए।
यहीं से मामला बिहार की एक सोशल मीडिया नीति से निकलकर भारतीय पत्रकारिता की उस पुरानी बीमारी तक पहुंच जाता है, जिसका इलाज आज तक किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं खोजा—स्वतंत्र पत्रकारिता आखिर जिएगी कैसे?
बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की अपनी समस्याएं हैं, लेकिन सबसे कठिन स्थिति उस पत्रकार की है जो छोटे शहर, कस्बे या गांव में कलम-कैमरा लेकर निकलता है। उसके पास न बड़ी संस्था का कानूनी विभाग है, न सुरक्षा तंत्र, न स्थायी वेतन, न आर्थिक संकट के समय कोई सुरक्षा कवच। वह भ्रष्टाचार पर खबर करता है तो सामने केवल अधिकारी या नेता नहीं होता; कई बार स्थानीय दबंग, कारोबारी, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक दबाव भी होता है। CPJ की पुरानी जांचों ने भी दर्ज किया है कि भारत में भ्रष्टाचार और राजनीति पर रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों में छोटे शहर और ग्रामीण पत्रकार विशेष जोखिम में रहे हैं।
CPJ के अनुसार, 1992 से अब तक भारत में पत्रकारों की हत्याओं के 94 मामले दर्ज हैं।लेकिन इस संख्या के पीछे 94 परिवार हैं, जिनके घर से कोई एक आदमी निकला था—सवाल पूछने, सच सामने लाने और दूसरों की आवाज बनने। वह लौटकर नहीं आया। उसके बाद उसके परिवार को क्या मिला? कुछ मामलों में न्याय का इंतजार, कुछ में चुप्पी और बहुतों में वह खालीपन, जिसे कोई पुरस्कार, कोई सम्मान और कोई सरकारी बयान कभी भर नहीं सकता। हम पत्रकार से मरते दम तक सच मांगते रहे, लेकिन जब सच के लिए उसकी जान चली गई, तब उसके परिवार के हिस्से में हमारा कर्ज भी नहीं आया।
और यहीं हमारी सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। हम पत्रकार से कहते हैं—सच बोलो। लेकिन यह नहीं पूछते कि सच बोलने के बाद उसका घर कैसे चलेगा। हम कहते हैं—भ्रष्टाचार उजागर करो। लेकिन जब वह उजागर कर देता है तो मुकदमा हो जाए, धमकी मिले, विज्ञापन बंद हो जाए या परिवार पर आर्थिक संकट आए, तब हम उसकी कहानी को अगले दिन की खबर भी नहीं बनने देते।
हम पत्रकार से ईमानदारी की उम्मीद करते हैं, लेकिन ईमानदारी की आर्थिक कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं। फिर जब वही पत्रकार मजबूरी में किसी राजनीतिक दल, कारोबारी, विज्ञापनदाता या सत्ता के दरवाजे पर जाता है तो हम पूछते हैं—तुम बिक गए?
सवाल यह है कि उसे बिकने की मजबूरी किसने पैदा की?
सरकारों ने पत्रकारिता को अक्सर विज्ञापनदाता की नजर से देखा। विपक्ष ने पत्रकारिता को अक्सर अपने संघर्ष के साथी की नजर से देखा। लेकिन दोनों ने एक बुनियादी सवाल से बचने की कोशिश की—पत्रकार को स्वतंत्र रहने की कीमत कौन देगा?
सरकार को अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए बजट मिलता है। राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए संसाधन मिलते हैं। नेताओं के पास संगठन होते हैं। बड़े संस्थानों के पास पूंजी होती है। लेकिन वह पत्रकार जो इन सबके बीच खड़ा होकर पूछता है कि “हिसाब कहां है?” उसके पास अक्सर केवल उसका कैमरा और उसकी हिम्मत होती है। और हिम्मत से घर नहीं चलता।
यहीं विपक्ष भी कटघरे में खड़ा होता है।
सरकार अगर अपने संदेश को डिजिटल दुनिया तक पहुंचाने के लिए आर्थिक मॉडल बना सकती है तो विपक्ष क्यों नहीं? यदि विपक्ष को लगता है कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक है तो उसने कितने छोटे पत्रकारों के लिए कानूनी सहायता कोष बनाया? कितने पत्रकारों के परिवारों के लिए आपातकालीन सहायता की व्यवस्था की? कितने पत्रकारों को उपकरण, प्रशिक्षण या स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया?
