Meri Radhey

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03/07/2023

. "व्यास–गुरु पूर्णिमा"

महर्षि वेदव्यास जी अमर हैं। महान विभूति वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। महर्षि व्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया, इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है।
भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के कालावतार माने गए हैं। द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा।
व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं।
इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की।
इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
वेदांत दर्शन के रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ने वेदांत दर्शन को छोटे-छोटे सूत्रों में लिखा गया है, लेकिन गंभीर सूत्रों के कारण ही उनका अर्थ समझने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार ही गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव की पूजा के साथ ही महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म के सभी भागों को व्यासजी ने पुराणों में भली-भांति समझाया है। महर्षि व्यास सभी हिन्दुओं के परम पुरुष हैं।
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"जय जय श्री राधे"
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03/07/2023

. चातुर्मास्य माहात्म्य

अध्याय - 02/10

इस अध्याय में पढ़िये–चातुर्मास्य में इष्ट वस्तु के परित्याग तथा नियम-पालन का महत्त्व

ब्रह्माजी कहते हैं- मनुष्य सदा प्रिय वस्तु की इच्छा करता है। अत: जो चातुर्मास्य में भगवान् नारायण की प्रीति के लिये अपने प्रिय भोगों का पूर्ण प्रयत्न पूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षयरूप में प्राप्त होती हैं। जो मनुष्य श्रद्धा पूर्वक प्रिय वस्तु का त्याग करता है, वह अनन्त फल का भागी होता है। धातु पात्रों का त्याग करके पलाश के पत्ते में भोजन करने वाला मनुष्य ब्रह्म भाव को प्राप्त होता है। गृहस्थ मनुष्य ताँबे के पात्र में कदापि भोजन न करे चौमासे में तो ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है। मदार के पत्ते में भोजन करने वाला मनुष्य अनुपम फल को पाता है। चातुर्मास्य में विशेषत: वट के पत्र में भोजन करना चाहिये चातुर्मास्य में भगवान् विष्णु को प्रीति के लिये गृहस्थ-आश्रम का परित्याग करके बाह्य आश्रम का सेवन करने वाले मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता। मिर्च छोड़ने से राजा होता है, रेशमी वस्त्रों के त्याग से अक्षय सुख मिलता है, उड़द और चना छोड़ देने से पुनर्जन्म की प्राप्ति नहीं होती। चातुर्मास्य में विशेषतः काले रंग का वस्त्र त्याग देना चाहिये। नीले वस्त्र को देख लेने से जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यनारायण के दर्शन से होती है। कुसुम्भ रंग के परित्याग करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता। केशर के त्याग से वह राजा का प्रिय होता है। फूलों को छोड़ने से मनुष्य ज्ञानी होता है, शय्या का परित्याग करने से महान् सुख की प्राप्ति होती है। असत्यभाषण के त्याग से मोक्ष का दरवाजा खुल जाता है। चातुर्मास्य में परनिन्दा का विशेषप रूप से परित्याग करे। पर-निन्दा महान् पाप है, पर निन्दा महान् भय है, पर निन्दा महान् दु:ख है और परनिन्दा से बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है। परनिन्दा को सुनने वाला भी पापी होता है। चौमासे में केशों का सँवारना (हजामत) त्याग दे तो वह तीनों तापों से रहित होता है। जो भगवान् के शयन करने पर विशेषत: नख और रोम धारण किये रहता है, उसे प्रतिदिन गंगा स्नान का फल मिलता है। मनुष्य को सब उपायों द्वारा योगियों के ध्येय भगवान् विष्णु को ही प्रसन्न करना चाहिये। समस्त वर्णों एवं श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा भी भगवान् श्रीहरि का ही चिन्तन करना चाहिये। भगवान् विष्णु के नाम से मनुष्य घोर बन्धन से मुक्त हो जाता है। चातुर्मास्य में उनका विशेष रूप से स्मरण करना उचित है।
