Mohit Raman Mishra
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥
22/09/2026
"चलि राधे! तोहि स्याम बुलावै।
वह सुनि देखि बेनु मधुरे सूर,
तेरो नाम लै लै गावै।।
देखो वृंदावन की सोभा,
ठौर ठौर द्रुम फूले।
कोकिल नाद सुनत मन आनंद,
भँवर भ्रमत रस मूले।।
उन्नत जोबन मदन कुलाहल,
यह औसर है नीको।
'परमानंद' प्रभु प्रथम समागम,
मिल्यो भाँवतो जी को।।"
मान में विराजमान... मानिनी मधुरा का... मनुहार करके मान छुड़ा कर... मधुराधिपति
मनमोहन से मिलन करवानेवाली... दूतीस्वरूपा... लीलामध्यपाती...श्रीललिताजी की आड़ी से... श्रीयुगलसरकार...हम पर कृपा करके... हमारा भी आत्मसंबंध-आप्तसंबंध ऐसे किसी महानुभाव भगवदीय से करा दे... कि जो... हमारे लिये दूतीकार्य करे...ताकि... हमारा भी सहस्र परिवत्सर का विप्रयोग समाप्त हो जाये... और... हमारे शाश्वत स्वामी से हमारा शाश्वत मिलन हो जाये...!!!
20/09/2026
गारी मती दीजो,
मो गरीबनी को जायो है।
जीततो बिगार कीयो आन कहो, मोंसो तुम,
में तो काहू बातन में नाहीं तरसायो है।।१।।
दधिकी मटकी भरी आंगनमें, आन धरी,
तोल तोल लीजो भटू जेतो, जाको खायो है,
सूरदासप्रभु प्यारे निमिष न हूं जे न्यारे,।।
कान्ह जैसो पुत मै तो पूरे पून्यन सों पायो है।।२।।
18/09/2026
ग्वालिन लैंन कमोरी गई,गये लालन ग्वाल लियें गृह ओरी।
माखन लैं मथनी तैं मनोहर,खान लगे हंसि कैं मुख मोरी।।
भाज चले झिझके से सबैं इतने ही में आय गई वह गोरी।
श्याम को रूप निहारत ही,"बलबीर" प्रवीण हुती भई बोरी।।
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मधुर रजनी
अर्थ:- एक ग्वालिनि माखन निकालने के लिए घर से कमोरी लेने गई तो इतने ही में लाला ग्वालों के लेकर उसके घर में घुस गये और मथनी में से माखन निकाल कर, मुंह मोड़कर खाने लगे और जब वह गोरी वहां आई तो झिझक कर सब ग्वाल बाल भाग चले। बलबीर कवि कह रहे हैं कि श्याम का वह अति सुन्दर रूप निहारते ही वह चतुर ग्वालिनि बोरी बन गई अर्थात अपनी सुध बुध ही खो बैठी।
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मधुर रजनी
क्रोध पर प्रेम की विजय: सामान्यतः जब कोई घर में चोरी करते हुए पकड़ा जाता है, तो पकड़ने वाले को क्रोध आना स्वाभाविक है। ग्वालिन भी बहुत चतुर और समझदार (प्रवीण) थी, लेकिन बालकृष्ण को माखन चुराते और पकड़े जाने पर घबराहट में भागते हुए देखकर उसे क्रोध नहीं आया, बल्कि वह उनके इस बाल-सुलभ, मासूम रूप पर पूरी तरह मुग्ध हो गई।
भक्ति और समर्पण की अवस्था: ग्वालिन का 'बावरी' (बोरी) हो जाना दरअसल एक भक्त के पूर्ण समर्पण की अवस्था है। जब जीव (भक्त) ईश्वर के वास्तविक, आनंदमयी और सुंदर रूप का दर्शन कर लेता है, तो वह अपनी सारी सांसारिक सुध-बुध और चतुराई भूलकर केवल भगवान के प्रेम में लीन हो जाता है।
वात्सल्य और माधुर्य रस: इन पंक्तियों में बालकृष्ण की मनमोहक चेष्टाओं (मुँह मोड़कर माखन खाना, पकड़े जाने पर झिझकना) के माध्यम से वात्सल्य रस की बड़ी ही सुंदर और सजीव व्यंजना हुई है।