सत्ता से लड़ते समय पत्रकार विपक्ष का साथी है, लेकिन संकट में पड़ते ही वह अचानक “व्यक्तिगत मामला” क्यों हो जाता है?
राजनीतिक दलों को पत्रकार का कैमरा चाहिए, पत्रकार की जिंदगी नहीं—तो फिर स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा का दावा किसलिए?
यही कारण है कि बिहार की नीति को केवल “सरकार क्रिएटरों को पैसा दे रही है” कहकर छोड़ देना आसान है, लेकिन पर्याप्त नहीं। असली प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में सूचना का आर्थिक ढांचा किस दिशा में जा रहा है।
अगर सरकार अपनी उपलब्धियां बताने के लिए डिजिटल आवाजों को प्रोत्साहित करती है, तो उसी अनुपात में स्वतंत्र तथ्य-जांच, खोजी रिपोर्टिंग और जनहित पत्रकारिता के लिए भी पारदर्शी, गैर-पक्षपाती और संपादकीय स्वतंत्रता सुरक्षित रखने वाली व्यवस्था क्यों नहीं बन सकती?
सरकारी योजना का प्रचार करने वाले को पैसा देना आसान है। सरकार की उसी योजना की जांच करने वाले को स्वतंत्र रखने की व्यवस्था करना लोकतंत्र है।
फर्क यहीं है।
पहले राजा दरबारियों को पालता था और दरबारी राजा की प्रशंसा करते थे। आज लोकतंत्र में वही दृश्य हूबहू लौट आए, ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगा। लेकिन खतरा किसी पुराने दृश्य की वापसी में नहीं, उसके आधुनिक रूप में छिपा है। आज दरबारी शायद पगड़ी पहनकर दरबार में नहीं बैठता। वह कैमरे के सामने बैठता है, हाथ में मोबाइल रखता है और कहता है—“दोस्तों, आज हम आपको सरकार की इस शानदार योजना के बारे में बताते हैं।”
समस्या यह नहीं कि वह योजना बताए। समस्या तब शुरू होगी जब वह यह भूल जाए कि योजना जनता के पैसे से बनी है और सरकार जनता की है; इसलिए उसकी भूमिका सरकार की प्रशंसा करना नहीं, जनता को सच बताना है। और सच केवल वह नहीं जो सरकार बताना चाहती है। सच वह भी है जो सरकार छिपाना चाहती है। सच वह भी है जो सरकार को असहज करता है। सच वह भी है जिसमें सरकार की उपलब्धि है। और सच वह भी है जिसमें सरकार की विफलता है।
सरकार को केवल अपने अनुकूल सच पसंद आने लगे तो पत्रकारिता सूचना विभाग बन जाती है। और पत्रकार केवल वही दिखाने लगे जिससे उसका भुगतान सुरक्षित रहे तो जनता धीरे-धीरे दर्शक नहीं, ग्राहक बन जाती है।
लेकिन इस कहानी का सबसे दुखद हिस्सा सरकार नहीं है। सबसे दुखद हिस्सा हम हैं।
हम एक ईमानदार पत्रकार को देखकर कहते हैं—“बहुत अच्छा काम कर रहे हो।” लेकिन जब उसे कैमरा खरीदना हो, कानूनी लड़ाई लड़नी हो, घर चलाना हो या उसके बच्चे की फीस भरनी हो, तब हमारी ईमानदारी जेब में हाथ डालते ही गायब हो जाती है।
हम चाहते हैं कि कोई हमारे लिए सच बोले, लेकिन उस सच की कीमत कोई और चुकाए। हम चाहते हैं कि कोई भ्रष्टाचार उजागर करे, लेकिन विज्ञापनदाता नाराज न हो। हम चाहते हैं कि कोई सत्ता से सवाल करे, लेकिन मुकदमा उसके ऊपर आए तो हम चुप रहें। हम चाहते हैं कि पत्रकार बिके नहीं, लेकिन उसे जिंदा रहने के लिए क्या मिले—इस पर बात नहीं करना चाहते।
शायद इसलिए हमारी सबसे बड़ी समस्या पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता की कीमत समझने वाले समाज की कमी है।
और यही वह जगह है जहां सरकार और विपक्ष दोनों से बड़ा सवाल जनता के सामने खड़ा होता है। अगर सरकार अपनी बात कहने के लिए पैसा खर्च कर सकती है, तो जनता को अपनी बात कहने वाले पत्रकार के लिए क्या करना चाहिए?