कर्क की संक्रान्ति के दिन भगवान् विष्णु का भक्ति पूर्वक पूजन करके प्रशस्त एवं शुभ जामुन के फलों से अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्य देते समय इस भाव का चिन्तन करे- 'छ: महीने के भीतर जहाँ कहीं भी मेरी मृत्यु हो जाय तो मानो मैंने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् वासुदेव के चरणों में ही समर्पित कर दिया।' सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् जनार्दन का सेवन करना चाहिये। जो मनुष्य भगवान् विष्णु की कथा, पूजा, ध्यान और नमस्कार सब कुछ उन्हीं श्रीहरि की प्रसन्नता के लिये करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। सत्य स्वरूप सनातन विष्णु वर्णाश्रम-धर्म के स्वरूप हैं। जन्म-मृत्यु आदि के कष्ट का उन्हीं के द्वारा नाश होता है। अत: चातुर्मास्य में विशेष रूप से व्रत द्वारा श्रीहरि को ही ग्रहण करना चाहिये। तपोनिधि भगवान् नारायण के शयन करने पर अपने इस शरीर को तपस्या द्वारा शुद्ध करना चाहिये। भगवान् विष्णु की भक्ति से युक्त जो व्रत है, उसे विष्णुव्रत जानो। धर्म में संलग्न होना तप है। व्रतों में सबसे उत्तम व्रत है - ब्रह्मचर्य का पालन। ब्रह्मचर्य तपस्या का सार है और ब्रह्मचर्य महान् फल देने वाला है। इसलिये समस्त कर्मों में ब्रह्मचर्य को बढ़ावे। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से उग्र तपस्या होती है। ब्रह्मचर्य से बढ़कर धर्म का उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषत: चातुर्मास्य में भगवान् विष्णु के शयन करने पर यह महान् व्रत संसार में अधिक गुणकारक है- ऐसा जानो। जो इस वैष्णवधर्म का पालन करता है, वह कभी कर्मो से लिप्त नहीं होता। भगवान् के शयन करने पर जो यह प्रतिज्ञा करके कि- 'हे भगवन्! मैं आपकी प्रसन्नता के लिये अमुक सत्कर्म करूँगा। उसका पालन करता है, तो उसी को व्रत कहते हैं। वह व्रत अधिक गुणों वाला होता है। अग्निहोत्र, ब्राह्मण भक्ति, धर्मविषयक श्रद्धा, उत्तम बुद्धि, सत्संग, विष्णुपूजा, सत्य भाषण, हृदय में दया, सरलता एवं कोमलता, मधुर वाणी, उत्तम चरित्र में अनुराग वेदपाठ, चोरी का त्याग, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम, लोभ, क्रोध और मोह का अभाव, इन्द्रिय संयम में प्रेम, वैदिक कर्मों का उत्तम ज्ञान तथा श्रीकृष्ण को अपने चित्त का समर्पण- ये नियम जिस पुरुष में स्थिर हैं, वह जीवन्मुक्त कहा गया है। वह पातकों से कभी लिप्त नहीं होता। एक बार का किया हुआ व्रत भी सदैव महान् फल देने वाला होता है। चातुर्मास्य में ब्रह्मचर्य आदि का सेवन अधिक फलद होता है। चातुर्मास्य व्रत का अनुष्ठान सभी वर्ण के लोगों के लिये महान् फलदायक है। व्रत के सेवन में लगे हुए मनुष्यो द्वारा सर्वत्र भगवान् विष्णु का दर्शन होता है। चातुर्मास्य आने पर व्रत का यत्न पूर्वक पालन करे। विष्णु, ब्राह्मण और अग्निस्वरूप तीर्थ का सेवन करे। चारों वेदमय स्वरूप वाले अजन्मा विराट् पुरुष को भजे, जिनके प्रसाद से मनुष्य मोक्षरूपी महान् वृक्ष के ऊपर चढ़ जाता है और कभी सन्ताप को नहीं प्राप्त होता।
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संदर्भ:- श्रीस्कन्द महापुराण

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02/07/2023

. चातुर्मास्य माहात्म्य

अध्याय–01/10

इस अध्याय में पढ़िये–चातुर्मास्य व्रत का माहात्म्य, संयम-नियम, दया धर्म तथा चौमासे में अन्न आदि दानों की महिमा