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संक्षेप में कहें तो: श्रीकृष्ण का रूप-सौंदर्य ऐसा जादू है जो बड़े-बड़े ज्ञानियों और चतुर लोगों को भी अपना दीवाना बना देता है। ग्वालिन का माखन चोरी पकड़ने आना तो एक बहाना था, असल में तो उसे कृष्ण के उस मनमोहक रूप का दर्शन कर के अपना हृदय हारना था।
16/09/2026
ब्रह्म मैं ढूँढयो पुरानन-गानन बेद रिचा सुनि चौगुने गायन।
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कहूँ वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन॥
टेरत हेरत हारि परयो रसखानि बतायो न लोग लुगायन।
देख्यो दुरो वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटतु राधिका-पायन॥
रसखानजी कहते हैं , जिस ब्रह्म को पुराणों के गान में खोजा, जिसे वेदों की ऋचाओं में जानने का प्रयत्न किया, जिसके स्वरूप और स्वभाव का वर्णन करते-करते ऋषि-मुनि भी थक गए, उसी परम ब्रह्म को खोजते-खोजते मैं भी हार गया। कहाँ है वह परमात्मा ? पुकारते खोजते कोई उसका पता न बता सका।
लेकिन जब उसी ब्रह्म को वृन्दावन की कुंजों में खोजा, तो वहाँ एक ऐसा अद्भुत दर्शन हुआ कि सारी खोज जैसे पूर्ण हो गई। वही परम ब्रह्म, अनन्त, अगम्य और अपार श्रीकृष्ण ; आज कुंज-कुटीर में श्रीराधिका जी के चरणों के पास बिराजे हैं। जिन चरणों की ओर संसार की दृष्टि सहज ही नहीं पहुँच सकती, उन चरणों को स्वयं श्यामसुन्दर अपने हाथों से सहला रहे हैं।
जहाँ वेदों की वाणी उस परम तत्त्व को जानने का प्रयास करती है, वहीं वृन्दावन का प्रेम उसे अपने वश में कर लेता है। श्रीकृष्ण को पाने के लिए बड़े-बड़े साधन नहीं, बल्कि ऐसा प्रेम चाहिए जिसके आगे स्वयं परमात्मा भी प्रेमवश हो जाएँ।
इस चित्रजी में यही तो अद्भुत दर्शन है | प्रभु श्रीकृष्ण सेवा कुञ्ज , वृन्दावन में किसी सिंहासन पर नहीं, किसी राजसी वैभव में नहीं, बल्कि श्रीराधिका जी के चरणों के समीप विराजे हैं और रसखानजी के लिए यही उस खोज का अंतिम उत्तर है। प्रभु श्रीकृष्ण वृन्दावन की कुंज में प्रेम के सामने अपने ऐश्वर्य को भुलाकर राधिका जी के श्रीचरणों की सेवा कर रहे हैं।
यही वृन्दावन का प्रेम है। यही प्रेम की पराकाष्ठा है। यही रसखानजी के “ब्रह्म” की सबसे सुंदर पहचान है।
इस चित्रजी में आपको श्रीकृष्ण का कौन-सा भाव अधिक स्पर्श करता है, परम ब्रह्म का, प्रेम के वशीभूत प्रियतम का, या श्रीराधिका जी के चरणों में समर्पित प्रियतम का ? अपने हृदय में जो भाव जागे, उसे अपने शब्दों में अवश्य प्रकट करें।
14/09/2026
काहु जोगिया की नजर लगी,मेरो कान्ह कुंवरिया रोवै।
घर घर पूछत फिरत जसोदा,दूध पीवै न सोवै।।१।।
कहां गये जोगी नंदभवन,ब्रज में फिरी फिरी हारे।
फन जोगिया को ढ़ूंढ निकासो,सुत को ताप निवारै।।२।।
चल रे जोगी नंदभवन में, यशोमती मात बुलावैं।
लटकत लटकत शंकर आवें,मन में मोद बढ़ावैं।।३।।
आये जोगी नंदभवन में,राई लौन कर लीनों।
वारि फेर लालन के ऊपर,हाथ शीश पे दीनों।।४।।
रोग दोष सब दूरि गयो है,किलक हंसे नंदलाला।
मगन भई नंदजू की रानी,दीनी मोतिन माला।।५।।
रहो रहो जोगी नंदभवन में,ब्रज में वासो कीजै।
जब जब मेरो लाला रोवै,तब तब दर्शन दीजै ।।६।।
तुम तो जोगी परम मनोहर,तुमको वेद बखानैं।