अगर विपक्ष सत्ता की आलोचना करने वाले पत्रकार को अपना स्वाभाविक साथी मानता है, तो उसे संकट में पड़े पत्रकार के साथ खड़ा होने की कीमत क्यों नहीं चुकानी चाहिए? और अगर जनता चाहती है कि उसके पास कल भी कोई ऐसा व्यक्ति हो जो बिना डरे पूछ सके—“सरकार, हिसाब दो”—तो क्या उसे आज उस व्यक्ति को केवल लाइक और शेयर देकर छोड़ देना चाहिए?
क्योंकि पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल प्रेस क्लबों, संसद के भाषणों और संविधान की किताबों में सुरक्षित नहीं रहती। वह उस छोटे से कैमरे के पीछे भी रहती है, जिसे लेकर कोई पत्रकार अकेला सड़क पर निकलता है। वह उस रिपोर्ट में रहती है जिसे छापने के बाद विज्ञापन बंद हो सकता है। वह उस सवाल में रहती है जिसके बाद फोन आ सकता है। वह उस परिवार में रहती है जो जानता है कि उसका आदमी आज फिर किसी ताकतवर व्यक्ति के खिलाफ खबर करने गया है।
और कभी-कभी वह उस खाली कुर्सी में भी रह जाती है, जहां बैठने वाला पत्रकार वापस नहीं लौटता।
इसलिए असली सवाल यह नहीं कि बिहार सरकार एक लाख रुपये किसे दे रही है। असली सवाल यह है कि जिस दिन सरकार की ओर से बोलने वाले हर डिजिटल व्यक्ति के पास संसाधन होंगे और जनता की ओर से सवाल पूछने वाला पत्रकार अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा होगा, उस दिन लोकतंत्र में आवाज किसकी बचेगी?
उस दिन सेंसरशिप की जरूरत नहीं होगी। क्योंकि आवाजें खुद अपने भीतर चुप हो चुकी होंगी।
और शायद लोकतंत्र की सबसे खतरनाक हार वही होगी—जब सरकार को चुप कराने के लिए किसी पत्रकार का मुंह बंद करने की जरूरत ही न पड़े; उसकी मजबूरी ही उसकी आवाज बन जाए।
C M Jain | सी एम जैन
#पत्रकारिता #जनहित #लोकतंत्र #जवाबदेही
आंदोलन कौन कर रहा है—जनता, विपक्ष या राजनीति?
दिल्ली के जंतर-मंतर से झारखंड की सड़कों तक बदलते किरदारों के बीच सबसे बड़ा सवाल—आंदोलनकारी की आवाज़ कहाँ है?
राजनीति की सबसे सुविधाजनक बात यही है कि आंदोलन का श्रेय कोई नहीं लेता, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ लेने में कोई पीछे नहीं रहता। सत्ता में बैठे लोग कहते हैं—आंदोलन विपक्ष की साजिश है। विपक्ष कहता है—यह जनता की आवाज़ है। सत्ता बदलती है तो बयान बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं और कई बार उसी आंदोलन को देखने का पूरा चश्मा ही बदल जाता है। लेकिन इस पूरी राजनीति के बीच सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति अक्सर वही रह जाता है जिसकी आवाज़ से आंदोलन शुरू हुआ था—आंदोलनकारी। सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र क्यों उतरे, झारखंड में छात्र क्यों सड़क पर आए या किस राजनीतिक दल ने किस आंदोलन का समर्थन किया। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—आंदोलन जनता की आवाज़ हैं या राजनीति के लिए उपलब्ध सबसे प्रभावशाली हथियार?