नारदजी बोले–'देवाधिदेव! इस समय मैं शुभ कारक चातुर्मास्य व्रत को सुनना चाहता हूँ।'
ब्रह्माजीने कहा–'देवर्षे! ये भगवान् विष्णु ही सबको मोक्ष देने वाले तथा संसार सागर से पार उतारने वाले हैं। इनके स्मरण मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। संसार में मनुष्य-जन्म दुर्लभ है। उसमें भी उत्तम कुल में जन्म पाना और दुर्लभ है। कुलीन होने पर भी दयालु स्वभाव का होना और कठिन है। यह सब होने पर भी कल्याणमय सत्संग प्राप्त होना और भी दुर्लभ है। जहाँ सत्संग नहीं, विष्णु भक्ति नहीं और व्रत नहीं हैं, वहाँ कल्याण की प्राप्ति दुर्लभ हैं। विशेषतः चातुर्मास्य में भगवान् विष्णु का व्रत करने वाला मनुष्य उत्तम माना गया है। सब तीर्थ, दान, पुण्य और देवस्थान चातुर्मास्य आने पर भगवान् विष्णु की शरण लेकर स्थित होते हैं। जो चातुर्मास्य में श्रीहरि को प्रणाम करता है, उसी का जीवन शुभ है। संसार में मनुष्य का जन्म और भगवान् विष्णु की भक्ति दोनों ही दुर्लभ हैं। जो मनुष्य चातुर्मास्य में नदी स्नान करता है, वह सिद्धि को प्राप्त होता है। जो झरना, तड़ाग और बावली में स्नान करता है, उसके सहस्त्रों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पुष्कर, प्रयाग अथवा और किसी महातीर्थ के जल में जो चातुर्मास्य में स्नान करता है, उसके पुण्य की संख्या नहीं है। नर्मदा, भास्कर क्षेत्र, प्राची सरस्वती तथा समुद्र-संगम में एक दिन भी जो चातुर्मास्य में स्नान करता है, उसमें पाप का लेशमात्र भी नहीं रह जाता। जो नर्मदा में एकाग्रचित्त होकर तीन दिन भी चौमासे का स्नान करता है, उसके पाप के सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। जो गोदावरी नदी में सूर्योदय के समय चौमासे में पंद्रह दिन तक स्नान करता है, वह कर्मजनित शरीर का परित्याग करके भगवान् विष्णु के धाम में जाता है। जो मनुष्य तिल मिश्रित एवं आँवला मिश्रित जल से अथवा बिल्वपत्र के जल से चातुर्मास्य में स्नान करता है, उसमें दोष का लेशमात्र भी नहीं रह जाता। देवाधिदेव भगवान् विष्णु के चरणों के अंगुष्ठ से प्रवाहित होने वाली गंगाजी सदा ही पापनाशिनी कही गयी हैं चातुर्मास्य में उनका यह माहात्म्य विशेष रूप से प्रकट होता है। भगवान् विष्णु स्मरण करने पर सहस्रों पाप भस्म कर डालते हैं, इसलिये उनका चरणोदक मस्तक पर चौमासे में धारण किया जाय तो वह कल्याणकारी होता है। चातुर्मास्य में भगवान् नारायण जल में शयन करते हैं, अत: उसमें भगवान् विष्णु के तेज का अंश व्याप्त रहता है। उस समय उसमें किया हुआ स्नान सब तीर्थों से अधिक फल देने वाला होता है। नारद! बिना स्नान के जो पुण्यकार्यमय शुभ कर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है, उसे राक्षस ग्रहण कर लेते हैं। स्नान से मनुष्य सत्य को पाता है। स्नान सनातन धर्म है, धर्म से मोक्ष रूप फल पाकर मनुष्य फिर दु:खी नहीं होता। रात को और सन्ध्या काल में बिना ग्रहण के स्नान न करे, गर्म जल से भी स्नान नहीं करना चाहिये। सूर्य के दर्शन से सब कर्मों में शुद्धि कही गयी है। चातुर्मास्य में विशेष रूप से जल की शुद्धि होती है। शरीर असमर्थ हो तो भस्मस्नान से उसकी शुद्धि होती है। मन्त्र स्नान से, भगवान् विष्णुके चरणोदक से अथवा भगवान् नारायण के आगे क्षेत्र, तीर्थ और नदी आदि में जो स्नान करता है, उसका चित्त शुद्ध हो जाता है। चातुर्मास्य में यह महत्त्व और बढ़ जाता है।