बूढ़ो बाबू नाम हमारो, सूरश्याम मोहि जाने।।७।।
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पद १ व २: माता यशोदा की व्याकुलता
माता यशोदा अत्यंत चिंतित हैं क्योंकि उनके प्यारे कान्हा लगातार रो रहे हैं। वे न तो दूध पी रहे हैं और न ही सो रहे हैं। माता को लगता है कि उनके लाला को नंदभवन में आए किसी जोगी (साधु) की बुरी नज़र लग गई है। वे घर-घर जाकर उस जोगी के बारे में पूछ रही हैं और पूरे ब्रज में उसे ढूंढकर थक चुकी हैं। वे चाहती हैं कि कोई उस जोगी को ढूंढ लाए ताकि वह आकर उनके पुत्र की नज़र उतारे और उसका कष्ट दूर करे।
पद ३ व ४: जोगी (शिव जी) का आगमन और नज़र उतारना
जब जोगी को यह संदेश मिलता है कि माता यशोदा उन्हें नंदभवन बुला रही हैं, तो वे (जो वास्तव में भगवान शंकर हैं) अपने मन में अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपनी अलमस्त चाल में झूमते हुए आते हैं। नंदभवन पहुँचकर, जोगी अपने हाथ में राई और नमक लेते हैं (जो नज़र उतारने का पारंपरिक तरीका है) और उसे बालकृष्ण के ऊपर से वार कर (घुमाकर) उनके सिर पर अपना आशीर्वाद भरा हाथ रख देते हैं।
पद ५ व ६: कान्हा का प्रसन्न होना और यशोदा माँ का आग्रह
जोगी (शिव) के स्पर्श और दर्शन मात्र से बालकृष्ण का सारा रोग और कष्ट दूर हो जाता है, और वे किलकारी मारकर हंसने लगते हैं। अपने लाडले को हँसता देख माता यशोदा खुशी से मग्न हो जाती हैं और कृतज्ञता स्वरूप जोगी को मोतियों की माला भेंट करती हैं। यशोदा माँ अपने भोलेपन में जोगी से आग्रह करती हैं कि आप नंदभवन और ब्रज में ही निवास करें, ताकि भविष्य में जब भी मेरा लाला रोए, आप आकर उसे अपने दर्शन देकर चुप करा सकें।
Mohit Raman Mishra
12/09/2026
वंदो श्रीबालकृष्ण नव बाल।।
जसुमति गृह झूलत है पलना, रसलीला में अधिक रसाल।।१।।
कठुला कंठ भ्रकुटि मिस बिंदूका, तिलक विचित्र बिराजत भाल।।
रसिकराय के दास की विनती, शरण राखिये करि प्रतिपाल।।२।।
भावार्थ
इस पद का सरल अर्थ निम्नलिखित है:
बालकृष्ण की वंदना (पंक्ति 1-2):
भक्त कहते हैं कि मैं उन नन्हे श्री बालकृष्ण की वंदना करता हूँ, जो माता यशोदा के घर (नंदभवन) में पलने (झूले) में झूल रहे हैं। प्रभु की ये मनमोहक बाल-लीलाएं अत्यंत मधुर, आनंददायक और प्रेम रस से परिपूर्ण हैं।
बाल स्वरूप का सुंदर वर्णन (पंक्ति 3):
प्रभु के बाल रूप का श्रृंगार बहुत ही मनमोहक है। उनके गले में 'कठुला' (छोटे बच्चों को पहनाया जाने वाला एक विशेष आभूषण या नजरिया) सुशोभित है। बुरी नजर से बचाने के लिए उनकी भौहों के पास काजल की बिंदी लगी हुई है, और उनके माथे पर एक अत्यंत अद्भुत व सुंदर तिलक सजा हुआ है।
शरणागति और प्रार्थना (पंक्ति 4):
अंत में, कवि (रसिकराय के दास) भगवान से यह विनम्र प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! आप अपने इस सेवक को अपनी शरण में ले लीजिए और मेरा पालन-पोषण कर मेरी रक्षा (प्रतिपाल) कीजिए।
10/09/2026
वंदो नटवर नवल कन्हाई।।
रत्न जटित आंगन में नाचत, किलकि-किलकि अति हरख बढाई।।१।।
मांगत माखन माट मातसों, बोलत बचन सुमुख तुतराई!