इस सवाल का उत्तर खोजने से पहले एक बात स्वीकार करनी होगी कि किसी आंदोलन में शामिल छात्रों की समस्या को केवल इसलिए झूठा नहीं कहा जा सकता क्योंकि बाद में कोई राजनीतिक दल उनके साथ खड़ा दिखाई देता है। छात्र की समस्या वास्तविक हो सकती है, उसकी पीड़ा वास्तविक हो सकती है और उसकी मांग भी पूरी तरह जायज हो सकती है। लेकिन समस्या के वास्तविक होने का अर्थ यह नहीं कि उसके आसपास की राजनीति भी अनुपस्थित है। आज की राजनीति में यह मान लेना भी भोलेपन से कम नहीं कि हर बड़ा आंदोलन केवल स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश होता है। जनता के भीतर असंतोष पैदा हो सकता है, लेकिन उस असंतोष को कितनी हवा मिलेगी, कौन उसे मंच देगा, कौन उसे कैमरे तक पहुँचाएगा, कौन उसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाएगा और कौन उससे राजनीतिक लाभ उठाएगा—ये अलग-अलग सवाल हैं। आंदोलन की ईमानदारी और उसके राजनीतिक इस्तेमाल की संभावना एक ही चीज नहीं हैं।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन इसी जटिलता को सामने लाता है। आंदोलन में छात्र नेता नेहा बोरा और उनके साथियों की सक्रियता से लेकर बाद में आंदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आने तक एक ऐसा घटनाक्रम बना जिसमें छात्र मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। Sonam Wangchuk का जंतर-मंतर पहुँचना और अनशन से जुड़ना इस आंदोलन को एक अलग राष्ट्रीय दृश्यता देने वाला घटनाक्रम बना। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 28 जून 2026 से शुरू हुआ यह आंदोलन कई दिनों तक चला और शिक्षा तथा परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया। बाद में आंदोलन में राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी और समर्थन भी दिखाई दिया। Rahul Gandhi ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इसे छात्रों की जीत बताया और कहा कि शिक्षा व्यवस्था देश की पहचान रही है।
यहीं से राजनीति का दूसरा चेहरा दिखाई देता है। जब आंदोलन भाजपा सरकार के सामने खड़ा था, तब विपक्ष उसके साथ दिखाई दिया। भाजपा की ओर से आंदोलन के पीछे राजनीतिक भूमिका होने के आरोप लगाए गए। विपक्ष ने ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं किया। स्वाभाविक भी है—राजनीति में कोई दल खुले मंच से यह क्यों स्वीकार करेगा कि किसी आंदोलन को उसने राजनीतिक रूप से हवा दी? लेकिन यही तर्क दूसरी दिशा में भी लागू होता है। यदि दिल्ली में विपक्ष के किसी राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि विपक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया, तो झारखंड में भाजपा की भूमिका की संभावना को भी केवल सरकार के आरोप के आधार पर सच नहीं मान लिया जा सकता। आरोप दोनों तरफ हैं; प्रमाण ही वह चीज है जो आरोप और सत्य के बीच अंतर करती है।
फिर झारखंड सामने आया और कहानी का राजनीतिक कोण लगभग उलट गया। यहाँ हेमंत सोरेन की सरकार है, कांग्रेस उसके साथ है और भाजपा विपक्ष में है। झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। छात्रों और सरकार के बीच बातचीत भी हुई, लेकिन छात्र प्रतिनिधियों ने कहा कि ठोस समाधान होने तक आंदोलन जारी रहेगा। दूसरी ओर भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने सरकार और प्रशासन पर आंदोलनकारियों को दबाने का आरोप लगाया, जबकि प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भाजपा पर छात्रों को राजनीतिक लाभ के लिए गुमराह करने और आंदोलन को राजनीतिक उद्देश्य से भड़काने का आरोप लगाया।
यानी दिल्ली में समीकरण था—भाजपा सत्ता में, विपक्ष आंदोलन के साथ। झारखंड में समीकरण है—हेमंत सोरेन की सरकार सत्ता में, भाजपा आंदोलन के साथ। किरदार बदल गए, राजनीतिक बयान बदल गए और आंदोलन को देखने की भाषा भी बदल गई। तब सवाल उठना स्वाभाविक है—आंदोलन के सिद्धांत सत्ता बदलते ही कैसे बदल जाते हैं?