चातुर्मास्य में भगवान् के शयन करने पर प्रतिदिन स्नान के अन्तर में श्रद्धायुक्त चित्त से पितरों का तर्पण करना चाहिये। इससे महान् फल की प्राप्ति होती है। नदियों के संगम में स्नान के पश्चात् पितरों और देवताओं का तर्पण करके जप, होम आदि कर्म करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है। पहले भगवान् गोविन्द का स्मरण करके पीछे शुभ कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये। ये भगवान् गोविन्द ही देवता, पितर और मनुष्य आदिको तृप्ति देने वाले हैं। चातुर्मास्य सब गुणों से उत्कृष्ट समय है। उसमें धर्मयुक्त श्रद्धा एवं स्मृति से पवित्र समस्त कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये। सत्संग, ब्राह्मण भक्ति, गुरु, देवता और अग्नि का तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्कर्म, सत्यभाषण, गोभक्ति और दान में प्रीति–ये सब सदा धर्म के साधन हैं। भगवान् विष्णु के शयन करने पर उक्त धर्मो का साधन एवं नियम भी महान् फल देने वाला होता है। दो घड़ी भी भगवान् विष्णु का ध्यान एवं उन निरंजन परमेश्वर के सेवन से सौ जन्मों का पाप भस्म हो जाता है। यदि मनुष्य चौमासे में भक्ति पूर्वक योग के अभ्यास में तत्पर न हुआ, तो नि:सन्देह उसके हाथ से अमृत गिर गया। बुद्धिमान् मनुष्य को सदैव मन को संयम में रखने का प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि मन के भली भाँति वश में होने से ही पूर्णतः ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह बात निश्चय पूर्वक कही जा सकती है। अत: क्षमा के द्वारा मन को वश में करना चाहिये। एकमात्र सत्य ही परम धर्म है, एक सत्य ही परम तप है, केवल सत्य ही परम ज्ञान है और सत्य में ही धर्म की प्रतिष्ठा है। अहिंसा धर्म का मूल है, इसलिये उस अहिंसा को मन, वाणी और क्रिया के द्वारा आचरण में लाना चाहिये। पराये धन का अपहरण और चोरी आदि पाप कर्म सदा सब मनुष्यों के लिये वर्जित हैं। चातुर्मास्य में इनसे विशेष रूप से बचना चाहिये। ब्राह्मण तथा देवता की सम्पत्ति का विशेष रूप से त्याग करना चाहिये। न करने योग्य कर्मो का आचरण विद्वान् पुरुषों के लिये सदैव त्याज्य है। नारद! जो सम्पूर्ण कार्यों में निष्काम भाव से प्रवृत्त होता है, जिसमें अहं बुद्धि का अभाव है, जो बुद्धि के नेत्रों से ही देखता है, ऐसा पुरुष ही महाज्ञानी और योगी है। मनुष्यों के शरीर में यह अहंकार विष है। अत: वह सदैव त्याग देने योग्य है। मनुष्य कामना के त्याग द्वारा क्रोध और लोभ को जीते। ऐसे मनुष्य के सहस्त्रों पाप उसके शरीर से निकलकर सहस्रों टुकड़ों में नष्ट हो जाते हैं। शान्ति के द्वारा मोह और मन को जीत कर विचार के द्वारा शान्ति भाव को अपनाना चाहिये। सन्तोष से भी शान्ति का उदय होता है। जो अपनी कोमलता एवं सरलता के द्वारा ईर्ष्या भाव को दबा देता है, यह मुनीश्वर है। चातुर्मास्य में जीवदया विशेष धर्म है। प्राणियों से द्रोह करना कभी भी धर्म नहीं माना गया है। अत: सदा सब मासों में भूतद्रोह का परित्याग करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस भूतद्रोह को सहस्रों पापों का मूल बताते हैं। इसलिये मनुष्यों को सर्वथा प्रयत्न करके प्राणियों के प्रति दया करनी चाहिये। सब प्राणियों के हृदय में सदा भगवान् विष्णु विराज रहे हैं। जो उन प्राणियों से द्रोह करने वाला है, उसके द्वारा भगवान् का ही तिरस्कार होता है। जिस धर्म में दया नहीं है, वह दूषित माना गया है दया के बिना न विज्ञान होता है, न धर्म होता है और न ज्ञान ही होता है। अत: सब प्राणियों के प्रति आत्मभाव रखकर सबके ऊपर दया करना सनातन, धर्म है, जो सब पुरुषों के द्वारा सदा सेवन करने योग्य है।