जननि लाय दियो हितचित करि, लीनो अति सुख पाई।।२।।
एक करमें नवनीत बिराजत, एक कर माट सुहाई,
निर्तत सुल्प संचनौतन गति हस्तक भेद बताई।।३।।
ब्रजवनिता नेंनन सुख निरखत अंतरभाव जताई,
रसिकदास के प्रभु रस दायक रस संकेत बताई।।४।।
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पंक्तिबद्ध भावार्थ
वंदो नटवर नवल कन्हाई।।
रत्न जटित आंगन में नाचत, किलकि-किलकि अति हरख बढाई।।१।।
अर्थ: मैं सर्वश्रेष्ठ नर्तक (नटवर) और नित्य-नूतन (सदा आकर्षक लगने वाले) श्री कृष्ण की वंदना करता हूँ। वे नंद बाबा के मणियों और रत्नों से जड़े हुए आँगन में नृत्य कर रहे हैं। नाचते हुए वे खुशी से किलकारियाँ मार रहे हैं, जिससे वहाँ उपस्थित सभी लोगों का आनंद अत्यंत बढ़ रहा है।
मांगत माखन माट मातसों, बोलत बचन सुमुख तुतराई!
जननि लाय दियो हितचित करि, लीनो अति सुख पाई।।२।।
अर्थ: बाल कृष्ण अपनी माता (यशोदा) से माखन और माखन की मटकी (माट) माँग रहे हैं। वे अपने सुंदर मुख से तोतली और मीठी भाषा में बोल रहे हैं। उनकी इस मनमोहक माँग को सुनकर माता ने भी अत्यंत प्रेम (हितचित) से भरकर उन्हें माखन लाकर दे दिया, जिसे लेकर कान्हा को असीम सुख की प्राप्ति हुई।
एक करमें नवनीत बिराजत, एक कर माट सुहाई,
निर्तत सुल्प संचनौतन गति हस्तक भेद बताई।।३।।
अर्थ: उनके एक हाथ में ताज़ा मक्खन (नवनीत) सुशोभित हो रहा है और दूसरे हाथ में माखन की सुंदर मटकी है। इस रूप में वे बड़ी ही कोमल और चंचल गति से नृत्य कर रहे हैं। नाचते हुए वे अपने हाथों से नृत्य की विभिन्न मुद्राओं (हस्तक भेद) को भी दर्शा रहे हैं, मानो कोई बहुत निपुण नर्तक हों।
ब्रजवनिता नेंनन सुख निरखत अंतरभाव जताई,
रसिकदास के प्रभु रस दायक रस संकेत बताई।।४।।
अर्थ: ब्रज की गोपियाँ और महिलाएँ (ब्रजवनिता) उनके इस अद्भुत रूप और नृत्य को देखकर अपने नेत्रों को अपार सुख प्रदान कर रही हैं और अपने हृदय के प्रेम भाव को प्रकट कर रही हैं। कवि 'रसिकदास' कहते हैं कि मेरे प्रभु श्री कृष्ण संपूर्ण आनंद (रस) के दाता हैं और वे अपने इस बाल-नृत्य से दिव्य प्रेम और आनंद का संकेत दे रहे हैं।
08/09/2026
*॥ श्री राधा-मञ्जुश्यामा स्तोत्रम् ॥*
॥१॥
*धन्यं श्रीवृषभानोर्गृहं, दिव्यं कान्तिमयं शुभम्।*
*यत्र पीत-नील-भासा, द्वे भगिन्यौ च विराजतः॥*
अर्थ: *राजा श्रीवृषभानु का वह दिव्य, कान्तिमय और शुभ भवन धन्य है, जहाँ पीले और नीले रंग की आभा वाली दोनों बहनें सुशोभित हैं।*