यदि दिल्ली में आंदोलनकारी पर कार्रवाई लोकतंत्र पर हमला थी, तो झारखंड में वैसी ही कार्रवाई कानून-व्यवस्था कैसे बन सकती है? यदि झारखंड में छात्र अपनी मांग के लिए सड़क पर उतरकर लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो दिल्ली में छात्रों की मांग को राजनीतिक साजिश कहने की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि दोनों जगह छात्र वास्तव में अपनी समस्याओं के लिए सड़क पर थे, तो फिर राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर इतनी अलग-अलग व्याख्याएँ क्यों हैं? यदि लाठी आंदोलनकारी पर पड़े तो वह दिल्ली में लोकतंत्र की हत्या है और झारखंड में कानून-व्यवस्था—तो समस्या लाठी में है या सत्ता की कुर्सी में?
यही वह प्रश्न है जो किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं जाता। यह उस राजनीतिक दोहरेपन के खिलाफ जाता है जिसमें सत्ता में रहते हुए आंदोलन समस्या दिखाई देता है और विपक्ष में रहते हुए वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज़ बन जाता है। सत्ता आंदोलन को विपक्ष की साजिश कहकर कमजोर करना चाहती है; विपक्ष उसी आंदोलन को जनता की आवाज़ बताकर सत्ता पर हमला करना चाहता है। लेकिन आंदोलनकारी की मूल समस्या दोनों राजनीतिक व्याख्याओं के बीच कहीं दब जाती है।
और यहीं सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है—आंदोलन जनता का हो सकता है, दर्द जनता का हो सकता है, मांग जनता की हो सकती है; लेकिन आंदोलन की दिशा और उसकी राजनीतिक कीमत हमेशा जनता तय करे, यह जरूरी नहीं।
क्या इसका अर्थ यह है कि दिल्ली के पीछे विपक्ष था या झारखंड के पीछे भाजपा है? नहीं। ऐसा निष्कर्ष बिना प्रमाण के पत्रकारिता नहीं होगा। लेकिन इन सवालों को पूछना भी बंद कर देना निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं होगी। राजनीति अपने हाथ के निशान छोड़कर आंदोलन नहीं करती। कोई राजनीतिक दल आंदोलन स्थल पर जाकर यह घोषणा नहीं करता कि “यह आंदोलन हमने करवाया है।” इसलिए पत्रकार का काम किसी अदृश्य हाथ की कहानी गढ़ना नहीं, बल्कि घटनाओं का क्रम देखना, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को देखना, हितों को देखना और सबसे महत्वपूर्ण—किसे लाभ हुआ, यह पूछना है।
क्योंकि पैटर्न प्रमाण नहीं होता, लेकिन पैटर्न को देखकर सवाल पूछना भी अपराध नहीं है। आरोप कहना अलग बात है, संभावना पर सवाल उठाना अलग। पत्रकारिता का काम अदालत बनकर फैसला सुनाना नहीं, बल्कि ऐसे सवाल सामने रखना है जिनसे सत्ता और विपक्ष दोनों असहज हों।
इसलिए सवाल होना चाहिए—किसे आंदोलन से राजनीतिक लाभ मिल रहा है? किसे राष्ट्रीय चर्चा मिल रही है? किसे सत्ता पर हमला करने का अवसर मिल रहा है? किसकी राजनीतिक जमीन मजबूत हो रही है? कौन-सा मुद्दा लगातार चर्चा में रहकर दूसरे मुद्दों को पीछे धकेल रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या राजनीतिक दलों का वास्तविक लक्ष्य समस्या का समाधान है, या समस्या से पैदा होने वाली राजनीतिक ऊर्जा अधिक उपयोगी है?