सब धर्मो में दान धर्म की विद्वान् लोग सदा प्रशंसा करते हैं। वेद में अन्न को ब्रह्म कहा गया है, अन्न में ही प्राणों की प्रतिष्ठा है। अत: मनुष्य सदा अन्न एवं जल का दान करे। जल देने वाला तृप्ति को और अन्न-दान करने वाला मनुष्य अक्षय सुख को पाता है। अन्न और जल के समान दूसरा कोई दान न हुआ है, न होगा। मणि, रत्न, मूँगा, चाँदी, सोना और वस्त्र तथा अन्य वस्तुओं के दानों में भी अन्नदान ही सबसे बढ़कर है। चातुर्मास्य में अन्न और जल का दान, गोदान, प्रतिदिन वेदपाठ और अग्नि में हवन-ये सब महान् फल देने वाले हैं। यदि भगवान् विष्णु के साथ समागम के लिये वैकुण्ठ धाम में जाने की इच्छा हो, तो सब पापों के नाश के लिये चौमासे में अन्नदान करना चाहिये। अन्नदान करने से सब प्राणी प्रसन्न होते हैं। देवता भी अन्नदाता की स्पृहा रखते हैं। गुरु और ब्राह्मणों को भोजन कराना, घृतदान करना तथा सत्कर्मों में संलग्न रहना- ये सब बातें चातुर्मास्य काल में जिसमें मौजूद हैं, वह साधारण मनुष्य नहीं है। सद्धर्म, सत्कथा, सत्पुरुषों की सेवा, संतों का दर्शन, भगवान् विष्णु का पूजन और दान में अनुराग–ये सब बातें चौमासे में दुर्लभ बतायी गयी हैं। जो मनुष्य चौमासे में पितरों के उद्देश्य से अन्नदान करता है, वह सब पापों से शुद्धचित्त होकर पितरों के लोक में जाता है। उसके अन्नदान से तृप्त हुए देवता लोग उसे मनोवांछित वस्तु प्रदान करते हैं। चींटी भी उसके घर से भोजन लेकर जाती है। अन्नदान सबसे उत्तम है, उसका न रात में निषेध है, न दिन में। चौमासे में वह विशेष रूप से पापों का नाश करने वाला है। शत्रुओं को भी अन्न देना मना नहीं है। चौमासे में दूध, दही एवं मट्टा का दान महान् फल देने वाला होता है। जन्म काल में जिससे यह शरीर पुष्ट हुआ है, उस अन्न एवं दुग्ध का दान उत्तम है। साग देने वाला मनुष्य न कभी नरक में जाता है और न यमलोक का दर्शन करता है। वस्त्र देने वाला प्रलय काल तक चन्द्रलोक में निवास करता है। जो चातुर्मास्य में चन्दन, अगुरु और धूप का दान करता है, वह मनुष्य पुत्र - पौत्रों सहित विष्णु रूप होता है। भगवान् विष्णु के शयन काल में जो मनुष्य वेदवेत्ता ब्राह्मण को फल दान करता है, वह यमलोक को नहीं देखता जो चौमासे में भगवान् विष्णु की प्रीति के लिये विद्यादान, गोदान और भूमिदान करता है, वह अपने पूर्वजों का उद्धार कर देता है। जो जिस देवता के उद्देश्य से चौमासे में गुड़, नमक, तेल, शहद, तिक्त पदार्थ, तिल और अन्न देता है, वह उसी के लोक में जाता है। विशेषतः चातुर्मास्य में मनुष्य को अग्नि में आहुति देनी चाहिये, ब्राह्मण को दान देना चाहिये और गौओं की भली भाँति सेवा पूजा करनी चाहिये। भविष्य में दान देने की प्रतिज्ञा न करके शीघ्र ही दे डालना चाहिये। मनुष्य जो कुछ देने की इच्छा करे, वह अवश्य दे डाले। जिसको देने का निश्चय किया हो उसे ही दे, दूसरे को न दे। दी हुई वस्तु उससे वापस न ले। जो श्रीहरि के शयनकाल में ब्राह्मणों के लिये सब प्रकार का दान देता है, वह पूर्वजों सहित अपने को पापों से मुक्त कर लेता है।
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संदर्भ:- श्रीस्कन्द महापुराण

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🚩ओम नमः भगवतय वासुदेवाय नमः 🙏🏻
विशेष मंत्र और उनका अर्थ-:

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Meri Radhey

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