॥२॥
*श्रीराधा मञ्जुश्यामा च, दिव्यरूपधरे शुभे।*
*ययोः प्रभा भासयति, न केवलं निजमन्दिरम्॥*
अर्थ: *दिव्य रूप को धारण करने वाली कल्याणमयी श्रीराधा और मञ्जुश्यामा, इन दोनों की दिव्य प्रभा न केवल अपने भवन को...*
॥३॥
*ब्रह्माण्डमण्डलं सर्वं, भासयन्त्यौ स्वतेजसा।*
*मोहयन्त्यौ स्वकान्त्या च, श्यामसुन्दरमोहनम्॥*
अर्थ: *...अपितु अपने तेज से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित करती हैं, और अपनी कान्ति से त्रिभुवन-मोहन श्यामसुन्दर को भी मोहित कर लेती हैं।*
॥४॥
*दिव्य-निकुञ्ज-शोभिन्यौ, भगिन्यौ जयतां सदा।*
*जयतां जयतां नित्यं, श्रीराधे-मञ्जुश्यामे शुभे॥*
अर्थ: *दिव्य निकुंज की शोभा बढ़ाने वाली दोनों बहनों - श्री राधा और श्रीमञ्जुश्यामा - की !सदा ही जय हो! सदा ही जय हो!*
॥५॥
*हे राधे! मञ्जुश्यामे! च, कृष्णप्रेमप्रदायिनि।*
*दीनेषु करुणां कृत्वा, निजदासीं कुरुष्व नः॥*
अर्थ: *हे श्रीकृष्ण प्रेम को प्रदान करने वाली श्री राधे और मञ्जुश्यामे! हम दीनों पर करुणा करके हमें अपनी निज दासी बना लीजिये।*
श्रीराधा "कृपा"
06/09/2026
हौ इक नई बात सुनि आई।
महरि जसौदा ढौटा जायौ, घर घर होत बधाई।
कहिये कहा कहत नहि आवै, रतन भूमि छवि छाई।
द्वारैं भीर गोप-गोपिनि की, महिमा बरनि न जाई।
नाचत बृद्ध तरून और बालक, गोरस-कीच मचाई।
सूरदास प्रभु अंतरयामी, नंदसुवन सुखदाई ।।
तिहारो दरस मोहे भावे श्री यमुना जी ।
श्री गोकुल के निकट बहत हो, लहरन की छवि आवे ॥१॥
सुख देनी दुख हरणी श्री यमुना जी, जो जन प्रात उठ न्हावे ।
मदन मोहन जू की खरी प्यारी, पटरानी जू कहावें ॥२॥
वृन्दावन में रास रच्यो हे, मोहन मुरली बजावे ।
सूरदास प्रभु तिहारे मिलन को, वेद विमल जस गावें ॥३॥
भावार्थ एवं मुख्य विषय
स्वरूप और दर्शन: भक्त यमुना जी के दर्शन की अनुपम सुंदरता का वर्णन करता है। गोकुल के समीप बहती हुई उनकी उठती-गिरती लहरों का दृश्य मन को आनंद और शांति प्रदान करता है।
महिमा और कृपा: श्री यमुना जी को "सुख देनी और दुख हरणी" कहा गया है। मान्यता है कि जो भक्त प्रातःकाल उठकर उनके पवित्र जल में स्नान करते हैं, उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण से संबंध: यमुना जी को मदन मोहन (श्रीकृष्ण) की परम प्रिय पटरानी के रूप में पूजा जाता है। वे वृंदावन में श्रीकृष्ण की मुरली की धुन और रासलीला की साक्षी हैं।