यहीं दिल्ली से झारखंड तक की कहानी 2029 की राजनीति से जुड़ जाती है। 2029 में लोकसभा चुनाव होने हैं। यदि विपक्ष यह मानता है कि 2026 से 2029 तक छात्रों, शिक्षा और दूसरे जनमुद्दों से जुड़े आंदोलनों को लगातार राजनीतिक ऊर्जा देकर भाजपा के खिलाफ एक ऐसा वातावरण तैयार किया जा सकता है जो चुनाव तक सत्ता-विरोधी लहर में बदल जाए, तो यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है। क्योंकि आंदोलन को जिंदा रखना और समस्या को जिंदा रखना एक बात नहीं है।
आज जिस समस्या पर छात्र सड़क पर हैं, जरूरी नहीं कि 2029 में भी वही समस्या उसी तीव्रता से मौजूद रहे। सरकार के पास समय है। वह परीक्षा व्यवस्था में सुधार कर सकती है, भर्ती प्रक्रिया बदल सकती है, शिक्षा क्षेत्र में कोई बड़ी योजना ला सकती है, युवाओं के लिए कोई बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है और आज जिस मुद्दे पर सरकार कठघरे में है, वही मुद्दा कल सरकार की उपलब्धि बन सकता है। राजनीति में सबसे बड़ा जोखिम यह है कि विपक्ष जिस मुद्दे को सरकार की कमजोरी समझकर लगातार कुरेदता रहे, सरकार उसी मुद्दे पर समाधान देकर उसे अपनी उपलब्धि में बदल दे।
इसलिए लंबा आंदोलन हमेशा बड़ा आंदोलन नहीं होता। कई बार आंदोलन जितना लंबा चलता है, उतना ही सामान्य होता जाता है। मीडिया का ध्यान दूसरे मुद्दों पर चला जाता है, जनता की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं और जो मुद्दा कभी राष्ट्रीय संकट दिखाई देता था, वह धीरे-धीरे रोजमर्रा के राजनीतिक शोर में खो जाता है। इसके उलट सरकार यदि उसी अवधि में समाधान का कोई बड़ा कदम उठा देती है तो आंदोलन की राजनीतिक धार अचानक कुंद हो सकती है।
यहाँ विपक्ष के सामने दूसरी समस्या भी है। भारत को केवल शिक्षा के मुद्दे पर वर्षों तक एक सूत्र में बाँधना आसान नहीं है। देश में बेरोजगारी है, महंगाई है, किसान हैं, स्वास्थ्य है, रोजगार है, स्थानीय भ्रष्टाचार है, विस्थापन है और हर वर्ग, हर उम्र तथा हर क्षेत्र की अपनी प्राथमिकताएँ हैं। छात्र समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन पूरा समाज नहीं। इसलिए यह मान लेना कि एक छात्र आंदोलन की निरंतरता अपने आप राष्ट्रीय सत्ता-विरोधी आंदोलन में बदल जाएगी, भारतीय समाज की विविधता को कम करके आंकना हो सकता है।
और एक विडंबना और है। एक मुद्दे को लगातार राष्ट्रीय बहस में बनाए रखने की राजनीतिक कोशिश दूसरे जरूरी मुद्दों को उसी बहस के नीचे दबा सकती है। तब आंदोलन सरकार को कमजोर करने के बजाय अनजाने में सरकार के लिए सुविधाजनक भी हो सकता है—क्योंकि जनता का ध्यान सीमित है और राजनीति में हर लगातार दोहराया गया मुद्दा दूसरे किसी मुद्दे की जगह लेता है।
लेकिन इसका अर्थ आंदोलन को दोष देना नहीं है।
आंदोलन लोकतंत्र की बीमारी नहीं, लोकतंत्र का अलार्म है। जब संस्थाएँ सुनती हैं तो सड़क पर उतरने की जरूरत कम होती है। जब व्यवस्था सुनना बंद करती है तो सड़क बोलती है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि छात्र आंदोलन क्यों कर रहे हैं। असली सवाल यह है—उन्हें अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?
यदि सरकार आंदोलन खत्म करने के लिए समस्या का समाधान करती है तो आंदोलन लोकतंत्र की सफलता है। लेकिन यदि विपक्ष आंदोलन को केवल सरकार गिराने की सीढ़ी और सत्ता आंदोलन को केवल विपक्ष की साजिश बताने का हथियार मानती है, तो दोनों ही स्थिति में आंदोलनकारी की समस्या पीछे चली जाती है।
जनता को न भाजपा का आंदोलन चाहिए, न कांग्रेस का, न JMM का। जनता को अपनी समस्या का समाधान चाहिए। राजनीतिक दलों के लिए आंदोलन सत्ता के समीकरण का हिस्सा हो सकता है, लेकिन आंदोलनकारी के लिए वह उसकी जिंदगी, भविष्य, परीक्षा, नौकरी और सम्मान का सवाल हो सकता है। यही अंतर सबसे महत्वपूर्ण है।
और इसलिए असली सवाल यह नहीं कि दिल्ली के आंदोलन के पीछे कौन था और झारखंड के आंदोलन के पीछे कौन है। असली सवाल यह है—जब जनता सड़क पर उतरती है तो राजनीतिक दल उसके साथ इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि उन्हें जनता की समस्या दिखाई देती है, या इसलिए क्योंकि उन्हें सत्ता में बैठे अपने प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी दिखाई देती है?
इस सवाल का उत्तर शायद किसी राजनीतिक दल के बयान में नहीं मिलेगा। सत्ता अपनी मजबूरी बताएगी, विपक्ष अपनी नैतिकता बताएगा और आंदोलनकारी अपनी मांग। लेकिन इतिहास इन तीनों से आगे जाकर यह पूछेगा कि आखिर उस आंदोलन ने हासिल क्या किया और किसके लिए किया।
क्योंकि राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है—सत्ता में रहते हुए आंदोलन समस्या दिखाई देता है, विपक्ष में रहते हुए वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज़ बन जाता है।
और यदि यही राजनीति का नियम बन गया है, तो फिर आंदोलनकारी नहीं बदल रहे।
सिर्फ उनके पीछे खड़े होने वाले चेहरे बदल रहे हैं।
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा कटाक्ष भी है। आंदोलन का मालिक कोई नहीं बनता, लेकिन उसके राजनीतिक लाभ का उत्तराधिकारी बनने के लिए हर कोई तैयार रहता है। सत्ता कहती है—यह विपक्ष की साजिश है। विपक्ष कहता है—यह जनता की आवाज़ है। और जनता? वह उसी सड़क पर खड़ी रहती है, अपनी वही मांग लेकर, अगली सरकार का इंतजार करती हुई।
इसलिए लोकतंत्र के सामने अंतिम सवाल यह नहीं कि आंदोलन किसने शुरू किया। असली सवाल यह है कि आंदोलन खत्म होने के बाद उसकी मांग किसने पूरी की। क्योंकि आंदोलन की सबसे बड़ी जीत सरकार का झुकना नहीं है। उसकी सबसे बड़ी जीत तब होगी, जब अगली पीढ़ी को उसी मांग के लिए फिर सड़क पर न उतरना पड़े।
और अगर हर पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी की वही मांग लेकर सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो फिर सवाल केवल सरकार से नहीं है। सवाल उस पूरी राजनीति से है जो हर आंदोलन में जनता को देखती कम है और अपना अगला चुनाव ज्यादा देखती है। शेष फिर।
C M Jain | सी एम जैन
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