भक्ति और समर्पण: पद के अंत में सूरदास जी प्रभु और यमुना महारानी के मिलन का यश गान करते हैं, जिनकी महिमा का वर्णन वेदों में भी मिलता है।
"तिहारो दरस मोहे भावे श्री यमुना जी ।
श्री गोकुल के निकट बहत हो, लहरन की छवि आवे ॥"
04/09/2026
प्रगटे अभिराम स्याम रसिक ब्रज-बिहारी।
बृंदावन नंद-भवन जन-मन-सुखकारी।
हरन विषम भूमि-भार, करन दुष्ट-दल-उधार।
सरन संत-जन उबार, अखिल अघ-बिदारी॥-प्रगटे०॥
मुदित भए प्रेमी जन, संत भए निर्भय मन।
डरे सकल खल-दुर्जन, अघी-अनाचारी॥-प्रगटे०॥
आनँद अपार छयौ, दुःख-सोक-कुडर गयौ।
गोकुल अब अतुल भयौ, उदये अवतारी॥-प्रगटे०॥
बरस्यौ रस-मेह अमित, रस-सरिता बही अजित।
चली सकल पवन-हित, अग-जग-हितकारी॥-प्रगटे०॥
सब कें अति हिय हुलास, नंद-सुअन-दरस-आस।
दौरे तजि-तजि निवास, आतुरता भारी॥-प्रगटे०॥
पहुँचे नँद-महल हाल, दरसन करि अति निहाल-
भए सकल ग्वालि-ग्वाल, पुलक अंगझारी॥-प्रगटे०॥
पायौ सब सुख अपार, उतर्यौ सब मोह-भार।
तन-मन सब दिए वार, गोकुल-नर-नारी॥-प्रगटे०॥🎉🙇
मो नयनन नँदनन्द बसे री!
नन्द को लाल माल मो गलकी, देखत मन करसै री!
चन्दा से मुखपै मसि-बिन्दा, लटुरी ललित लसै री!
किलकि-किलकि जब हँसत ललकि सखि! बरबस मन करसै री!॥
कोमल कर-पद-पल्लव वाके, परसत हाथ खसै री!
मनहुँ नवल नवनीत गढ़्यौ वह, मन-मत सबहि ग्रसै री!॥
है सब ही व्रज को वह जीवन, लखि-लखि मन हरसै री!
बड़े भाग्य पाई हम यह निधि, सब विधि सुख सरसै री!॥
जुग-जुग जिये लाल यह सजनी! व्रज सुहाग विकसै री!
बाल गुपाल लाल की यह छवि दूरहि तें करसै री!॥
कनिया गोद लै जब हलरावत हों तब मृदु किलकि हँसै री!
बलि-बलि जाउँ, ललन की सुखमा प्रतिपल हिये लसै री!॥
गोकुल रावल के दोऊ रांनें ❁ जिनके चरित पुरान बखाने।
गोकुल पति गृह जसुमति रानी ❁ कीरति भांन भँवन सुखदानी।।
जसुमति कूंखि प्रगट भये स्याम ❁ भादों वदि आठें अभिराम।
नक्षत्र रोहिनी आधी निसा ❁ सुर हरषे भईं निर्मल दिसा।।
नन्द दान एतो कछु दीयौ ❁ संक्यो देखि कुबेर जु हीयौ।
गोपी गोप महा आनन्दे ❁ सर्बसु दै विप्रन पद वन्दे।।
इहि विधि सौं जु कियौ दधि कादौं ❁ मानौ लग्यौ महा भर भादौं।
हरि अवतार देवमुनि जान्यौ ❁ थिर चर सबहिनु मंगल मान्यौ।।
🌹 🎉❁ अवतार का मुख्य हेतु ❁🎉🌹
दास अनन्य भजन रस हेत ❁ लाल प्रगट भयो नन्द निकेत।
नव किशोर ने सिसु वपु धरयौ ❁ रसिकन पै जु अनुग्रह करयौ।।
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